कुलगुरु चयन में खत्म हो राजनीतिक दखल, तब ही बच पाएगी विश्वविद्यालयों की साख

    कुलपति चयन में राजनीतिक हस्तक्षेप और पक्षपात विश्वविद्यालयों की साख को नुकसान पहुंचा रहे हैं। नियुक्ति प्रक्रिया को पारदर्शी, योग्यता आधारित और राजनीतिक प्रभाव से मुक्त बनाना जरूरी है। साथ ही कुलपतियों के कार्यों की नियमित समीक्षा और शिकायतों के त्वरित निस्तारण की प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए।

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    सहायक भर्ती धांधली में दिव्यांग विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो देवस्वरूप को राज्यपाल ने बर्खास्त कर दिया है। राजस्थान विश्वविद्यालय की 294 पदों की भर्ती में अनियमितताएं उजागर होने पर यह कार्यवाही की गई है। प्रो देवस्वरूप के पास अभी विश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय के कार्यवाहक कुलगुरु का भी अतिरिक्त प्रभार भी था। उन्हें यहां से भी हटा दिया गया है। आरोप है कि राजस्थान विश्वविद्यालय के कुलपति रहते हुए उन्होंने नियम-कायदों को दरकिनार करते हुए अपने चहेतों को लाभ पहुंचाया था। प्रो देवस्वरूप पहली बार उस समय विवादों में आए थे जब वे राजस्थान विश्वविद्यालय के कुलपति थे। वर्ष 2013-14 में उनके कार्यकाल के दौरान नियुक्तियों, नए कॉलेजों को संबद्धता देने और परीक्षा केंद्र आवंटन में नियमों की अनदेखी के आरोप लगे थे। उस समय विश्वविद्यालय सिंडिकेट और सरकार से टकराव भी खुलकर सामने आया था। तब उन्होंने कामकाज में सहयोग नहीं मिलने का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया था। राज्यपाल की ओर से गठित उच्च स्तरीय जांच समिति ने शिकायतों की जांच की और रिपोर्ट में कई गंभीर अनियमितताओं का उल्लेख किया। इसके चलते उन्हें पद से हटाया गया है।

    हालिया विवादों में यह आरोप भी चर्चा में रहे कि नियुक्तियों में आरक्षित वर्ग के नियमों का सही पालन नहीं हुआ और इंटरव्यू प्रक्रिया में पक्षपात किया गया। कुलपति किसी भी विश्वविद्यालय का सर्वोच्च प्रशासक और शैक्षणिक मुखिया होता है। उससे अपेक्षा की जाती है कि वह नियमों, पारदर्शिता और निष्पक्षता के आधार पर संस्थान चलाएगा। लेकिन कई मामलों में देखा गया है कि कुलपति पद पर पहुंचने के बाद प्रशासनिक अधिकारों का उपयोग संतुलित ढंग से नहीं हो पाता। नियुक्तियों, तबादलों, वित्तीय स्वीकृतियों और परीक्षा संबंधी निर्णयों में पक्षपात या मनमानी के आरोप लगने लगते हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण नियुक्ति प्रक्रिया पर उठते सवाल हैं। अक्सर आरोप लगते हैं कि कुलपति चयन में शैक्षणिक योग्यता से ज्यादा राजनीतिक समीकरण और सत्ता से निकटता प्रभाव डालती है। जब किसी पद पर पहुंचने में राजनीतिक समर्थन की भूमिका होती है, तो बाद में निर्णयों पर भी उसका असर दिखाई देने लगता है। इससे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता कमजोर होती है। राजस्थान के विश्वविद्यालयों में कुलपतियों को लेकर उठते विवाद अब अपवाद नहीं, बल्कि एक चिंताजनक परंपरा बनते जा रहे हैं। कभी नियुक्तियों में अनियमितताओं के आरोप, कभी प्रशासनिक फैसलों पर सवाल, तो कभी राजनीतिक हस्तक्षेप की चर्चाएं-लगातार सामने आते घटनाक्रम यह संकेत दे रहे हैं कि प्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था गहरे संस्थागत संकट से गुजर रही है।

    हाल के विवादों ने फिर यह सोचने को मजबूर किया है कि आखिर विश्वविद्यालयों का सिस्टम सुधरेगा कैसे। कुलपति रहे आरएन सिंह समेत कई और भी ऐसे ही विवादों से घिरे रहे। दरअसल समस्या केवल किसी एक कुलपति तक सीमित नहीं है। यह पूरे सिस्टम की कमजोरी को उजागर करती है। लंबे समय से आरोप लगते रहे हैं कि कुलपति नियुक्तियों में योग्यता से अधिक राजनीतिक समीकरण और सत्ता से नजदीकी को महत्व दिया जाता है। जब नियुक्ति प्रक्रिया पर ही संदेह हो, तो बाद में विवादों का जन्म लेना लगभग तय हो जाता है। कई मामलों में यह भी देखने को मिला कि शिकायतें लंबे समय तक दबाई जाती रहीं और कार्रवाई तब हुई जब मामला बड़ा मुद्दा बन गया। इससे यह साबित होता है कि विश्वविद्यालयों में जवाबदेही की व्यवस्था कमजोर है। समय पर निष्पक्ष जांच और पारदर्शी कार्रवाई नहीं होने से विवाद और गहरे होते जाते हैं। इन सबका नुकसान छात्रों और शिक्षा व्यवस्था को उठाना पड़ता है। विश्वविद्यालय जहां ज्ञान, शोध और नवाचार के केंद्र होने चाहिए, वहां प्रशासनिक खींचतान और आरोप-प्रत्यारोप का माहौल बना रहता है। शिक्षकों का मनोबल प्रभावित होता है और संस्थान की शैक्षणिक गुणवत्ता भी कमजोर पड़ती है। जरूरत इस बात की है कि कुलपति नियुक्ति प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी और राजनीतिक प्रभाव से मुक्त बनाया जाए। चयन में केवल शैक्षणिक उपलब्धि, प्रशासनिक क्षमता और ईमानदार छवि को महत्व मिले। साथ ही कुलपतियों के कार्यों की नियमित समीक्षा और शिकायतों के त्वरित निस्तारण की प्रभावी व्यवस्था भी जरूरी है। यदि विश्वविद्यालयों की गरिमा और उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बचानी है तो कुलपति पद को विवादों से बाहर निकालना ही होगा। वरना शिक्षा के मंदिरों पर लगते दाग आने वाले समय में पूरी व्यवस्था पर अविश्वास को और गहरा करेंगे।

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