अभियान से नहीं चलेगा काम, रोजमर्रा निगरानी जरूरी

    राजस्थान में पुलिस काली फिल्म, फर्जी नंबर प्लेट और यातायात नियमों के उल्लंघन के खिलाफ महाभियान चला रही है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल विशेष अभियान नहीं, बल्कि ओवरस्पीडिंग, गलत दिशा में ड्राइविंग और अन्य नियम तोड़ने वालों पर नियमित कार्रवाई जरूरी है। निरंतर निगरानी, ई-चालान और सड़क सुरक्षा जागरूकता से ही दुर्घटनाओं में कमी लाई जा सकती है।

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    Rajasthan Traffic Police : जयपुर। वाहन चालकों के खिलाफ प्रदेशभर में पुलिस का महाभियान जारी है। ब्लैक फिल्म फर्जी नंबर प्लेटों के खिलाफ जोर-शोर से कार्रवाई की जा रही है। पुलिस का यह प्रयास सराहनीय है। सड़कों पर दौड़ते कई वाहनों पर काली फिल्म लगी मिली। तो कई लोगों के वाहनों पर नंबर प्लेट पर नियमों के विपरीत पद, जाति, संगठन, राजनीतिक पहचान या अन्य नाम लिखे पाए गए। यह प्रवृत्ति केवल यातायात नियमों का उल्लंघन ही नहीं, बल्कि कानून के प्रति उदासीनता का भी प्रतीक है। जयपुर सहित राजस्थान के अधिकांश शहरों में यही स्थिति पाई गई।

    सुप्रीम कोर्ट और मोटर वाहन नियमों के अनुसार वाहनों पर निर्धारित मानकों से अधिक काली फिल्म लगाना प्रतिबंधित है। इसका उद्देश्य सुरक्षा सुनिश्चित करना है, क्योंकि अत्यधिक गहरे शीशों से वाहन के भीतर की गतिविधियों पर नजर रखना मुश्किल हो जाता है। अपराध की घटनाओं में भी ऐसे वाहनों का इस्तेमाल कई बार सामने आया है। इसके बावजूद सड़कों पर बड़ी संख्या में ऐसे वाहन दिखाई देना आम बात हो गई थी। इसी तरह नंबर प्लेट पर “अध्यक्ष”, “पार्षद”, “एडवोकेट”, “सरपंच”, “प्रदेश सचिव” या अन्य पहचान लिखवाना भी नियमों के विरुद्ध है। नंबर प्लेट का उद्देश्य वाहन की पहचान सुनिश्चित करना है, न कि व्यक्ति की सामाजिक या राजनीतिक हैसियत का प्रदर्शन करना। जब नंबर प्लेट पर अनावश्यक शब्द लिखे जाते हैं तो वाहन की पहचान प्रभावित होती है और कानून का उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है। पुलिस और परिवहन विभाग समय-समय पर अभियान तो चलाते हैं, लेकिन उनकी सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि ये कार्रवाई कुछ दिनों तक ही सीमित रहती है।

    जब तक अभियान चलता है तब तक ही लोगों में भय बना रहता है। इसके खत्म होते ही स्थिति फिर पहले जैसी दिखाई देती है। यही कारण है कि नियमों का उल्लंघन करने वालों में कानून का भय पैदा नहीं हो पाता। लोगों को यह भरोसा हो जाता है कि कुछ दिनों की सख्ती के बाद फिर ढील मिल जाएगी। यदि कार्रवाई नियमित और निरंतर हो तो ऐसे उल्लंघनों में स्वतः कमी आ सकती है। यह भी सही है कि गाड़ियों की स्पीड पर कोई कंट्रोल नहीं है। नियमों की पालना सही नहीं होने से भी कई बार हादसे हो रहे हैं। तेज गति से वाहन चलाना, लालबत्ती की अनदेखी करना, गलत दिशा में वाहन दौड़ाना, मोबाइल पर बात करते हुए ड्राइविंग करना और हेलमेट-सीट बेल्ट जैसे बुनियादी सुरक्षा नियमों की अनदेखी करना आम बात हो गई है। सवाल यह है कि आखिर यह मनमानी कब रुकेगी और सड़कें कब सुरक्षित बनेंगी? यही लापरवाही हर साल हजारों दुर्घटनाओं और अनमोल जिंदगियों के नुकसान का कारण बनती है।

    जयपुर सहित राजस्थान के कई शहरों में ओवरस्पीडिंग बड़ी समस्या बन चुकी है। रिहायशी इलाकों, बाजारों और स्कूलों के आसपास भी तेज गति से वाहन दौड़ाए जाते हैं। कई चालक यह भूल जाते हैं कि सड़क केवल उनकी नहीं, बल्कि पैदल यात्रियों, बुजुर्गों, बच्चों और अन्य वाहन चालकों की भी है। थोड़ी सी लापरवाही किसी परिवार की जिंदगी हमेशा के लिए बदल सकती है। हालांकि केवल वाहन चालकों को दोष देकर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। यातायात पुलिस और संबंधित विभागों को भी अपनी व्यवस्था मजबूत करनी होगी। कार्रवाई केवल विशेष अभियानों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। स्पीड मॉनिटरिंग, सीसीटीवी निगरानी, ई-चालान और नियमित जांच को लगातार जारी रखना होगा।

    नियम तोड़ने वालों पर बिना किसी भेदभाव के कार्रवाई होगी तभी कानून का सम्मान बढ़ेगा। इसके साथ ही सड़क सुरक्षा को शिक्षा और सामाजिक जिम्मेदारी का विषय बनाना होगा। स्कूलों, कॉलेजों और सार्वजनिक अभियानों के माध्यम से लोगों में यह भावना विकसित करनी होगी कि यातायात नियम किसी सरकार के लिए नहीं, बल्कि उनकी अपनी सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं। केवल काली फिल्म या नंबर प्लेट पर ही कार्रवाई से सबकुछ नहीं होगा, हादसे न हों, इसके लिए गलत ढंग-स्पीड से वाहन चलाने वालों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए। पुलिस और परिवहन विभाग को केवल विशेष अभियान चलाने के बजाय रोजमर्रा की व्यवस्था का हिस्सा बनाकर निगरानी करनी होगी। कानून का असर तभी दिखेगा जब नियम तोड़ने वालों को हर समय कार्रवाई का डर रहेगा।

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