कहीं कचरागाह तो कहीं अतिक्रमण, आखिर जिम्मेदार क्यों नहीं दे रहे ध्यान

    राजस्थान के कई शहरों में सार्वजनिक पार्क अतिक्रमण, कचरे और बदहाल रखरखाव की समस्या से जूझ रहे हैं। नई कॉलोनियों में पार्क और हरित क्षेत्रों के लिए जमीन सुरक्षित नहीं रखने से स्थिति और गंभीर हो रही है। लेख में पार्कों का सर्वे, अतिक्रमण हटाने, नियमित सफाई, पानी, रोशनी और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत बताई गई है। साथ ही पार्षदों और नागरिक समितियों की सक्रिय निगरानी पर जोर दिया गया है।

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    अधिकांश सार्वजनिक पार्कों का भगवान ही मालिक है। कहीं कचरागाह बने तो कहीं अतिक्रमण की चपेट में आ गए। यह हाल अकेले जयपुर का नहीं, प्रदेश के सभी बड़े-छोटे शहरों में यही स्थिति है। आलम यह है कि कॉलोनी काट दी जाती है, उसे बिना पार्क व अन्य सुविधा क्षेत्र छोड़े ही नियमित किया जा रहा है। शिकायत मिलती है तो औपचारिकता निभाने जिम्मेदार आते भी हैं तो पता नहीं क्या देख-भाल कर बिना किसी कार्रवाई के लौट जाते हैं। हालत यह है कि सड़क तक पर अतिक्रमण हो रहा है।

     शहरों के विकास का मतलब  केवल सड़कें, मकान और बाजारों का विस्तार नहीं है। इसका असली आधार उसके खुले मैदान, पार्क हैं। लेकिन जयपुर समेत राजस्थान के कई शहरों में सार्वजनिक पार्कों की स्थिति चिंता पैदा करने वाली है। कहीं पार्कों में घास और पेड़-पौधों का अभाव है, कहीं रखरखाव नहीं हो रहा और कहीं अतिक्रमण ने उनकी शक्ल बिगाड़ दी है। दूसरी ओर नई बस रही कॉलोनियों में पार्क के लिए जमीन छोड़ने की बजाय हर इंच जमीन को व्यावसायिक या आवासीय उपयोग में लाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। जयपुर में पार्कों के रखरखाव और नए पार्क विकसित करने के लिए लगातार टेंडर होते हैं। वर्ष 2026 में भी अलग-अलग क्षेत्रों में मौजूदा पार्कों के रखरखाव और नए पार्कों के विकास के लिए करोड़ों रुपये के कार्य जारी किए गए हैं। लेकिन सवाल केवल बजट और टेंडर का नहीं है। सवाल यह है कि विकसित किए गए पार्कों की नियमित देखभाल कितनी होती है और जिन आवासीय योजनाओं में हरित क्षेत्र निर्धारित हैं, उनका वास्तविक उपयोग क्या हो रहा है।

    सबसे बड़ी समस्या अनियोजित शहरी विस्तार की है। जमीन की कीमत बढ़ने के साथ कॉलोनाइजर और भू-माफिया की नजर खाली जमीन पर रहती है। अवैध कॉलोनियों के मामले में जेडीए को सरकारी जमीन तक अतिक्रमण से मुक्त करानी पड़ रही है। हाल में जयपुर में सरकारी जमीन पर बसाई जा रही अवैध कॉलोनी के खिलाफ कार्रवाई इसका उदाहरण है। ऐसे में यह देखना भी जरूरी है कि नई कॉलोनियों के नक्शे स्वीकृत करते समय पार्क, खेल मैदान और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं के लिए छोड़ी गई जमीन वास्तव में सुरक्षित है या नहीं। पार्क सिर्फ सुबह-शाम घूमने की जगह नहीं हैं। बच्चों के खेलने, बुजुर्गों के टहलने, महिलाओं के लिए सुरक्षित सार्वजनिक स्थान और शहर के तापमान को नियंत्रित रखने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। लगातार बढ़ता कंक्रीट शहर को गर्म करता है, जबकि पेड़ और हरित क्षेत्र पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं। इसलिए पार्कों को विकास में बाधा मानने की सोच बदलनी होगी

    सरकार और स्थानीय निकायों को सबसे पहले सभी कॉलोनियों के पार्कों का सर्वे कराना चाहिए। जो जमीन पार्क के लिए आरक्षित है, उसका रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाए और उस पर किसी भी तरह के अतिक्रमण या भू-उपयोग परिवर्तन को रोकने की व्यवस्था हो। पुराने पार्कों के लिए केवल पौधे लगाने का अभियान पर्याप्त नहीं है, पानी, सुरक्षा, प्रकाश व्यवस्था, सफाई, बैठने की सुविधा और नियमित माली की व्यवस्था भी जरूरी है। नई कॉलोनियों की स्वीकृति में पार्क और खुले स्थान को प्राथमिक शर्त बनाया जाए। नियमों का उल्लंघन करने वाले बिल्डरों और कॉलोनाइजरों पर कार्रवाई हो तथा पार्क की जमीन को किसी अन्य उपयोग में बदलने की कोशिश को गंभीर अपराध माना जाए। साथ ही स्थानीय नागरिक समितियों को पार्कों की निगरानी में भागीदार बनाया जा सकता है। शहर का विकास तभी सार्थक है, जब उसमें रहने वाले लोगों को खुली हवा, हरियाली और स्वस्थ वातावरण भी मिले। आज पार्क की जमीन बचाना कल की पीढ़ी के लिए जगह बचाना है। यदि अभी भी हर खाली भूखंड को केवल कमाई का अवसर समझा गया तो आने वाले वर्षों में शहरों में इमारतें तो बहुत होंगी, लेकिन सांस लेने की जगह कम पड़ जाएगी। पार्क बचेंगे, तभी शहर स्वस्थ और रहने लायक बचेंगे।

    पार्कों की सार-संभाल की जिम्मेदारी संबंधित विभागों की है, लेकिन स्थानीय जनप्रतिनिधि और खासकर वार्ड पार्षद भी इससे अपना पल्ला नहीं झाड़ सकते। आखिर पार्षद अपने वार्ड की जनता के प्रतिनिधि हैं और उन्हें अपने क्षेत्र की बुनियादी सुविधाओं पर नजर रखनी ही होगी। संबंधित विभागों को पार्कों के रखरखाव के लिए केवल बजट जारी करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

    नियमित सफाई, पानी की व्यवस्था, पेड़-पौधों की देखभाल, घास की कटाई, प्रकाश व्यवस्था, टूटे झूलों और बेंच की मरम्मत तथा सुरक्षा पर लगातार निगरानी जरूरी है। जिस पार्क के लिए पैसा खर्च हो रहा है, उसका असर जमीन पर भी दिखाई देना चाहिए। वहीं पार्षदों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। उन्हें अपने वार्ड के पार्कों का नियमित निरीक्षण करना चाहिए और जहां कमी मिले, वहां विभागीय अधिकारियों से जवाब मांगना चाहिए। यदि किसी पार्क के लिए बजट की जरूरत है तो नगर निकाय के सामने प्रस्ताव रखना और उसके क्रियान्वयन की निगरानी करना भी जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी है। केवल शिकायत आने का इंतजार करना पर्याप्त नहीं है।

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