एडमिशन से लेकर री-एडमिशन तक के नाम पर वसूली, बढ़ती फीस, अलग-अलग शुल्क और किताबों-यूनिफॉर्म के अतिरिक्त खर्च ने अभिभावकों की परेशानी बढ़ा दी है। यही नहीं कोढ़ में खाज यह कि गरीब बच्चों को मुफ्त पढ़ाई के लिए आरटीई के तहत एडमिशन तक नहीं मिल रहा। कई बड़े स्कूल सरकार तक को धता बता रहे हैं। हर साल नया सत्र शुरू होते ही अभिभावकों के सामने फीस का भारी बोझ खड़ा हो जाता है। एक ही बच्चे के लिए एडमिशन फीस, एनुअल चार्ज, डेवलपमेंट फीस, गतिविधियों के नाम पर शुल्क और फिर अगले सत्र में री-एडमिशन के नाम पर राशि वसूलने की शिकायतें सामने आती रहती हैं। कई अभिभावक जानते हुए भी विरोध नहीं कर पाते, उन्हें डर रहता है कि विरोध करने पर उनके बच्चे की पढ़ाई प्रभावित हो सकती है।
सवाल यह है कि जब कानून इतना स्पष्ट है तो फिर बड़े और नामी निजी स्कूलों में आरटीई के तहत प्रवेश को लेकर शिकायतें क्यों सामने आती हैं? कहीं सीटें उपलब्ध नहीं बताई जाती हैं, कहीं दस्तावेजों के नाम पर अभिभावकों को परेशान किया जाता है और कहीं प्रवेश प्रक्रिया को इतना जटिल बना दिया जाता है कि गरीब परिवार हिम्मत ही हार जाए। यदि किसी बच्चे का चयन आरटीई के तहत हो चुका है और इसके बावजूद स्कूल उसे प्रवेश नहीं देता, तो यह केवल नियमों की अनदेखी नहीं बल्कि उस बच्चे के अधिकार के साथ खिलवाड़ है। बड़ी समस्या निजी स्कूलों की फीस और एडमिशन फीस की है। सामान्य विद्यार्थियों के अभिभावक लगातार बढ़ती फीस से परेशान हैं।
एडमिशन फीस, वार्षिक शुल्क, विकास शुल्क, गतिविधियों के नाम पर वसूली और किताब-कॉपी, यूनिफॉर्म जैसी चीजों के जरिए शिक्षा लगातार महंगी होती जा रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि निजी स्कूलों की फीस पर प्रभावी निगरानी क्यों नहीं हो पा रही? केवल आदेश जारी कर देने से समस्या हल नहीं होगी, जमीन पर उसकी पालना भी सुनिश्चित करनी होगी। आरटीई के तहत गड़बड़झाला तो मनमानी फीस वसूली से लगता है कि शिक्षा अब बड़े व्यवसाय के रूप में तब्दील हो गई है। सरकारी निगरानी ठीक ढंग से होना जरूरी है। निजी स्कूलों की फीस और अभिभावकों से होने वाली वसूली पर नियम तो हैं, लेकिन उनकी पालना कितनी हो रही है, इसकी प्रभावी निगरानी नजर नहीं आती। शिकायतें होने के बाद कार्रवाई के बजाय अक्सर मामला कागजी खानापूर्ति तक सीमित रह जाता है। यही वजह है कि स्कूल संचालकों में नियमों का भय कम और मनमानी का साहस अधिक दिखाई देता है।
आरटीई के तहत गरीब और वंचित बच्चों को निजी स्कूलों में शिक्षा का अधिकार दिया गया है, लेकिन दूसरी तरफ फीस और प्रवेश के नाम पर आर्थिक रूप से सक्षम अभिभावक भी परेशान हैं। यदि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता नहीं होगी तो आरटीई जैसे कानूनों की भावना भी कमजोर होगी। सरकार को निजी स्कूलों की फीस का स्पष्ट और पारदर्शी ढांचा तय करना चाहिए। एडमिशन और री-एडमिशन के नाम पर होने वाली अनावश्यक वसूली की जांच होनी चाहिए। स्कूलों को हर शुल्क का स्पष्ट विवरण अभिभावकों को देना अनिवार्य किया जाए और शिकायतों के निस्तारण के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए। यह भी जरूरी है कि अभिभावक एकजुट होकर गलत वसूली का विरोध करें। स्कूल शिक्षा देने की जिम्मेदारी निभाएं, लेकिन शिक्षा को व्यापार बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। बच्चों की पढ़ाई अभिभावकों की सबसे बड़ी मजबूरी है। इसी मजबूरी को कमाई का जरिया बनाना बंद होना चाहिए। निजी स्कूलों की फीस और एडमिशन-रीएडमिशन की मनमानी पर अब सरकार को सख्त और दिखाई देने वाली कार्रवाई करनी होगी।



