पार्टी का मूल कार्यकर्ता उपेक्षित, काम करने पर भी नहीं मिल रहा पद

    भाजपा स्थापना दिवस पर पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने सरकार और संगठन को खरी-खरी सुनाई। विचारधारा से कभी समझौता न करने की सीख देते हुए दल बदलने वालों को तरजीह देने पर भी उनकी नाराजगी सामने आई। संगठन-सरकार के कार्यक्रमों में अक्सर कम ही नजर आ रहीं वसुंधरा ने संगठन के समर्पित कार्यकर्ताओं को हाशिए पर रखे जाने को भी गलत बताया। दल बदलने वाले नेताओं को आड़े हाथों लेते हुए उन्होंने अवसरवादी राजनीति की भी खुलकर आलोचना की।

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    Image Source: AI/प्रतीकात्मक

    भाजपा स्थापना दिवस पर पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने सरकार और संगठन को खरी-खरी सुनाई। विचारधारा से कभी समझौता न करने की सीख देते हुए दल बदलने वालों को तरजीह देने पर भी उनकी नाराजगी सामने आई। संगठन-सरकार के कार्यक्रमों में अक्सर कम ही नजर आ रहीं वसुंधरा ने संगठन के समर्पित कार्यकर्ताओं को हाशिए पर रखे जाने को भी गलत बताया। दल बदलने वाले नेताओं को आड़े हाथों लेते हुए उन्होंने अवसरवादी राजनीति की भी खुलकर आलोचना की। साथ ही मूल कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देने की बात कही जो वाकई महत्वपूर्ण है। मंत्री बनने के बाद कई नेता अपने उन कार्यकर्ताओं के फोन तक नहीं उठा रहे, जिन्होंने उनकी जीत में बड़ी जिम्मेदारी निभाई थी। कार्यकर्ताओं की बात नहीं सुनी जा रही, उनके छोटे-मोटे काम नहीं हो रहे। कार्यकर्ताओं को तरजीह देने की यह बात कोई पहली बार नहीं कही गई, बरसों से यह कहा-सुना जा रहा है। चुनाव के पहले भी और सरकार बनने के बाद भी। वरिष्ठ नेता-पदाधिकारी ही नहीं प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री तक अनेक बार यह कहते सुने गए हैं कि पार्टी की मजबूती का आधार जमीनी स्तर पर काम करने वाला कार्यकर्ता है। वो संगठन की रीढ़ है। उन्हें हर हाल में सम्मान दिया जाना चाहिए। बावजूद इसके हकीकत कुछ और ही है।

    मंत्री तो छोड़िए कई विधायक-सांसद तक कार्यकर्ता-पदाधिकारियों को टाइम नहीं देते। इसके चलते कई बार कार्यकर्ताओं का गुस्सा भी सामने आ रहा है। उनकी नाराजगी इसको लेकर भी बढ़ जाती है कि पार्टी के प्रति पूरी तरह समर्पित रहने के बाद कई सिफारिशी लोगों को पद दिए जाते हैं, वो भले ही जिला अध्यक्ष का हो या ब्लॉक अध्यक्ष का। वसुंधरा ने यह संकेत दिया है कि भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देने की जरूरत महसूस की जा रही है। कार्यकर्ताओं की नाराजगी के अपने कारण हैं जो छोटे-छोटे अवसरों पर दिखाई दे जाते हैं। ग्राम पंचायत के चुनाव हों या नगर निकाय के, टिकट की मारामारी में भी कई बार पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता और पदाधिकारियों को मौका नहीं मिलता। पिछले कुछ सालों से यही देखने में आ रहा है कि दूसरे दल के नेता भाजपा में शामिल होते ही टिकट लेकर सांसद-विधायक बन जाते हैं जबकि भाजपा की बरसों से अथक सेवा कर रहे कई नेता छिटका दिए जाते हैं। नागौर में पहले विधायक और फिर सांसद का चुनाव भाजपा से लड़ने वाली ज्योति मिर्धा का ही उदाहरण देख लें, कुछ दिन पहले ही उन्होंने कांग्रेस छोड़ी और भाजपा ने चार महीने के भीतर दो अवसर दे दिए हालांकि दोनों में ही उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके चलते टिकट से महरूम रहे कई भाजपाई नेता नाराज हो गए और हालत यह है कि नागौर भाजपा कई गुटों में बंट गई।

    यह भी सही है कि पार्टी बदलने का एक कारण यह भी है कि संबंधित नेता को वरीयता नहीं दी जाती या फिर उसके टिकट मिलने की संभावनाएं बची नहीं रहती। वसुंधरा ने यह भी कहा कि दल बदलने वालों से सावधान रहने की जरूरत है तो इसमें भी भाजपा में वापस आए कुछ नेताओं मे से कुछ उनको भी निशाना बनाया जो पार्टी की रीति-नीति के हिसाब से खुद को ढाल नहीं पा रहे। कई जिलों में तो हाल यह भी है कि विधायक-सांसद की वहां के जिला अध्यक्ष तक से नहीं बन रही। कई जिला अध्यक्ष आरोप भी लगा रहे हैं कि संगठन से जुड़े कार्यकर्ता-पदाधिकारियों की सुनवाई नहीं हो रही। भाजपा स्थापना दिवस पर वसुंधरा राजे की कही एक-एक बात महत्वपूर्ण रही, बावजूद इसके इस पर अमल कब होगा। उन्होंने कहा, काम करोगे तो पद खुद चलकर आएगा पर ऐसा नहीं है, ऐसे कई पदाधिकारी-कार्यकर्ता हैं जो छोटे-छोटे पद अथवा चुनाव की आस में बुढ़ा गए। यह भी सच है कि कार्यकर्ता क्षेत्रीय समस्याएं उठाते हैं, लेकिन जब उन पर कार्रवाई नहीं होती तो दूरी बढ़ जाती है। ऐसे में वसुंधरा राजे की एक-एक बात पर मंथन करना चाहिए। कार्यकर्ताओं के साथ नियमित संवाद हो, उनको हर निर्णय में शामिल किया जाए। साथ ही सरकार और संगठन के बीच बेहतर समन्वय हो, इसके भी पुख्ता इंतजाम हों। केवल अपने हितों के लिए पार्टी का उपयोग करने वाले भी कम नहीं हैं, उन पर भी शिकंजा कसा जाए। इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि पार्टी का मूल कार्यकर्ता उपेक्षित क्यों है और जो काम कर रहे हैं, उनको पद क्यों नहीं मिल रहा‌।