मंत्री की पुलिसकर्मियों से अभद्रता पर हाहाकर, जनता की भी सुध ले सरकार

    सहकारिता मंत्री गौतम कुमार दक पर ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी के साथ अभद्र व्यवहार के आरोप के बाद प्रदेशभर में सेवानिवृत्त पुलिसकर्मियों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। पुलिस संगठनों ने इसे पूरे पुलिस बल का अपमान बताते हुए मंत्री के खिलाफ सख्त कार्रवाई और पद से हटाने की मांग की है। यह मामला जनप्रतिनिधियों और सरकारी कर्मचारियों के बीच सम्मानजनक व्यवहार की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है।

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    सहकारिता मंत्री गौतम कुमार दक के खिलाफ पुलिसकर्मी विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। पूरे प्रदेश में उनके खिलाफ पुलिस ने मोर्चा खोल दिया है हालांकि अभी सेवानिवृत्त पुलिसकर्मी ही सड़कों पर दिखाई दे रहे हैं। विरोध होना भी चाहिए, किसी भी पुलिसकर्मी से अभद्र भाषा और व्यवहार के लिए। मंत्री के इस व्यवहार को पुलिस का अपमान बताया गया है। दक को उनके पद से हटाने के साथ कड़ी कार्रवाई की मांग भी उठ रही है।

    मंत्री ही नहीं सांसद-विधायक तक गाहे-बगाहे पुलिस को ‘कोसते’ रहते हैं। पहले भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं, लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि हो या सरकारी कर्मचारी, इनकी अपनी-अपनी जिम्मेदारियां होती हैं। मंत्री, विधायक या अन्य जनप्रतिनिधि जनता चुनती है, वहीं पुलिसकर्मी कानून-व्यवस्था बनाए रखने और अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए नियुक्त होते हैं। ऐसे में किसी मंत्री का ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी के साथ अभद्र व्यवहार करना न केवल अशोभनीय है, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था और लोकतांत्रिक मूल्यों के भी विपरीत है। इस मामले में विपक्ष ने सरकार को घेरने का प्रयास किया है, जबकि पुलिसकर्मियों और विभिन्न कर्मचारी संगठनों में भी नाराजगी देखने को मिल रही है। यह स्वाभाविक है, क्योंकि किसी भी कर्मचारी वर्ग का मनोबल तभी मजबूत रहता है जब उसे अपने कर्तव्य निर्वहन के दौरान सम्मान और सुरक्षा का एहसास हो। यहां बताते चलें कि नेताओं के अभद्र व्यवहार का शिकार पुलिस ही नहीं अनेक विभाग के अफसर-कर्मचारी होते रहते हैं।

    बैठकों में जनता की आड़ में इनको खरी-खरी सुनाई जाती है, कई तरह के अपशब्द सुनने को मिलते हैं। ऐसी घटनाओं के पीछे सबसे बड़ा कारण सत्ता का प्रभाव और पद का अहंकार माना जाता है। कुछ जनप्रतिनिधि यह मान लेते हैं कि उनके राजनीतिक पद के कारण प्रशासन और पुलिस को हर स्थिति में उनकी बात माननी चाहिए। जब कोई पुलिस अधिकारी नियमों और कानून के अनुसार कार्य करता है या किसी अनुचित मांग को स्वीकार नहीं करता, तब टकराव की स्थिति पैदा हो जाती है। एक कारण राजनीतिक संस्कृति भी है। कई बार नेताओं को लगता है कि अधिकारियों पर सख्ती दिखाने से समर्थकों के बीच उनका प्रभाव बढ़ेगा। सार्वजनिक रूप से पुलिसकर्मियों को डांटना या दबाव बनाना शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जाता है। यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए घातक है। कुछ मामलों में संवाद की कमी और प्रशासनिक संवेदनशीलता का अभाव भी विवाद को बढ़ा देता है। यदि किसी मुद्दे पर समय रहते बातचीत हो जाए तो अधिकांश विवाद टल सकते हैं।

    लेकिन जब दोनों पक्ष अपने-अपने अधिकारों को लेकर अड़ जाते हैं, तब स्थिति बिगड़ जाती है। चिंता की बात यह है कि ऐसी घटनाएं किसी एक दल या राज्य तक सीमित नहीं हैं। अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेताओं पर समय-समय पर पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ अभद्र व्यवहार के आरोप लगते रहे हैं। इससे पुलिस बल का मनोबल प्रभावित होता है और जनता के बीच गलत संदेश जाता है कि प्रभावशाली लोग कानून से ऊपर हैं। पुलिस को भी जनता और जनप्रतिनिधियों के साथ संवाद में संयम, संवेदनशीलता और शालीनता बनाए रखनी चाहिए। कई बार संवादहीनता और कठोर रवैया विवाद को बढ़ा देता है। इसलिए सुधार की आवश्यकता केवल एक पक्ष में नहीं, बल्कि दोनों पक्षों में है। जनप्रतिनिधियों का दायित्व और अधिक बड़ा है क्योंकि वे सार्वजनिक जीवन में आदर्श माने जाते हैं। उनके आचरण से समाज में संदेश जाता है।

    यदि वे कानून का सम्मान करेंगे, संस्थाओं की गरिमा बनाए रखेंगे और असहमति को भी मर्यादित भाषा में व्यक्त करेंगे तो लोकतांत्रिक संस्कृति मजबूत होगी। इसके विपरीत, यदि वे पद और प्रभाव के आधार पर अधिकारियों को अपमानित करेंगे तो इससे व्यवस्था में गलत परंपरा विकसित होगी। सरकारों और राजनीतिक दलों को भी इस दिशा में गंभीरता दिखानी चाहिए। जनप्रतिनिधियों के लिए आचार संहिता का पालन सुनिश्चित हो और किसी भी प्रकार के दुर्व्यवहार पर स्पष्ट जवाबदेही तय हो। वहीं पुलिस विभाग को भी व्यवहारिक प्रशिक्षण, तनाव प्रबंधन और जनसंपर्क कौशल को मजबूत करना चाहिए। पुलिसकर्मी के साथ अभद्र व्यवहार हुआ तो संगठन सड़क पर आ गए, जनप्रतिनिधियों के साथ ऐसा होता नहीं है, ऐसे में जनता के साथ पग-पग पर हो रहे दुर्व्यवहार को कैसे रोका जाए, इस पर भी मंथन होना चाहिए। जनता फरियादी बनकर कभी सरकारी अफसर तो कभी सरेराह चलते पुलिस अथवा अपनी गुहार लेकर जनप्रतिनिधियों के अभद्र व्यवहार की शिकार होती है तो इस पर रोक कैसे लगे, कभी इस पर भी सोचा जाना चाहिए।

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