दो-चार दिन के अभियान से नहीं बढ़ने वाली हरियाली…जनता को जागना होगा

    विश्व पर्यावरण दिवस पर हर साल बड़े स्तर पर पौधरोपण और जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन इनका असर स्थायी रूप से नजर नहीं आता। बढ़ता प्रदूषण, घटती हरियाली, गिरता भूजल स्तर और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां लगातार गंभीर होती जा रही हैं। राजस्थान में लाखों पौधे लगाने के दावे होते हैं, लेकिन उनकी देखभाल के अभाव में अधिकांश पौधे पेड़ नहीं बन पाते। केवल पौधारोपण नहीं, बल्कि पौधों के संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण और जनभागीदारी पर ध्यान देना जरूरी है। पर्यावरण संरक्षण एक दिन का अभियान नहीं, बल्कि निरंतर जिम्मेदारी है।

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    विश्व पर्यावरण दिवस हमेशा की तरह मनाया जा रहा है। पूरे जोर-शोर से सरकार ही नहीं अनेक संगठन/ संस्थाएं लोगों को जागरूक कर रही हैं। हरियाली से खुशहाली की राह बताते हुए पौधरोपण के साथ पर्यावरण संरक्षण की महत्ता समझाई जा रही है। गोष्ठी-सेमिनार के साथ प्रतियोगिताएं भी खूब चल रही हैं। पर्यावरण को लेकर रैली से दौड़ तक सबकुछ लगभग वही है, जो साल दर साल से चलता आ रहा है। मानसून भी आने वाला है, ऐसे में कुछ दिन हरियाली लाओ-पर्यावरण बचाओ का संदेश भी गली-गली गूंजता दिखेगा। कुछ दिन बाद सबकुछ शांत हो जाएगा, न फैलते प्रदूषण पर बात होगी न उजड़ती हरियाली पर। जयपुर समेत प्रदेश नहीं देशभर में विश्व पर्यावरण दिवस पर हर वर्ष बड़े-बड़े संकल्प लिए जाते हैं, पौधारोपण अभियान चलाए जाते हैं और पर्यावरण संरक्षण की बातें होती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि पर्यावरण की स्थिति लगातार खराब होती जा रही है। शहरों की हवा जहरीली हो रही है, नदियां प्रदूषित हैं, भूजल स्तर गिर रहा है और हरियाली तेजी से सिमट रही है। विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति का संतुलन बिगड़ता जा रहा है, जिसका खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है। राजस्थान सहित देश के कई हिस्सों में तापमान नए रिकॉर्ड बना रहा है। गर्मी का बढ़ता प्रकोप, अनियमित बारिश, सूखा और बाढ़ जैसी घटनाएं जलवायु परिवर्तन के स्पष्ट संकेत हैं। इसके बावजूद पर्यावरण संरक्षण को लेकर गंभीरता का अभाव दिखाई देता है।


    विकास परियोजनाओं के नाम पर पेड़ों की कटाई जारी है, जबकि उनके बदले पर्याप्त पौधे न तो लगाए जाते हैं और न ही उनकी देखभाल होती है। प्रदूषण भी एक बड़ी चुनौती बन चुका है। वाहनों की बढ़ती संख्या, प्लास्टिक कचरा और खुले में कचरा जलाने जैसी गतिविधियां पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही हैं। सरकारें नियम बनाती हैं, अभियान चलाती हैं, लेकिन जब तक आमजन अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तब तक हालात में बड़ा बदलाव संभव नहीं है।
    राजस्थान में हर वर्ष लाखों पौधे लगाने के दावे किए जाते हैं। जयपुर सहित कई शहरों और गांवों में मानसून के दौरान बड़े स्तर पर पौधरोपण अभियान चलाए जाते हैं। सरकारी विभाग, जनप्रतिनिधि, सामाजिक संगठन और आम नागरिक भी इसमें भाग लेते हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि लगाए गए पौधों में से कितने वास्तव में पेड़ बन पाते हैं? हकीकत यह है कि पौधरोपण के बाद उनकी देखभाल पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता। कई जगह पौधे लगाने के कुछ ही दिनों बाद वे पानी, सुरक्षा और रखरखाव के अभाव में सूख जाते हैं। पौधों को पशुओं से बचाने के लिए ट्री गार्ड नहीं लगाए जाते या लगाए भी जाते हैं तो उनकी निगरानी नहीं होती। नतीजा यह होता है कि कागजों में हरियाली बढ़ती है, लेकिन जमीन पर उसका असर बहुत कम दिखाई देता है। जयपुर समेत राजस्थान के शहर लगातार बढ़ती गर्मी और घटती हरियाली की समस्या से जूझ रहे हैं। विकास परियोजनाओं, सड़क विस्तार और निर्माण कार्यों के कारण बड़ी संख्या में पेड़ काटे जाते हैं। इनके बदले पौधे तो लगाए जाते हैं, लेकिन उनकी जीवित रहने की दर पर शायद ही कभी गंभीर समीक्षा होती है। यदि लगाए गए पौधों में से अधिकांश जीवित ही नहीं रहते तो पौधरोपण अभियान का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

    सरकार और संबंधित विभागों को केवल पौधे लगाने के आंकड़ों पर नहीं, बल्कि उनके संरक्षण और जीवित रहने की दर पर भी जवाबदेही तय करनी चाहिए। प्रत्येक पौधे की नियमित निगरानी, पानी की व्यवस्था और संरक्षण सुनिश्चित किया जाना चाहिए। साथ ही स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों की भागीदारी भी बढ़ानी होगी। पर्यावरण संरक्षण केवल एक दिन का अभियान नहीं, बल्कि लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। यदि वास्तव में राजस्थान को हराभरा बनाना बनाना है तो पौधे लगाने के साथ-साथ उन्हें पेड़ बनने तक संभालने की जिम्मेदारी भी निभानी होगी। हर पौधा जीवित रहेगा, तभी हरियाली बढ़ेगी और आने वाली पीढ़ियों को बेहतर पर्यावरण मिल सकेगा। पर्यावरण को संरक्षित करने के लिए प्रदूषण पर भी लगाम लगानी होगी जो जागरूकता के साथ सरकार की पाबंदी से ही लग सकेगा।

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