जेल की मजबूत होगी निगरानी, तभी रुकेगी मनमानी

    राजस्थान की जेलों में बंदियों और जेल स्टाफ की मिलीभगत, अवैध वसूली, मोबाइल सुविधाएं और मारपीट के मामले सामने आने से व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। श्रीगंगानगर में नाबालिग बंदियों द्वारा वार्डन की हत्या ने सुरक्षा व्यवस्था की गंभीरता उजागर की। लेख में औचक निरीक्षण, सीसीटीवी निगरानी, स्वतंत्र जांच, पर्याप्त स्टाफ और शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई के साथ बंदियों के पुनर्वास की जरूरत बताई गई है।

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    श्रीगंगानगर शहर के राजकीय संप्रेषण एवं किशोर गृह बंद बाल कैदियों ने वार्डन साहब राम डेलू की सिर पर डंडे मार-मार हत्या कर दी। अजमेर सेंट्रल जेल में जेलर सद्दाम हुसैन के मोबाइल से तीन बंदियों की अजमेर ब्लैकमेल कांड के दोषी नफीस चिश्ती से वीडियो कॉल कराने का मामला सामने आया तो हाई सिक्योरिटी जेल का प्रहरी धारा सिंह गैंगस्टरों से पैसे लेकर गुर्गों को सुविधाएं देने के मामले में गिरफ्तार हुआ। जयपुर की महिला जेल में बंद महिला कैदियों से कथित अवैध वसूली और प्रताड़ना की शिकायतें सामने आईं। कहीं बंदी से मारपीट ताे कहीं बंदियों को मोबाइल समेत अन्य सुविधाओं की मिलीभगत सामने आ रही है। अकेले जयपुर ही नहीं उदयपुर-जोधपुर-अजमेर समेत कई जेलों के स्टाफ के साथ बंदियों की ‘दोस्ती’ का खुलासा हुआ है। यानी थोड़े से लाभ के लिए बंदियों को तमाम सुविधाएं मुहैया करवाई जा रही हैं। मजे की बात यह कि चप्पे-चप्पे पर सीसीटीवी कैमरे लगे होने के बाद भी यह सब खुलेआम किया जा रहा है। आखिर हो क्या रहा है, अपराध करने के बाद सजा भुगतने के लिए जेल भेजे गए बदमाश वहां भी ऐश कर रहे हैं। ठीक इसके उलट बंदियों से ज्यादा वसूली के नाम पर कहीं-कहीं मारपीट का मामला भी सामने आ रहा है।

    राजस्थान की जेलों से समय-समय पर सामने आने वाली शिकायतें इस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। कहीं गैर सुविधा तो कहीं मानवाधिकारों का हनन। आखिर जेल के जिम्मेदार कर क्या रहे हैं? राजस्थान हाईकोर्ट भी जेलों की स्थिति और सुधारों को लेकर जिला न्यायाधीशों से जेलों का निरीक्षण कर रिपोर्ट मांग चुका है। इससे स्पष्ट है कि जेल सुधार केवल विभागीय मामला नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। कैदियों के साथ बुरा बर्ताव भी गलत है तो उन्हें गैर कानूनी ढंग से सुविधा मुहैया कराना भी। जेल सुधार का स्थान है। सजा काट रहा व्यक्ति अपने अपराध की सजा भुगत रहा है, लेकिन उसे अमानवीय व्यवहार या भ्रष्टाचार का शिकार बनाना किसी भी स्थिति में उचित नहीं कहा जा सकता। दूसरी तरफ प्रहरियों की सुरक्षा को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हाल ही में श्रीगंगानगर के बाल कारागृह में नाबालिग बंदियों द्वारा गार्ड की हत्या का मामला सामने आया। घटना ने यह भी दिखाया कि जेलों में केवल बंदियों के अधिकार ही नहीं, प्रहरियों की सुरक्षा और पर्याप्त स्टाफ की जरूरत भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। जेल विभाग के अनुसार बंदियों की शिकायतों के लिए सीलबंद शिकायत पेटियां हैं, जिन्हें जिला एवं सत्र न्यायाधीश खोलते हैं। जेल मुख्यालय में शिकायत निवारण प्रकोष्ठ भी है और वरिष्ठ अधिकारी बंदियों से मुलाकात कर उनकी समस्याएं सुनते हैं। व्यवस्था कागज पर अच्छी है, लेकिन असली सवाल इसके क्रियान्वयन का है।

    शिकायत पेटी लगाना पर्याप्त नहीं, शिकायत पर कार्रवाई होना जरूरी है। शिकायत करने वाले बंदी को यह भरोसा भी होना चाहिए कि शिकायत के बाद उसके साथ बदले की भावना से व्यवहार नहीं होगा। गंभीर शिकायतों की जांच जेल के उसी तंत्र से बाहर के अधिकारी अथवा न्यायिक अधिकारी से कराई जानी चाहिए। अब हालत यह है कि जेलों में स्वीकृत पदों का करीब एक-तिहाई हिस्सा खाली है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सीमित कर्मचारियों के भरोसे जेलों की सुरक्षा, अनुशासन, निगरानी और सुधार कार्यक्रम आखिर कितने प्रभावी ढंग से चल पाएंगे। जेलों में नियमित निरीक्षण की व्यवस्था को और मजबूत करना होगा। निरीक्षण पहले से तय कार्यक्रम के बजाय अचानक हो। बैरकों, रसोई, अस्पताल, मुलाकात स्थल और अन्य संवेदनशील स्थानों की निगरानी हो। सीसीटीवी कैमरे केवल लगाने के लिए नहीं, बल्कि उनकी रिकॉर्डिंग की नियमित समीक्षा के लिए होने चाहिए। यदि कोई प्रहरी बंदी से अवैध वसूली करता है, मारपीट करता है या नियमों का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ तत्काल और निष्पक्ष कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन दूसरी ओर जेल प्रहरियों की कमी, अत्यधिक काम के दबाव और सुरक्षा संबंधी समस्याओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सुधार का अर्थ केवल कैदियों पर सख्ती नहीं है।

    प्रहरियों को भी पर्याप्त प्रशिक्षण, पर्याप्त संख्या में स्टाफ और आधुनिक सुरक्षा साधन देने होंगे। थका हुआ और दबाव में काम करने वाला कर्मचारी भी व्यवस्था के लिए जोखिम बन सकता है। बंदी को काम, शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण, खेल, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और परिवार से स्वस्थ संपर्क जैसी सुविधाएं मिलें तो उसके पुनर्वास की संभावना बढ़ती है। जेल से बाहर निकलने के बाद व्यक्ति फिर अपराध की दुनिया में न लौटे, यही जेल व्यवस्था की असली सफलता होगी। सरकार को हर जेल के लिए जवाबदेही का स्पष्ट पैमाना तय करना चाहिए—कितनी शिकायतें आईं, कितनी का निस्तारण हुआ, कितनी शिकायतों में कार्रवाई हुई, कितने औचक निरीक्षण हुए और कितने कर्मचारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हुई। इन आंकड़ों की नियमित समीक्षा और आवश्यक हिस्से को सार्वजनिक करने से जवाबदेही बढ़ेगी। अपराधी को सजा मिलनी चाहिए, लेकिन जेल के भीतर कानून का शासन उससे भी ज्यादा मजबूत होना चाहिए। शिकायत पर तत्काल कार्रवाई, स्वतंत्र निगरानी, पर्याप्त स्टाफ, तकनीकी निगरानी और सुधारात्मक कार्यक्रम—इन्हीं से  राजस्थान की जेल व्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है।

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