केवल शिविर से नहीं मिलेगी कांग्रेस को शक्ति, मिलकर काम करना होगा

    कांग्रेस का पुष्कर चिंतन शिविर संगठन को मजबूत करने और नई रणनीति बनाने का प्रयास है, लेकिन पार्टी अब भी गुटबाजी और संगठनात्मक कमजोरी से जूझ रही है। नेताओं की प्राथमिकता कई बार पार्टी से ज्यादा अपने गुट और प्रभाव को बचाने में दिखती है। बूथ स्तर पर कमजोर सक्रियता और जनता से घटता जुड़ाव चिंता का विषय है। केवल शिविर, भाषण और बड़े आयोजन पर्याप्त नहीं हैं। कांग्रेस को मजबूत बनने के लिए नेताओं को जमीन पर उतरकर जनता के मुद्दों पर लगातार संघर्ष करना होगा।

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    पुष्कर में कांग्रेस का चिंतन व प्रशिक्षण शिविर चल रहा है। एक जून तक चलने वाले इस दस दिन के शिविर में राजस्थान व दिल्ली के पदाधिकारी भाग ले रहे हैं। संगठन को मजबूती देने के साथ आगामी चुनाव के लिए नई रणनीति तैयार करने सहित अन्य आवश्यक मुद्दों को लेकर यहां मंथन चल रहा है। पार्टी इसे आत्ममंथन और संगठन को नई ऊर्जा देने का प्रयास बता रही है, लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या यह शिविर केवल भाषणों और नारों तक सीमित रहेगा या वास्तव में कांग्रेस को नई दिशा देने में सफल होगा। कांग्रेस लंबे समय से संगठनात्मक कमजोरी, गुटबाजी और लगातार चुनावी चुनौतियों से जूझ रही है। कई राज्यों में पार्टी का जनाधार कमजोर हुआ है, वहीं आंतरिक खींचतान खुलकर सामने आती रही। पूर्व सीएम अशोक गहलोत व सचिन पायलट के गुटों की चर्चा बरसों से होती रही है। बार-बार मीडिया के समक्ष एक दिखने की कोशिश तो होती है पर अंदरूनी तौर पर ऐसा नहीं है। कई विधायक ही नहीं पदाधिकारी-कार्यकर्ता तक अलग-अलग खेमे में बंटे हुए हैं। ऐसे में उनकी पहली प्राथमिकता गहलोत-पायलट में से कोई होता है, पार्टी नहीं।

    राजनीति के बदलते दौर में भी किसी बड़े नेता का ‘खास’ बनने का चलन ज्यादा है, पार्टी के कार्यक्रम में शामिल होना महज औपचारिकता बनती जा रही है। कांग्रेस में लंबे समय से कई पदाधिकारी और नेता अपने-अपने प्रभाव-जुगत को बचाने में लगे रहते हैं। बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करने, युवाओं को जोड़ने और जनता के मुद्दों पर निरंतर संघर्ष करने के बजाय ऊर्जा अक्सर आंतरिक समीकरणों में खर्च होती दिखाई देती है। यही कारण है कि कार्यकर्ताओं में भी भ्रम और निराशा पैदा होती है। पुष्कर में आयोजित चिंतन शिविर और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के जरिए पार्टी संगठन को मजबूत करने की बात कर रही है। शिविर में बूथ प्रबंधन, कार्यकर्ता प्रशिक्षण और चुनावी रणनीति पर जोर देने की चर्चा भी सामने आई है। लेकिन असली परीक्षा तब होगी, जब ये नेता और पदाधिकारी जमीन पर मिलकर काम करते दिखें। पार्टी के कई नेता और पदाधिकारी केवल बड़े कार्यक्रमों, सभाओं और मीडिया कवरेज वाले आयोजनों में सक्रिय दिखाई देते हैं, जबकि जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने का काम कमजोर पड़ता नजर आता है। यही कारण है कि कार्यकर्ताओं में भी धीरे-धीरे निराशा बढ़ती है और जनता से सीधा जुड़ाव कम होता जाता है।

    राजनीति केवल बड़े मंचों, पोस्टरों और भाषणों से नहीं चलती। किसी भी पार्टी की असली ताकत बूथ स्तर का कार्यकर्ता होता है, जो गांव, कस्बे और वार्ड तक लोगों के बीच लगातार मौजूद रहता है। कांग्रेस में लंबे समय से यह शिकायत सुनने को मिलती रही है कि कई पदाधिकारी जनता के बीच कम और राजनीतिक आयोजनों में ज्यादा सक्रिय रहते हैं। जब चुनाव नजदीक आते हैं, तब अचानक संगठन की याद आती है, जबकि मजबूत संगठन लगातार मेहनत से बनता है। आज का मतदाता पहले की तुलना में ज्यादा जागरूक है। वह केवल बयान नहीं, बल्कि लगातार मौजूदगी और संघर्ष देखना चाहता है। बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की समस्याएं, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर यदि नेता सड़क पर दिखाई नहीं देंगे, तो जनता का भरोसा कमजोर होना स्वाभाविक है।

    विपक्ष की भूमिका केवल सरकार की आलोचना करना नहीं, बल्कि जनता की आवाज बनना भी होती है। कांग्रेस की एक बड़ी समस्या यह भी मानी जाती है कि संगठन में जवाबदेही स्पष्ट नहीं दिखती। कई पदाधिकारी केवल पद मिलने तक सक्रिय रहते हैं, लेकिन क्षेत्र में नियमित काम, कार्यकर्ताओं से संवाद और नए लोगों को जोड़ने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। इससे समर्पित कार्यकर्ताओं को भी लगता है कि मेहनत की अपेक्षा केवल गुटबाजी और संपर्क राजनीति ज्यादा प्रभावी है। नेता संगठन विस्तार से ज्यादा अपने राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र को मजबूत करने में लगे रहते हैं। नतीजा यह निकलता है कि जनता के मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और पार्टी का सामूहिक संदेश कमजोर पड़ जाता है। जरूरत इस बात की है कि कांग्रेस नेतृत्व केवल बड़े आयोजनों पर ध्यान देने के बजाय नियमित जनसंपर्क अभियान चलाए। हर पदाधिकारी की जिम्मेदारी तय हो, बूथ स्तर तक सक्रियता की समीक्षा हो और जनता के मुद्दों पर निरंतर आंदोलन किए जाएं। केवल सोशल मीडिया पोस्ट या बड़े सम्मेलनों से संगठन मजबूत नहीं होता। लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष बेहद जरूरी है।

    इसलिए कांग्रेस को आत्ममंथन करना होगा कि आखिर कार्यकर्ता और आम जनता उससे दूर क्यों होती जा रही है। यदि नेता और पदाधिकारी जमीन पर उतरकर लगातार काम करेंगे, तभी पार्टी फिर से मजबूत जनाधार बना पाएगी। यह भी यही है कि कांग्रेस देश की बड़ी पार्टी है, बरसों सत्ता में रहने के बाद विपक्षी दल की भूमिका भी उसने ठीक ढंग से निभाने की कोशिश की है। बावजूद इसके पार्टी के अधिकांश नेता-पदाधिकारी आमजन के हित में कम अपने हित में अधिक दिखते हैं। पुष्कर में हो रहे चिंतन-प्रशिक्षण शिविर का असर तो आने वाले दिनों में ही पता चलेगा।

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