भीषण गर्मी ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है। नौतपा के दौरान तापमान लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है। ऐसे समय में लोगों को सबसे ज्यादा जरूरत पानी और बिजली की होती है, लेकिन विडंबना यह है कि इसी दौर में आमजन को बिजली कटौती और पानी की भारी किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। शहरों से लेकर गांवों तक लोग परेशान हैं। कहीं घंटों बिजली गुल रहती है तो कहीं पानी की सप्लाई नाममात्र की हो गई है। सवाल यह है कि आखिर जनता जाए तो जाए कहां? जयपुर समेत अन्य बड़े शहर में भी दोपहर के समय सड़कें झुलस रही हैं। बस स्टैंड, बाजार, सरकारी अस्पताल और निर्माण स्थलों पर काम करने वाले मजदूर सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। गर्म हवाओं के बीच छांव, ठंडे पानी और प्राथमिक चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाएं भी हर जगह उपलब्ध नहीं हैं। नौतपा केवल मौसम का दौर नहीं, बल्कि प्रशासनिक तैयारी की असली परीक्षा भी है। भीषण गर्मी, झुलसाती लू और लगातार बढ़ते तापमान के बीच अब लोगों को उन पेड़ों की याद आने लगी है जिन्हें कभी विकास के नाम पर काट दिया गया था। जयपुर समेत पूरे राजस्थान में सड़क चौड़ीकरण, फ्लाईओवर, कॉलोनियों, मेट्रो और अन्य परियोजनाओं के लिए हजारों पेड़ खत्म कर दिए गए, लेकिन उनके बदले उतनी हरियाली कभी लौट नहीं पाई। आज वही शहर कंक्रीट के जंगल बनकर तप रहे हैं।
एक समय था जब जयपुर की सड़कों पर पेड़ों की लंबी कतारें गर्मी में राहत देती थीं। पर अब कई प्रमुख मार्गों पर छांव गायब हो चुकी है। सुबह से ही सड़कें तवे जैसी गर्म हो जाती हैं और दोपहर तक हालात असहनीय हो जाते हैं। विकास की रफ्तार तो बढ़ी, लेकिन पर्यावरण संतुलन पीछे छूट गया। सवाल यह है कि क्या विकास केवल सीमेंट, डामर और ऊंची इमारतों का नाम है, या फिर इंसानों के जीने लायक वातावरण भी उसकी जिम्मेदारी है? विडंबना यह है कि हर बार पेड़ काटने के साथ इसके बदले पौधारोपण का दावा जरूर किया जाता है, लेकिन धरातल पर उसका असर नगण्य दिखता है। कहीं पौधे लगते ही नहीं, कहीं लगते हैं तो उनकी देखरेख नहीं होती। वर्षों पुराने विशाल पेड़ों की भरपाई छोटे पौधे तुरंत नहीं कर सकते। पेड़ केवल ऑक्सीजन ही नहीं देता, बल्कि तापमान नियंत्रित करता है, धूल रोकता है, पक्षियों को आश्रय देता है और शहर को जीवंत बनाए रखता है। नौतपा और हीटवेव के दौर में लोग छांव खोज रहे हैं। बस स्टैंड, बाजार, स्कूल और अस्पतालों के बाहर पेड़ों की कमी साफ महसूस हो रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी अंधाधुंध कटाई और घटती हरियाली का असर जलसंकट और बढ़ती गर्मी के रूप में सामने आ रहा है। प्रकृति बार-बार संकेत दे रही है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन जरूरी है। प्रदेश के अधिकांश हिस्सों का यही हाल है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की गंभीर कोशिशें अब भी कमजोर दिखाई देती हैं। कई जगह छंटाई के नाम पर पेड़ों को लगभग खत्म कर देने के आरोप लग चुके हैं। पर्यावरण प्रेमियों ने इस पर आवाज भी उठाई है कि शहर का ग्रीन कवर लगातार घट रहा है। एक ओर सरकार वायु गुणवत्ता सुधार पर करोड़ों रुपये खर्च करने की बात करती है, दूसरी ओर वही शहर अपने प्राकृतिक “एयर कूलर” यानी पेड़ों को बचाने में संघर्ष करता नजर आता है। केवल सफाई अभियान या अस्थायी शेड पर्याप्त नहीं होंगे। जरूरत है दीर्घकालिक हरित नीति की-जहां सड़क निर्माण से पहले वृक्ष संरक्षण की योजना बने। नौतपा का दौर हर वर्ष अपने साथ भीषण गर्मी और कठिन चुनौतियां लेकर आता है। राजस्थान में तापमान 45 डिग्री के पार पहुंच चुका है। ऐसे समय में सबसे अधिक जरूरत होती है प्रशासनिक सतर्कता और आमजन को राहत देने वाले इंतजामों की। दुर्भाग्य से हर साल की तरह इस बार भी लोग पानी की किल्लत, बिजली कटौती, गर्म हवाओं और स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर नौतपा जैसी स्थिति में जनता की परेशानियों पर प्राथमिकता से ध्यान क्यों नहीं दिया जाता? यह समझना होगा कि नौतपा अब केवल मौसम की सामान्य स्थिति नहीं रह गई है। जलवायु परिवर्तन और घटती हरियाली ने गर्मी को और अधिक खतरनाक बना दिया है। इसलिए हर वर्ष पहले से तैयारी जरूरी है। सार्वजनिक स्थानों पर प्याऊ, छायादार इंतजाम, पर्याप्त बिजली आपूर्ति, पानी की नियमित सप्लाई और अस्पतालों में विशेष व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। साथ ही लंबे समय के समाधान पर भी गंभीरता से काम करना होगा। शहरों में लगातार पेड़ों की कटाई और कंक्रीट का फैलाव गर्मी बढ़ाने का बड़ा कारण बन चुका है। यदि पर्यावरण संरक्षण और जल संरक्षण को प्राथमिकता नहीं दी गई तो आने वाले वर्षों में हालात और भयावह हो सकते हैं।



