कमजोर मानसून बढ़ा सकता है पानी की परेशानी, जल संरक्षण अब भी कागजों पर

    कमजोर मानसून से राजस्थान में जल संकट गहरा सकता है। 693 बांधों में करीब 48% पानी है, जबकि पिछले साल 76% था। बीसलपुर 65% और जवाई 26% भरा है। कम बारिश से पेयजल और भूजल पर दबाव बढ़ेगा। लेख में तालाबों, बावड़ियों, जलाशयों और वर्षाजल संरक्षण की अनदेखी, अतिक्रमण व लीकेज रोकने और समयबद्ध जल प्रबंधन योजना की जरूरत बताई गई है।

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    कमजोर मानसून इस बार प्रदेश में पानी की दिक्कत बढ़ा सकता है। खेती ही नहीं कहीं-कहीं तो पेयजल तक की किल्लत हो सकती है। राजस्थान के बांधों में 35 फीसदी बांध सूखे हुए हैं। बीसलपुर बांध में कम पानी भरना आने वाले महीनों में पेयजल आपूर्ति में परेशानी पैदा करेगा। बीसलपुर बांध जयपुर, अजमेर, टोंक और केकड़ी जैसे शहरों और सैंकड़ों गांव की लाइफलाइन है। राजस्थान के 693 बांध में लगभग 48 फीसदी ही पानी है, जबकि पिछले साल अगस्त 2025 में ये ही बांध 76 फीसदी तक भर चुके थे। राजस्थान के बड़े बांध जैसे बीसलपुर सिर्फ 65 फीसदी भरा है और जवाई बांध करीब 26 फीसदी पानी से भरा है। भरतपुर का बरेठा बांध 26 फीट पार पहुंच चुका है। हर साल मानसून से पहले और बाद में सरकार पानी बचाने और जल संरक्षण के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन सवाल यह है कि बारिश की कमी होने पर इन दावों का धरातल पर कितना असर दिखाई देता है। बांधों, तालाबों और जलाशयों में पर्याप्त पानी नहीं पहुंचा तो शहरों और गांवों में पेयजल व्यवस्था पर दबाव बढ़ना तय है। भूजल पर निर्भरता बढ़ेगी और पहले से गिरता भूजल स्तर और नीचे जा सकता है।


     पानी की हर बूंद की कीमत समझने की जरूरत है। इसके बावजूद शहरों में बारिश का पानी नालों के रास्ते बह जाता है। पुराने तालाब, बावड़ियां और जलस्रोत या तो उपेक्षित हैं या अतिक्रमण की चपेट में हैं। रामगढ़ जैसे अनेक बांध इसका उदाहरण है। हाई कोर्ट तक कह चुका है कि अतिक्रमण किस-किस के हैं, सरकार को बताएं पर कोई नहीं सुन रहा। कई जगह नालों का प्राकृतिक बहाव तक बाधित कर दिया गया है। ऐसे में बारिश भले ही कम हो, लेकिन जो पानी बरसता है उसे भी सहेजने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं हो पाती। जयपुर समेत प्रदेश के शहरों में रूफटॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग की बात वर्षों से की जा रही है। नई इमारतों में इसके प्रावधान भी हैं, लेकिन कितने भवनों में यह व्यवस्था वास्तव में काम कर रही है, इसकी निगरानी कौन करता है? सरकारी और निजी संस्थानों में भी वर्षाजल संग्रहण की व्यवस्था की नियमित जांच होनी चाहिए। केवल प्रमाण पत्र और कागजी खानापूर्ति से भूजल स्तर नहीं बढ़ेगा। सबसे चिंताजनक स्थिति भूजल की है। जब बारिश कम होती है तो लोग और अधिक भूजल पर निर्भर होते हैं। इससे पहले से गिरता जलस्तर और नीचे चला जाता है। दूसरी ओर पानी की पाइपलाइनों में लीकेज, अवैध कनेक्शन और अनावश्यक बहाव के कारण रोज बड़ी मात्रा में पानी बर्बाद होता है। यदि उपलब्ध पानी को बचाने की व्यवस्था ही मजबूत नहीं है तो नई योजनाओं और नए स्रोतों की तलाश कितने दिन तक संकट टाल पाएगी?


    जल संरक्षण केवल जलदाय विभाग की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। नगर निकायों, विकास प्राधिकरणों, पंचायतों और आम नागरिकों को भी इसमें भागीदार बनना होगा। तालाबों और जलाशयों से अतिक्रमण हटाने, वर्षाजल के प्राकृतिक बहाव को सुरक्षित रखने और सूखे जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने के लिए समयबद्ध अभियान चलना चाहिए। पौधरोपण की तरह जल संरक्षण के काम भी केवल अभियान बनकर न रह जाएं, इसकी निगरानी जरूरी है। सरकार को अब बारिश के भरोसे रहने के बजाय कम बारिश की स्थिति के लिए जल प्रबंधन की ठोस योजना बनानी होगी। कौन से जलस्रोत सुरक्षित हैं, कितना पानी उपलब्ध है, कहां कितनी जरूरत है और संकट की स्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था क्या होगी, इन सवालों के जवाब अभी से तलाशने होंगे। कमजोर मानसून प्रकृति की चुनौती है, लेकिन जल संरक्षण की अनदेखी हमारी अपनी गलती है। बारिश कम होना हमारे हाथ में नहीं, बारिश के पानी को बचाना जरूर हमारे हाथ में है। अगर अभी भी चेतने में देर की गई तो आने वाली गर्मियों में पानी की किल्लत के लिए केवल मानसून को दोष देना पर्याप्त नहीं होगा। जिम्मेदारी उन व्यवस्थाओं की भी होगी, जो समय रहते पानी बचा नहीं सकीं।

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