इस बार भी मानसून राहत के बजाय बन न जाए आफत

    मानसून राहत के साथ चुनौतियां भी लेकर आता है, लेकिन हर वर्ष प्रशासनिक तैयारियों की कमी से जलभराव, यातायात बाधित होने और आमजन को परेशानी का सामना करना पड़ता है। नालों की अधूरी सफाई, कमजोर ड्रेनेज व्यवस्था, अतिक्रमण और अव्यवस्थित शहरीकरण समस्या को बढ़ाते हैं। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद हालात नहीं बदलते। जरूरत है कि सरकार और नगर निकाय कागजी दावों के बजाय समयबद्ध, वैज्ञानिक और स्थायी समाधान लागू करें, ताकि मानसून लोगों के लिए राहत बने, आफत नहीं।

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    मानसून आने वाला है, भीषण गर्मी से राहत पाने के लिए सभी इसका बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। इससे मिलने वाले सुकून से ज्यादा होने वाली परेशानियां भी लोगों को डरा रही है। यह परेशानी अकेले जयपुर की नहीं बल्कि सभी बड़े शहरों के साथ कस्बों की है। हर बार बड़ी तैयारियां का एलान होता है पर हकीकत में ऐसा होता नहीं है। कुछ घंटों की बारिश होते ही सड़कें लबालब हो जाती हैं, कॉलोनियों में पानी भर जाता है, यातायात ठप पड़ जाता है और आमजन को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। सवाल यह है कि जब हर साल मानसून आता है और उसकी चुनौतियां भी लगभग एक जैसी होती हैं, तो फिर तैयारियां समय पर क्यों नहीं हो पातीं? सबसे बड़ी समस्या नालों और ड्रेनेज व्यवस्था की है। हर वर्ष मानसून से पहले नालों की सफाई के दावे किए जाते हैं, बैठकों का दौर चलता है और योजनाएं बनाई जाती हैं, लेकिन पहली ही बारिश में इन दावों की पोल खुल जाती है। कई स्थानों पर नाले कचरे और कीचड़ से भरे रहते हैं, जिससे पानी की निकासी नहीं हो पाती। इसका परिणाम जलभराव और नागरिकों की परेशानी के रूप में सामने आता है।

    शहरीकरण की अव्यवस्थित प्रक्रिया भी इस समस्या को बढ़ा रही है। प्राकृतिक जल निकासी मार्गों पर अतिक्रमण, तालाबों और जोहड़ों का खत्म होना तथा बिना दीर्घकालिक योजना के कॉलोनियों का विस्तार शहरों को बारिश के प्रति अधिक संवेदनशील बना रहा है। विकास कार्यों के नाम पर कंक्रीट का विस्तार तो हुआ, लेकिन जल निकासी के बुनियादी ढांचे पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया चिंता की बात यह है कि हर साल मानसून के बाद समीक्षा होती है, अधिकारियों को निर्देश दिए जाते हैं, लेकिन अगले वर्ष फिर वही हालात सामने आ जाते हैं। इससे प्रशासनिक जवाबदेही पर भी प्रश्नचिह्न लगता है। यदि समय रहते नालों की सफाई, जल निकासी व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण और अतिक्रमण हटाने जैसे कार्य गंभीरता से किए जाएं तो काफी हद तक समस्याओं से बचा जा सकता है।

    मानसून की बारिश प्रकृति का उपहार है, लेकिन जब प्रशासनिक लापरवाही और अधूरी तैयारियां इसमें शामिल हो जाती हैं तो इसका सबसे बड़ा खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ता है। मानसून से पहले सरकार और नगर निकाय मानसून से पहले नालों की सफाई, जल निकासी व्यवस्था की मरम्मत, संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त पंप लगाने तथा आपदा प्रबंधन टीमों की तैनाती जैसे कदम उठाने का दावा करते हैं। कई शहरों में अधिकारियों को विशेष जिम्मेदारियां भी सौंपी जाती हैं। लेकिन समस्या यह है कि अधिकांश तैयारियां समय पर और पूरी गंभीरता से नहीं हो पातीं। कई नालों की सफाई अधूरी रहती है, कचरा प्रबंधन कमजोर रहता है और जल निकासी तंत्र वर्षों पुराना होने के कारण भारी बारिश का दबाव नहीं झेल पाता।

    यह भी जरूरी है कि मानसून की तैयारियों की स्वतंत्र निगरानी हो और जिन क्षेत्रों में हर साल जलभराव होता है, वहां स्थायी समाधान निकाला जाए। केवल बैठकों और दावों से समस्या हल नहीं होगी। जनता यह जानना चाहती है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद हर वर्ष वही संकट क्यों खड़ा हो जाता है। मानसून कोई अप्रत्याशित आपदा नहीं है। यह हर साल आने वाली निश्चित प्राकृतिक प्रक्रिया है। इसलिए सरकार और स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी बनती है कि वे तदर्थ उपायों के बजाय स्थायी समाधान पर ध्यान दें। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी और योजनाएं जमीन पर नहीं उतरेंगी, तब तक हर बारिश के साथ जनता की परेशानियां भी लौटती रहेंगी। मानसून की चुनौतियां कोई नयी नहीं हैं। जरूरत इस बात की है कि सरकार, नगर निकाय और संबंधित विभाग केवल कागजी तैयारियों तक सीमित न रहें, बल्कि धरातल पर प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करें। शहरों को हर साल डूबने से बचाने के लिए स्थायी और वैज्ञानिक समाधान अपनाने होंगे। आखिरकार, जनता को यह भरोसा मिलना चाहिए कि बारिश राहत लेकर आए, परेशानी नहीं।

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