कांग्रेस की अंदरूनी कलह फिर सामने आ गई है। चुनाव हारे आरआर तिवाड़ी हों या फिर डॉ अर्चना शर्मा, इस तरह के बयान दे चुके हैं। ऐसा नहीं है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा को कुछ मालूम नहीं है, बहरहाल उनको फिर एक पत्र लिखकर इस तरह की बयानबाजी पर रोक लगाने की मांग की गई है। वैसे यह कोई नई बात भी नहीं है, सांगानेर हो या मालवीय नगर अथवा हवामहल या फिर कोई और सीट, कांग्रेस का प्रत्याशी जब-जब चुनाव हारा, यह बात सामने आई। पार्टी के भितरघात का भी आरोप जमकर लगाया गया। मजे की बात यह कि हर बार चुनाव हारने के बाद समीक्षा भी हुई और कारण भी सामने आए पर हार के जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई नहीं हुई। मजे की बात यह भी कि कांग्रेस ही नहीं भाजपा में भी ऐसा अमूमन कहा-सुना जाता है। नागौर लोकसभा चुनाव के परिणाम से पूर्व भी इसी तरह का वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें अब के चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर परिणाम से पहले ही ज्योति मिर्धा की हार की घोषणा करते नजर आए थे।
ज्योति इसके कुछ महीने पहले विधानसभा चुनाव भी हारीं तब भी भाजपा के कुछ जयचंदों को आरोपित किया गया। यही नहीं कुछ नेता आमतौर पर यह कहते भी मिल जाते हैं कि उसको हरा दिया-उसको जिता दिया, हालांकि उसमें सच्चाई कितनी है, कोई नहीं जानता। हाल के वर्षों में कई चुनावों में यह देखने को मिला कि अधिकृत उम्मीदवार की हार का कारण विपक्ष से अधिक अपने ही दल के असंतुष्ट नेता बने। कहीं बगावत हुई, कहीं निर्दलीय उम्मीदवार खड़े किए गए और कहीं कार्यकर्ताओं को निष्क्रिय रहने का संदेश दिया गया। इसका सबसे बड़ा नुकसान पार्टी की साख, संगठन की एकजुटता और लोकतांत्रिक संस्कृति को होता है। हालांकि दोषारोपण भी बहुत कुछ कहता है, पार्टी की रीति-नीति के खिलाफ अपने ही प्रत्याशी को हराने की साजिश को माफ भी नहीं किया जा सकता। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आर.आर. तिवाड़ी ने जयपुर की हवामहल विधानसभा सीट पर पार्टी प्रत्याशी डॉ. अर्चना शर्मा की हार के लिए “जयचंदों” को जिम्मेदार ठहराते हुए कार्रवाई की मांग की। यह बयान केवल एक नेता की नाराजगी नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति की ओर संकेत करता है, जिसमें चुनावी हार के बाद सबसे पहले भितरघात का मुद्दा उठता है।
सवाल यह है कि यदि वास्तव में पार्टी के भीतर कुछ लोगों ने अधिकृत प्रत्याशी को हराने का काम किया, तो उनके खिलाफ कार्रवाई अब तक क्यों नहीं हुई? और यदि आरोपों के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं, तो हर हार का ठीकरा “जयचंदों” के सिर क्यों फोड़ा जाता है? यह पहली बार नहीं है जब भितरघात की चर्चा हुई हो। भाजपा हो या कांग्रेस, लगभग हर दल में हार के बाद कुछ नेताओं या कार्यकर्ताओं पर पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप लगते रहे हैं। जांच समितियां बनती हैं, रिपोर्ट मांगी जाती है और अनुशासनात्मक कार्रवाई का आश्वासन दिया जाता है। लेकिन समय बीतने के साथ मामला ठंडा पड़ जाता है और अधिकांश मामलों में कोई स्पष्ट निष्कर्ष सामने नहीं आता। यदि आर.आर. तिवाड़ी का आरोप सही है और डॉ. अर्चना शर्मा को हराने में पार्टी के ही कुछ लोगों की भूमिका रही है, तो कांग्रेस नेतृत्व को इस पर गंभीरता से निर्णय लेना चाहिए था। अनुशासन केवल साधारण कार्यकर्ताओं के लिए नहीं, बल्किप्रभावशाली नेताओं पर भी समान रूप से लागू होना चाहिए। इससे संगठन में यह संदेश जाएगा कि पार्टी हित सर्वोपरि है।
दूसरी ओर, कांग्रेस को केवल भितरघात की चर्चा तक सीमित नहीं रहना चाहिए। हार के पीछे उम्मीदवार चयन, स्थानीय संगठन की स्थिति, चुनावी रणनीति, जनता की अपेक्षाएं और बूथ स्तर की सक्रियता जैसे पहलुओं का भी निष्पक्ष मूल्यांकन आवश्यक है। केवल “जयचंदों” की चर्चा करने से वास्तविक कमियां छिप सकती हैं। यह बात केवल कांग्रेस पर ही लागू नहीं होती। लगभग सभी राजनीतिक दल चुनावी हार के बाद किसी न किसी रूप में भितरघात का आरोप लगाते हैं। लेकिन यदि हर बार दोषियों के नाम सामने आने के बावजूद कार्रवाई नहीं होती, तो यह सवाल नेतृत्व की इच्छाशक्ति पर भी खड़ा होता है। अनुशासन तभी प्रभावी माना जाएगा जब नियम सभी पर समान रूप से लागू हों। मजबूत संगठन वही होता है जो हार से सीखने का साहस रखता हो। भितरघात हुआ है तो दोषियों को दंड मिले, और यदि संगठनात्मक कमजोरियां हैं तो उन्हें दूर किया जाए। आत्ममंथन और जवाबदेही के बिना केवल “जयचंदों” का शोर भविष्य की चुनावी सफलताओं का आधार नहीं बन सकता।



