महंगाई की मार से जनता को बचाओ सरकार

    रसोई से लेकर बाजार तक बढ़ती लागत ने आम परिवारों की चिंता बढ़ा दी है। ऊर्जा कीमतों में लगातार हो रहे बदलाव का असर अब हर घर के मासिक खर्च पर दिखाई दे रहा है, जबकि राहत की उम्मीदें अभी भी अधूरी नजर आ रही हैं।

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    घरेलू गैस सिलेंडर फिर महंगा हो गया। तीन माह के भीतर इसके दाम दूसरी बार बढ़ाए गए हैं। सात मार्च को साठ रुपए तो इस बार 29 रुपए की बढ़ोतरी की गई है। इससे पहले कॉमर्शियल गैस की भी कीमत बढ़ चुकी है। यही नहीं पेट्रोल-डीजल के दाम तीन बार बढ़ चुके हैं। महंगाई के दौर में बार-बार बढ़ती ईंधन और गैस की कीमतें आम आदमी की मुश्किलें बढ़ा रही हैं। मानने को यह मामूली सी वृद्धि मानी जा सकती है पर इसके आधार पर और बढ़ने वाली महंगाई के बारे में भी सोचना होगा। समय-समय पर महंगाई नियंत्रण के दावे किए जाते हैं, लेकिन ईंधन और गैस की बढ़ती कीमतें इन दावों पर सवाल खड़े करती हैं। पेट्रोल-डीजल महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है, जिसका असर खाद्य पदार्थों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है। वहीं रसोई गैस महंगी होने से परिवारों का मासिक बजट और बिगड़ जाता है।

    बताया यह जा रहा है कि तेल कंपनियों ने कच्चे माल की कमी और आयात में आ रही बाधाओं को देखते हुए गैस सिलेंडरों की कीमतों में इजाफा किया है। इसके पीछे तर्क यह भी दिया जा रहा है कि सरकारी तेल कंपनियों को बेचे जाने वाले प्रत्येक घरेलू एलपीजी सिलेंडर पर करीब 703 रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा था। यही वजह है कि कंपनियां कीमतों में संशोधन की मांग कर रही थीं। कंपनियों ने अपना घाटा कम करने के लिए उपभोक्ताओं पर यह अतिरिक्त भार डाला है। साल 2011 के आसपास अधिकांश शहरों में घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत लगभग चार सौ रुपए थी, जबकि आज राजस्थान के कई शहरों में यह करीब 950 रुपए पहुंच चुकी है। यानी 15 वर्षों में एक सिलेंडर पर लगभग साढ़े पांच सौ रुपए तक का अतिरिक्त बोझ बढ़ा है। चिंता की बात यह है कि गैस सिलेंडर अब कई परिवारों के लिए महंगा सौदा बनने लगा है। वर्षों तक स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने के लिए लोगों को गैस कनेक्शन लेने के लिए प्रेरित किया गया, लेकिन यदि कीमतें लगातार बढ़ती रहीं तो गरीब और निम्न आय वर्ग के परिवार फिर से पारंपरिक ईंधनों की ओर लौट सकते हैं। इससे स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

    महंगाई के इस दौर में बार-बार बढ़ती गैस कीमतें केवल आर्थिक मुद्दा नहीं हैं, बल्कि सामाजिक चिंता का विषय भी हैं। आम आदमी को यह भरोसा चाहिए कि उसकी रसोई का चूल्हा महंगाई की भेंट नहीं चढ़ेगा। बार-बार बढ़ते दाम परिवारों का बजट बिगाड़ रहे हैं। रसोई गैस महंगी होती है तो घरेलू खर्च बढ़ता है, पेट्रोल-डीजल महंगे होते हैं तो परिवहन लागत बढ़ने से लगभग हर वस्तु की कीमत प्रभावित होती है।जरूरतमंद परिवारों को राहत, सब्सिडी व्यवस्था की समीक्षा और करों पर पुनर्विचार जैसे कदमों से आमजन को कुछ राहत मिल सकती है। मध्यम वर्ग, मजदूर और निम्न आय वर्ग के परिवारों को अपनी जरूरतों में कटौती करनी पड़ती है और कई बार आवश्यक खर्चों को भी टालना पड़ता है। महंगाई का बोझ केवल रसोई तक सीमित नहीं रहता, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजमर्रा की जरूरतों पर भी असर डालता है।

    सरकार का तर्क हो सकता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार और आयात लागत कीमतों को प्रभावित करते हैं, लेकिन आम नागरिक के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल राहत का है। जनता यह जानना चाहती है कि लगातार बढ़ते दामों के बीच उसके जीवन को आसान बनाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? महंगाई पर प्रभावी नियंत्रण और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में स्थिरता किसी भी सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। क्योंकि जब-जब जरूरी वस्तुओं के दाम बढ़ेंगे, तब-तब सबसे ज्यादा परेशानी आम जनता को ही झेलनी पड़ेगी। सरकार को चाहिए कि वो आम आदमी की रोजमर्रा की आवश्यकताओं पर ध्यान दे, इसके लिए आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिएं।

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