Petrol Diesel Price Hike: पेट्रोल-डीजल की कीमतों में फिर बढ़ोतरी हो गई है। बार-बार इनके बढ़ते दाम की वजह ईरान-अमेरिका युद्ध को बताया जा रहा है। दावा तो यह किया जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से तेल कंपनियां दबाव में थीं। इसलिए कंपनियों ने घाटे की भरपाई के लिए यह कदम उठा रही है। पहले से ही आम जनता महंगे ईंधन से परेशान है, ऐसे में अंतरराष्ट्रीय दबाव भारत के लिए आर्थिक चिंता भी बनता जा रहा है। ईंधन के महंगा होने से खाने-पीने की वस्तुओं से लेकर परिवहन, दवाइयों, निर्माण सामग्री और रोजमर्रा के सामान के भी दाम बढ़ना तय हैं। ईंधन के दाम बढ़ने से जनता का घरेलू बजट पूरी तरह बिगड़ जाता है। पहले से महंगाई, बेरोजगारी और कम होती बचत से जूझ रहे लोगों के लिए यह बढ़ोतरी किसी नई मुसीबत से कम नहीं है। पेट्रोल-डीजल केवल वाहनों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनकी कीमतें बढ़ते ही पूरे बाजार पर असर पड़ता है। डीजल महंगा होने का सीधा असर किसानों, ट्रांसपोर्टरों और छोटे व्यापारियों पर पड़ता है। खेतों में चलने वाले ट्रैक्टर से लेकर माल ढोने वाले ट्रकों तक सबका खर्च बढ़ जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि सब्जियां, फल, राशन, दूध और रोजमर्रा की जरूरत का हर सामान महंगा हो जाता है। यानी पेट्रोल-डीजल की कीमतों की मार आखिरकार आम जनता को ही झेलनी पड़ती है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि आम आदमी की आमदनी उसी अनुपात में नहीं बढ़ रही, जिस तेजी से खर्च बढ़ रहे हैं। नौकरीपेशा लोग, मजदूर, ई-रिक्शा चालक, छोटे दुकानदार और मध्यम वर्ग हर महीने अपने बजट को संभालने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कई परिवार अब गैरजरूरी खर्च तो दूर, जरूरी जरूरतों में भी कटौती करने को मजबूर हो रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर जनता इस लगातार बढ़ती मार से पार कैसे पाए? सरकारों की ओर से अक्सर अंतरराष्ट्रीय बाजार और कच्चे तेल की कीमतों का हवाला दिया जाता है, लेकिन जनता यह भी देखती है कि पेट्रोल-डीजल पर भारी टैक्स वसूला जाता है। जब वैश्विक बाजार में तेल सस्ता होता है तब राहत सीमित मिलती है, लेकिन महंगाई का बोझ तेजी से जनता पर डाल दिया जाता है। यही वजह है कि लोगों में असंतोष बढ़ रहा है। कई परिवारों ने अनावश्यक यात्रा कम कर दी है, वाहन कम निकालने लगे हैं और खर्चों में कटौती कर रहे हैं। आम आदमी के बीच यह भावना बनने लगी है कि कहीं भविष्य में पेट्रोल-डीजल की स्थिति राशनिंग जैसी न हो जाए। यह चिंता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा से भी जुड़ा बड़ा सवाल है।
रूस और ईरान से कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ना किसी से छिपा नहीं है। यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के तनाव के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूस तथा ईरान पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए हैं। इसके बावजूद भारत ने अपनी जरूरतों को देखते हुए सस्ता कच्चा तेल खरीदना जारी रखा। भारत के लिए यह पूरी तरह व्यावहारिक निर्णय था, क्योंकि देश अपनी जरूरत का अधिकांश तेल विदेशों से मंगाता है। भारत पर दबाव की बात पूरी तरह गलत भी नहीं कही जा सकती। वैश्विक राजनीति में बड़ी शक्तियां अपने हितों के अनुसार दबाव बनाती रही हैं। लेकिन भारत के सामने सबसे बड़ी प्राथमिकता अपने 140 करोड़ लोगों की ऊर्जा जरूरत और आर्थिक स्थिरता बनाए रखना है। ऐसे में केवल राजनीतिक दबाव के आधार पर फैसले लेना देशहित में नहीं होगा। भारत को अपनी विदेश नीति में संतुलन रखते हुए राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखना होगा। अब जरूरत केवल बहानों की नहीं, बल्कि ठोस समाधान की है। केंद्र और राज्य सरकारों को टैक्स में राहत देने, सार्वजनिक परिवहन को सस्ता और बेहतर बनाने तथा वैकल्पिक ऊर्जा को बढ़ावा देने की दिशा में गंभीर कदम उठाने होंगे। साथ ही जमाखोरी और कृत्रिम महंगाई पर सख्ती जरूरी है। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो बढ़ती ईंधन कीमतें आम जनता की आर्थिक स्थिति को और कमजोर कर देंगी। देश की अर्थव्यवस्था तभी मजबूत मानी जाएगी जब आम नागरिक राहत महसूस करे। केवल आंकड़ों में विकास दिखाने से काम नहीं चलेगा। जनता को राहत, स्थिर कीमतें और भरोसेमंद आर्थिक नीति देना अब सरकारों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी बन चुकी है।



