सरकारी स्कूलों में नामांकन नहीं बढ़ पा रहा। पिछले करीब चार साल में नौ लाख से अधिक विद्यार्थी कम हो गए। सरकार की तमाम योजनाएं नामांकन बढ़ाने में फ्लॉप साबित हो रही है। सरकार तमाम तरह के नवाचार कर नामांकन बढ़ाने की जुगत में है पर कई कारणों से यह काम सफल नहीं हो पा रहा। बार-बार अदालत की फटकार या बैठक में लिए जा रहे निर्णय के अनुकूल व्यवस्था ही नहीं हो पा रही। विडंबना यह भी है कि शिक्षा के अधिकार कानून के बावजूद कई विद्यालयों में मूलभूत सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। पिछले साल कुछ स्कूलों की छत अथवा दीवार गिरने के बाद उच्च न्यायालय की दखल के बाद मरम्मत का कार्य भी फेल रहा। मरम्मत के नाम पर भी सिर्फ रंग-रोगन कर सरकार को ही चूना लगा दिया गया। डीडवाना-कुचामन ही नहीं नागौर समेत अन्य जिलों में यह गड़बड़ी पकड़ी गई। सरकार की ओर से सुधार के लिए कुछ कदम जरूर उठाए गए हैं। वर्ष 2025-26 के बजट में करीब 174 करोड़ रुपये से अधिक की राशि 2000 स्कूलों की मरम्मत के लिए स्वीकृत की गई है। इसके अलावा 1680 नए स्कूल भवनों के निर्माण के लिए लगभग 2000 करोड़ रुपये का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया। बावजूद इसके कुछ अच्छा नहीं दिख रहा।
हर बार की तरह सरकार की ओर से इस बार भी नामांकन बढ़ाने के लिए विशेष अभियान चलाए जाएंगे। शिक्षकों और अधिकारियों को गांव-ढाणी जाकर बच्चों और अभिभावकों से संपर्क करने के निर्देश दिए जा चुके हैं। कई जगह रैलियां निकाली जाएंगी तो सभी स्कूलों में प्रवेशोत्सव के तहत लोगों का ध्यान खींचा जा रहा है। साथ ही सरकारी योजनाओं का प्रचार किया जा रहा है। मुफ्त पाठ्यपुस्तक, यूनिफॉर्म, छात्रवृत्ति, मध्याह्न भोजन और बालिकाओं के लिए विशेष योजनाओं को भी आकर्षण के रूप में पेश किया जा रहा है, सो अलग। बावजूद इसके फिलहाल इसका कोई खास असर नहीं दिख रहा। अभिभावक अब केवल मुफ्त सुविधाओं के आधार पर स्कूल नहीं चुन रहे, वे अपने बच्चों का भविष्य देख रहे हैं। जब सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, जर्जर भवन, अंग्रेजी माध्यम की सीमित व्यवस्था, तकनीकी संसाधनों का अभाव और पढ़ाई की कमजोर गुणवत्ता जैसी समस्याएं सामने आती हैं, तब लोग निजी स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं। सरकारी स्कूलों की बदहाल आधारभूत सुविधाएं भी एक बड़ा कारण हैं। आज भी अनेक विद्यालय जर्जर भवनों, टूटे फर्नीचर, खराब शौचालयों और पेयजल संकट जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। कई जगह बच्चों को पेड़ों के नीचे या असुरक्षित कमरों में पढ़ाई करनी पड़ती है। ऐसे हालात देखकर अभिभावकों का चिंता करना स्वाभाविक है। इसके अलावा अंग्रेजी माध्यम और आधुनिक शिक्षा की बढ़ती मांग ने भी सरकारी स्कूलों की चुनौती बढ़ाई है। निजी स्कूल तकनीक, स्मार्ट क्लास, गतिविधियों और अंग्रेजी शिक्षा को बड़े आकर्षण के रूप में पेश करते हैं, जबकि अधिकांश सरकारी स्कूल अभी भी संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। बदलते समय के साथ शिक्षा व्यवस्था में जिस तेजी से सुधार होना चाहिए था, वह नजर नहीं आता।
समस्या केवल सुविधाओं की नहीं बल्कि छवि की भी है। वर्षों से सरकारी स्कूलों को लेकर बनी नकारात्मक धारणा ने लोगों का विश्वास कमजोर किया है। जब लगातार स्कूलों की बदहाली, शिक्षकों की कमी और कमजोर परिणामों की खबरें सामने आती हैं तो आमजन के मन में सरकारी शिक्षा व्यवस्था को लेकर संदेह पैदा होना स्वाभाविक है। हालांकि यह भी सच है कि आज भी कई सरकारी स्कूल बेहतर परिणाम दे रहे हैं और सीमित संसाधनों में शिक्षक अच्छा काम कर रहे हैं। लेकिन कुछ अच्छे उदाहरण पूरी व्यवस्था की कमजोरियों को नहीं छिपा सकते। जरूरत व्यापक सुधार की है। यदि सरकार वास्तव में सरकारी स्कूलों को मजबूत बनाना चाहती है तो केवल नामांकन अभियान पर्याप्त नहीं होंगे। शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षकों की उपलब्धता, आधुनिक संसाधन और सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करना होगा। सरकारी स्कूलों में भरोसा तभी लौटेगा जब वहां पढ़ने वाला बच्चा भी वही अवसर और गुणवत्ता पाएगा जिसकी उम्मीद अभिभावक निजी स्कूलों से करते हैं। आखिरकार सरकारी शिक्षा व्यवस्था मजबूत होना केवल गरीब परिवारों की जरूरत नहीं बल्कि समाज और देश के भविष्य की बुनियादी आवश्यकता है। सरकार लोगों का सरकारी स्कूलों पर विश्वास जमाए, यह तब ही हो सकता है जब अच्छी शिक्षा के साथ अच्छा माहौल मिले। उन खामियों को भी दूर करना होगा जिनके चलते बच्चे प्राइवेट स्कूल जा रहे हैं। सोच-समझकर प्लान करने से ही नामांकन बढ़ेगा, यह भी साबित हो गया कि नि:शुल्क पढ़ाई, किताब-ड्रेस जैसी योजना का असर ज्यादा नहीं पड़ता। अभिभावकों को विश्वास में लेकर बच्चों के सुनहरे भविष्य की आस जगाने से बदलाव होगा।



