अब अदालत ने भी हिंदू मंदिरों में पैसे देकर होने या फिर वीवीआईपी को पहले भगवान से ‘मिलाने’ पर आपत्ति जताई है। मद्राह हाई कोर्ट ने कहा कि यह पूरी तरह गलत और भेदभाव पूर्ण है। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मंत्री-विधायक यह नहीं सोचें कि वह किसी भी समय मंदिर में प्रवेश कर सकते हैं और भगवान उनका इंतजार कर रहे होंगे। भगवान की नजर में जब सब समान हैं तो वीआईपी दर्शन की परंपरा क्यों? इस प्रवृत्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले ही ऐतराज जता चुका है। हम सभी इस गड़बड़ी से परिचित हैं। जयपुर ही नहीं प्रदेश के सभी धार्मिक स्थलों में यही देखने को मिल रहा है। आम श्रद्धालुओं को कतार में घंटों इंतजार करना पड़ता है वहीं वीवीआईपी आते हैं, सीधे दर्शन कर रवाना हो जाते हैं। इन पर कोई रोक-टोक नहीं। भले ही वो गाेविंद देव मंदिर हो या मूर्ति डूंगरी स्थित गणेश मंदिर। चित्तौड़गढ़ का सांवलिया सेठ मंदिर हो या खाटू श्याम बाबा। हर जगह एक सा हाल है।
आम श्रद्धालु को धकियाया जाता है, पुलिस उन्हें गरियाती है। कभी-कभी तो उन पर हाथ तक उठा देती है। इन आमजन को वीवीआईपी आने पर रास्ता देना पड़ता है, चुपचाप वो सबकुछ सहना पड़ता है जिसके वो कतई ‘हकदार’ नहीं हैं। जब अदालत इस व्यवस्था पर सवाल उठाने लगे तब यह विषय केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक समानता और संवैधानिक मूल्यों से भी जुड़ जाता है। मंदिर आस्था के केंद्र हैं, जहां ईश्वर के सामने सभी श्रद्धालु समान माने जाते हैं। ऐसे में कुछ लोगों को विशेष सुविधा और आम भक्तों को घंटों कतार में खड़ा रखना स्वाभाविक रूप से असंतोष पैदा करता है। हाल ही में मद्रास हाई कोर्ट की टिप्पणी ने इस व्यवस्था की खामियों को उजागर किया है।
अदालत का मानना है कि दर्शन के अधिकार में भेदभाव नहीं होना चाहिए और धार्मिक स्थलों पर समानता का सिद्धांत सर्वोपरि रहना चाहिए। यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लंबे समय से आम श्रद्धालु वीआईपी संस्कृति से परेशान रहे हैं। कई बार ऐसा देखा गया है कि घंटों प्रतीक्षा कर रहे भक्तों को रोक दिया जाता है, जबकि विशेष व्यक्तियों को सीधे गर्भगृह तक पहुंच प्रदान कर दी जाती है। सुरक्षा कारणों से राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या संवैधानिक पदों पर बैठे कुछ व्यक्तियों के लिए विशेष प्रबंध आवश्यक हो सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि प्रभावशाली लोगों, राजनेताओं, अधिकारियों या धनाढ्य व्यक्तियों के लिए अलग व्यवस्था बनाई जाए। मंदिरों में विशेषाधिकार की यह संस्कृति आस्था के मूल भाव को कमजोर करती है।
अनेक मंदिरों में ‘विशेष दर्शन के नाम पर शुल्क लेकर अलग व्यवस्था की जाती है। इसके पक्ष में तर्क दिया जाता है कि इससे मंदिरों को आय प्राप्त होती है और भीड़ प्रबंधन में सहायता मिलती है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या आस्था और दर्शन को आर्थिक क्षमता से जोड़ना उचित है? मंदिर केवल पूजा-अर्चना के स्थान नहीं हैं, वे सामाजिक और आध्यात्मिक समानता के प्रतीक भी हैं। जब एक श्रद्धालु घंटों कतार में खड़ा रहता है और दूसरा व्यक्ति केवल शुल्क देकर कुछ ही मिनटों में दर्शन कर लेता है, तब यह व्यवस्था समानता के सिद्धांत पर सवालिया निशान लगाती है। ईश्वर के दरबार में सभी बराबर माने जाते हैं, इसलिए दर्शन के अवसर में आर्थिक आधार पर अंतर कई लोगों को अनुचित प्रतीत होता है। यह भी सच है कि बड़े मंदिरों में प्रतिदिन हजारों-लाखों श्रद्धालु आते हैं। व्यवस्थाओं के संचालन, सुरक्षा, स्वच्छता और विकास कार्यों के लिए धन की आवश्यकता होती है। लेकिन मंदिरों के लिए आय जुटाने के अनेक अन्य माध्यम उपलब्ध हैं। दान, पारदर्शी प्रबंधन और अन्य वैध स्रोतों से भी संसाधन प्राप्त किए जा सकते हैं। दर्शन को ही विशेष शुल्क से जोड़ना उचित समाधान नहीं माना जा सकता।
समस्या केवल शुल्क की नहीं, बल्कि उस सोच की है जिसमें सुविधा और प्राथमिकता खरीदने योग्य वस्तु बन जाती है। इससे आम श्रद्धालु के मन में भेदभाव की भावना उत्पन्न होती है और मंदिर की सामाजिक प्रतिष्ठा पर भी प्रभाव पड़ता है। धार्मिक स्थलों का उद्देश्य लोगों को जोड़ना है, न कि आर्थिक आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटना। समय की मांग है कि मंदिर प्रशासन ऐसी व्यवस्था विकसित करें जिसमें भीड़ प्रबंधन भी प्रभावी रहे और समानता का सिद्धांत भी सुरक्षित रहे। तकनीक, समयबद्ध प्रवेश और बेहतर प्रबंधन से यह लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।
आस्था का मूल्य धन से नहीं आंका जाना चाहिए। दर्शन श्रद्धा का विषय है, सुविधा का व्यापार नहीं। यही भावना मंदिरों की गरिमा और समाज के विश्वास को मजबूत बनाए रख सकती है। मंदिर प्रशासनों को आधुनिक तकनीक और बेहतर प्रबंधन के माध्यम से ऐसी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए जिसमें सभी श्रद्धालुओं को सम्मानजनक और सुविधाजनक दर्शन मिल सकें। ऑनलाइन स्लॉट बुकिंग, समयबद्ध प्रवेश और भीड़ प्रबंधन जैसे उपायों से समस्या का समाधान संभव है। जरूरत इस बात की है कि श्रद्धालुओं के बीच भेदभाव की भावना समाप्त हो और मंदिरों में समानता का वातावरण स्थापित हो।



