Ramgarh Dam Encroachment: बार-बार की फटकार के बाद भी नहीं जागेंगे जिम्मेदार

    रामगढ़ बांध को वास्तव में पुनर्जीवित करना है तो केवल अतिक्रमण हटाना पर्याप्त नहीं होगा। पूरे कैचमेंट क्षेत्र को अतिक्रमण मुक्त करना, अवैध बोरवेल और भूजल दोहन पर सख्ती से रोक लगाना, वर्षा जल के प्राकृतिक प्रवाह को बहाल करना तथा नियमित निगरानी की व्यवस्था बनानी होगी। साथ ही जिन अधिकारियों की लापरवाही से वर्षों तक अतिक्रमण बढ़ता रहा, उनकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

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    Ramgarh Dam Encroachment: नाले पाट दिए गए, उस पर कॉलोनियां बस गईं। सड़क तक घेरकर लोगों ने मकान बना लिए। शिकायत की गई तो अफसर पहुंचे पर अतिक्रमण नहीं हटा। यह अकेले रामगढ़ बांध की नहीं पूरी राजधानी की हकीकत है। विभाग कोई भी हो, औपचारिक कार्रवाई। बाद में गिने-चुने मामले अदालत में पहुंचते भी हैं तो सुनवाई के दौरान अदालत विभागों को फटकारती है, हालांकि अतिक्रमण नहीं हटते। जयपुर की जीवनरेखा रहा रामगढ़ बांध वर्षों से सरकारी उपेक्षा, अतिक्रमण और भूजल के अंधाधुंध दोहन का शिकार बना हुआ है। कभी राजधानी की प्यास बुझाने वाला यह जलाशय अब अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। बांध के कैचमेंट क्षेत्र में अवैध निर्माण, खेती और कब्जों ने प्राकृतिक जल प्रवाह को बाधित कर दिया है। दूसरी ओर आसपास के क्षेत्रों में लगातार हो रहे भूजल दोहन ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।

    अब इस मामले में हाईकोर्ट को सरकारी विभागों को फटकार लगानी पड़ी है। यह अपने आप में बताता है कि जिन विभागों पर जल स्रोतों की सुरक्षा और अतिक्रमण हटाने की जिम्मेदारी है, वे वर्षों तक निष्क्रिय क्यों बने रहे। अदालत के हस्तक्षेप के बाद सक्रियता दिखाना प्रशासन की मजबूरी हो सकती है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई स्थाई होगी या फिर कुछ दिनों बाद सब पहले जैसा हो जाएगा। राजस्थान में यह पहली घटना नहीं है। तालाबों, नदियों, जोहड़ों और सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण का सिलसिला लगातार बढ़ता रहा है। अक्सर प्रभावशाली लोगों के कब्जों पर कार्रवाई नहीं होती, जबकि छोटे अतिक्रमियों पर तुरंत बुलडोजर चल जाता है। यही दोहरा रवैया समस्या को और जटिल बनाता है।

    राजस्थान में अतिक्रमण अब केवल नगर निकायों की समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह सुशासन, कानून के राज और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुका है। जयपुर से लेकर जोधपुर, उदयपुर, कोटा, अजमेर, बीकानेर और छोटे कस्बों तक शायद ही कोई ऐसा शहर हो, जहां सड़कें, फुटपाथ, सरकारी जमीनें, तालाब, नाले और जलग्रहण क्षेत्र अतिक्रमण की चपेट में न हों। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर यह सब वर्षों तक चलता कैसे रहता है? जवाब भी किसी से छिपा नहीं है। जिन विभागों पर अतिक्रमण रोकने और हटाने की जिम्मेदारी है, वही अक्सर समय रहते कार्रवाई नहीं करते। कई मामलों में शिकायतों के बावजूद फाइलें दबाकर रखी जाती हैं, नोटिस देकर औपचारिकता पूरी कर ली जाती है या फिर कार्रवाई केवल कमजोर लोगों तक सीमित रह जाती है। प्रभावशाली लोगों के कब्जे वर्षों तक जस के तस बने रहते हैं। यही कारण है कि आम लोगों में यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि अतिक्रमण केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि मिलीभगत का भी परिणाम है।

    यदि रामगढ़ बांध को वास्तव में पुनर्जीवित करना है तो केवल अतिक्रमण हटाना पर्याप्त नहीं होगा। पूरे कैचमेंट क्षेत्र को अतिक्रमण मुक्त करना, अवैध बोरवेल और भूजल दोहन पर सख्ती से रोक लगाना, वर्षा जल के प्राकृतिक प्रवाह को बहाल करना तथा नियमित निगरानी की व्यवस्था बनानी होगी। साथ ही जिन अधिकारियों की लापरवाही से वर्षों तक अतिक्रमण बढ़ता रहा, उनकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। रामगढ़ बांध का संरक्षण केवल एक जलाशय को बचाने का विषय नहीं है, बल्कि जयपुर और आसपास के क्षेत्रों के भविष्य के जल संकट से जुड़ा प्रश्न है। यदि अदालत की फटकार के बाद भी सरकार और प्रशासन निर्णायक कार्रवाई नहीं करते, तो आने वाली पीढ़ियां पूछेंगी कि जब चेतावनी मिल चुकी थी, तब भी जल स्रोतों को बचाने के लिए ठोस कदम क्यों नहीं उठाए गए। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह मामला कोई नया नहीं है। वर्षों से अदालत में सुनवाई चल रही है। समय-समय पर निर्देश भी दिए गए, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। अब फिर हाईकोर्ट ने जेडीए सहित संबंधित विभागों को फटकार लगाई है। यह फटकार इसलिए नहीं कि अतिक्रमण आज हुआ है, बल्कि इसलिए कि वर्षों से सब कुछ देखते हुए भी जिम्मेदार एजेंसियां प्रभावी कार्रवाई करने में असफल रही हैं। विडंबना यह है कि विकास के नाम पर जल स्रोतों का ही विकास रोक दिया गया। भूजल का अंधाधुंध दोहन जारी है, जबकि वर्षा जल के सबसे बड़े प्राकृतिक भंडारों को बचाने की दिशा में गंभीर प्रयास नहीं हुए। जब बांध सूखेंगे, नाले समाप्त होंगे और भूजल लगातार नीचे जाएगा, तब भविष्य में जल संकट और भयावह होना तय है।

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