विश्व तंबाकू निषेध दिवस पर जागरूकता रैली निकाली गई। हस्ताक्षर अभियान भी चला तो जीवनभर नशा नहीं करने का काफी लोगों ने प्रण भी लिया। किसी भी नशे से दूर रहने के लिए ऐसे प्रयास वाकई सराहनीय हैं। शराब-मादक पदार्थ समेत अन्य नशे के विरुद्ध भी समय-समय पर यह दिखता है। पुलिस-आबकारी दल छापामारी कर मादक पदार्थ बरामद कर कुछ गिरफ्तारियां भी करता है। हालांकि बढ़ती नशाखोरी के बीच यह बहुत मामूली है। देशभर में युवाओं में नशे की लत बढ़ती जा रही है। युवक ही नहीं युवतियां तक अब इसमें पीछे नहीं हैं। तंबाकू, गुटखा, बीड़ी, सिगरेट, शराब और अन्य नशीले पदार्थ आज गंभीर चुनौती बन चुके हैं। समय-समय पर सरकार इन पर नियंत्रण के लिए कानून बनाती हैं, चेतावनी जारी करती हैं और जागरूकता अभियान भी चलाती हैं, लेकिन इसके बावजूद नशे का दायरा लगातार बढ़ता दिखाई देता है। नशा कोई भी हो, बीमारियां और अनेक गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर रहे हैं। इसके बावजूद लोग इसके सेवन से बच नहीं पा रहे हैं।
सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान प्रतिबंधित है, तंबाकू उत्पादों पर चेतावनी चित्र छापना अनिवार्य है और विशेष अभियान भी चलाए जाते हैं, लेकिन इन उपायों का असर नहीं दिख रहा है। सरकार की ओर से स्कूलों, कॉलेजों और सार्वजनिक स्थलों पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। चिकित्सा विभाग और सामाजिक संस्थाएं भी लोगों को नशे के दुष्प्रभावों से अवगत कराने का प्रयास करती हैं। इसके बावजूद जागरूकता की कमी, सामाजिक दबाव, मित्र मंडली का प्रभाव और आसानी से उपलब्धता नशे की लत को बढ़ावा दे रहे हैं। राजस्थान में नशे की तस्करी और अवैध मादक पदार्थों का कारोबार लगातार चिंता का विषय बनता जा रहा है। पुलिस और अन्य एजेंसियां समय-समय पर बड़ी कार्रवाई कर करोड़ों रुपये के मादक पदार्थ जब्त करती हैं, लेकिन इसके बावजूद नशे का नेटवर्क कमजोर पड़ने के बजाय फैलता नजर आ रहा है। यह स्थिति कानून-व्यवस्था के साथ-साथ समाज और युवाओं के भविष्य के लिए भी गंभीर खतरा है। तंबाकू-शराब के अलावा एमडी-स्मैक, अफीम आसानी से नशेड़ियों को आसानी से मिल रही है। सीमावर्ती क्षेत्रों से लेकर बड़े शहरों तक तस्कर नए-नए तरीके अपनाकर नशे की खेप पहुंचाने में सफल हो जाते हैं। हेरोइन, स्मैक, अफीम, डोडा-पोस्त और सिंथेटिक ड्रग्स का बढ़ता प्रचलन चिंताजनक है। सबसे अधिक चिंता इस बात की है कि युवाओं और विद्यार्थियों को भी इसका आसान शिकार बनाया जा रहा है।
सवाल यह है कि लगातार कार्रवाई के बावजूद नशा क्यों नहीं रुक पा रहा? इसका एक बड़ा कारण इस अवैध कारोबार में होने वाला भारी मुनाफा है। तस्करों का नेटवर्क इतना संगठित हो चुका है कि एक खेप पकड़े जाने के बाद भी दूसरी खेप बाजार तक पहुंच जाती है। कई मामलों में स्थानीय स्तर पर निगरानी और सूचना तंत्र की कमजोरियां भी सामने आती हैं। नशे की बढ़ती मांग भी इस समस्या को बढ़ावा दे रही है। जब तक समाज में नशे की खपत कम नहीं होगी, तब तक केवल पुलिस कार्रवाई से स्थायी समाधान संभव नहीं है। परिवारों, स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संगठनों को युवाओं में जागरूकता बढ़ाने की दिशा में अधिक सक्रिय भूमिका निभानी होगी। राज्य सरकार को तस्करी के बड़े नेटवर्क तक पहुंचकर उनके आर्थिक स्रोतों पर चोट करनी होगी। सीमावर्ती क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाने, तकनीक के अधिक उपयोग और दोषियों को त्वरित सजा सुनिश्चित करने की भी आवश्यकता है। साथ ही नशा मुक्ति केंद्रों और पुनर्वास कार्यक्रमों को मजबूत करना होगा ताकि नशे के शिकार लोगों को नई शुरुआत का अवसर मिल सके। नशे की तस्करी केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय चिंता का विषय है। यदि समय रहते इस पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ेगा। नशामुक्त राजस्थान के लिए सरकार, प्रशासन और समाज सभी को मिलकर निर्णायक लड़ाई लड़नी होगी। यह भी सामने आया कि नशे के तस्कर पुलिस-आबकारी दलों की मिलीभगत से अपना कारोबार चला रहे हैं। पकड़े जाने पर लंबे समय तक मामला चलता है, इनकी बीच में जमानत हो जाती है। मतलब साफ है कि कड़ी सजा मिलती नहीं, युवाओं पर नशा करने के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होती नहीं। और तो और भारी भरकम कमाई के चलते सरकार नशे पर प्रतिबंध लगाने से बचती है, ऐसे में नशा रोकना बड़ा टेढ़ा काम हो गया। सरकार को नए सिरे से इस पर कठोर कदम उठाने होंगे।



