लापरवाही की आग में दम तोड़ती जिंदगियां

    दिल्ली के मालवीय नगर होटल अग्निकांड ने देश में अग्नि सुरक्षा व्यवस्थाओं की गंभीर खामियों को उजागर कर दिया है। कई होटल, अस्पताल और व्यावसायिक प्रतिष्ठान बिना पर्याप्त सुरक्षा इंतजामों व फायर एनओसी के संचालित हो रहे हैं। हादसों के बाद जांच और कार्रवाई की घोषणाएं तो होती हैं, लेकिन स्थायी सुधार नहीं दिखता। नियमित अग्नि सुरक्षा ऑडिट, कड़े निरीक्षण, नियम उल्लंघन पर सख्त दंड और जवाबदेही तय किए बिना ऐसी घटनाओं पर रोक लगाना मुश्किल है।

    0
    60

    दिल्ली के मालवीय नगर की एक होटल आग की चपेट में आ गई। 11 विदेशियों समेत 21 लोग जिंदा जल गए जबकि 40 लाख घायल हुए। आग की घटनाएं समय-समय पर होती रहती हैं। इस अग्निकांड ने एक बार फिर देश में अग्नि सुरक्षा व्यवस्थाओं की पोल खोल दी है। पिछले साल जयपुर के एसएमएस अस्पताल में तो गोवा के नाइट क्लब में आग लगने से कई लोग मौत के शिकार हुए। तेलंगाना में रासायनिक फैक्ट्री तो गुजरात में पटाखा फैक्ट्री में आग ने कई परिवारों की खुशियां राख में तब्दील कर दी। आए दिन कभी बस में आग तो कभी मकान में, घटना के बाद खामियां निकाली जाती हैं पर कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं होता। कुछ दिन सुर्खियां बनने वाले ये हादसे धीरे-धीरे भुला दिए जाते हैं। सिस्टम से कोई चलना नहीं चाहता और सरकार-प्रशासन इन्हें रोकता-टोकता नहीं है, शायद यही कारण है कि ऐसे हादसों में बढ़ोत्तरी हो रही है।

    दिल्ली की जिस होटल में आग लगी, उसमें भी कई तरह की खामियां निकलीं। छह कमरों की अनुमति थी जबकि इसमें 25 कमरे बना लिए गए। बाहर निकलने का रास्ता संकरा था, यहां तक कि होटल के पास फायर एनओसी तक नहीं थी। आने-जाने वालों का रास्ता भी एक ही था। ऐसी खामियां पहले के अग्निकाण्ड में भी सामने आई। आज जयपुर-जोधपुर-उदयपुर समेत कई बड़े शहरों में बनी कुछ होटलें भी खतरे से बाहर नहीं हैं। जयपुर के सिंधी कैम्प इलाके में गलियों में बनी कई होटलें ऐसी हैं जहां कभी भी हादसे हो सकते हैं और यहां आग से बचने के कोई खास इंतजाम तक नहीं हैं। ऐसी कई जगह है जहां दमकल तक नहीं घुस सकती। आखिर इन होटलों को चलाने की अनुमति कैसे मिली हुई है। असल में देश में जब भी किसी होटल, अस्पताल, फैक्ट्री या व्यावसायिक भवन में भीषण आग लगती है, तब प्रशासन, नगर निकाय और अग्निशमन विभाग सक्रिय नजर आते हैं। जांच के आदेश दिए जाते हैं, जिम्मेदारों पर कार्रवाई की घोषणा होती है और सुरक्षा मानकों की समीक्षा की बात कही जाती है। लेकिन कुछ समय बाद सब कुछ ठंडा पड़ जाता है। अगली दुर्घटना होने तक व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर चलने लगती है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन होटलों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में अग्निशमन के पर्याप्त उपकरण नहीं हैं, आपातकालीन निकास की व्यवस्था नहीं है या सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया गया, उन्हें संचालन की अनुमति आखिर मिली कैसे? क्या संबंधित विभागों ने निरीक्षण नहीं किया या फिर निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित रहा? अक्सर देखा गया है कि आग लगने के बाद जांच रिपोर्ट में सुरक्षा नियमों की अनदेखी, फायर एनओसी की कमी, अवैध निर्माण और आपातकालीन व्यवस्थाओं के अभाव की बातें सामने आती हैं। यदि ये कमियां पहले से मौजूद थीं तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई?

    यह सवाल केवल किसी एक विभाग का नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की जवाबदेही से जुड़ा है। दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि कई प्रतिष्ठान अग्निशमन उपकरण लगाने को अतिरिक्त खर्च मानते हैं, जबकि यह लोगों की जान बचाने का सबसे महत्वपूर्ण साधन है। कई जगह उपकरण लगे भी होते हैं तो वे या तो खराब होते हैं या कर्मचारियों को उनके उपयोग का प्रशिक्षण नहीं होता। सुरक्षा के प्रति यह लापरवाही हादसों को और भयावह बना देती है। जरूरत इस बात की है कि जांच केवल औपचारिकता न बनकर ठोस कार्रवाई तक पहुंचे। दोषी अधिकारियों और प्रतिष्ठान संचालकों की जवाबदेही तय हो, नियमित निरीक्षण हो और सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। जब तक नियमों का पालन सुनिश्चित नहीं होगा और लापरवाही पर कठोर दंड नहीं मिलेगा, तब तक हर अग्निकांड के बाद जांच तो होगी, लेकिन नतीजा फिर सिफर ही रहेगा। जयपुर-दिल्ली हो या फिर कोई और शहर हो, आग की घटनाओं को रोकने के लिए सिस्टम को सुधारना होगा। ऐसे होटल हो या अन्य प्रतिष्ठान, इनकी बराबर चैकिंग कर आग से बचने के इंतजाम पुख्ता करने होंगे ताकि किसी निर्दोष की जान न चली जाए। आग की घटनाएं प्राकृतिक नहीं बल्कि अधिकांश मामलों में मानवीय लापरवाही और प्रशासनिक उदासीनता का परिणाम होती हैं। जब तक भवनों, होटलों, अस्पतालों और औद्योगिक इकाइयों में नियमित और निष्पक्ष अग्नि सुरक्षा ऑडिट नहीं होंगे तथा नियमों के उल्लंघन पर कठोर दंड नहीं दिया जाएगा, तब तक ऐसी घटनाओं पर प्रभावी रोक लगाना मुश्किल होगा। देश को अब हादसों के बाद संवेदना व्यक्त करने के बजाय हादसों से पहले सुरक्षा सुनिश्चित करने की संस्कृति विकसित करनी होगी। यह भी सोचना होगा कि नियम विरुद्ध इन होटलों को लाइसेंस कैसे मिल जाता है। आग की जांच के बाद दोषियों को सजा मिले, ऐसा सिस्टम हो।

    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.