समाज की सोच में कब आएगा बदलाव, कानून कड़े फिर भी सुरक्षित नहीं बेटियां 

    बेटियों को बचाने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। परिवार, समाज, स्कूल, पंचायतें, धार्मिक और सामाजिक संगठन-सभी को मिलकर ऐसी मानसिकता के खिलाफ अभियान चलाना होगा। जब तक बेटी के जन्म को सम्मान और गर्व का विषय नहीं बनाया जाएगा, तब तक केवल योजनाएं और नारे इस समस्या का समाधान नहीं कर पाएंगे। कानून के साथ-साथ सोच बदलने की भी लड़ाई लड़नी होगी।

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    बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसे सरकारी अभियान और महिलाओं के अधिकारों पर बढ़ती जागरूकता के बावजूद यदि नवजात बेटियों की हत्या नहीं रुक रही है। चंदवाजी थाना इलाके में बेटे की चाह में एक पिता ने अपनी नवजात बेटी को मार डाला। ऐसी घटनाएं अब भी हो रही हैं, तमाम समझाइश के बाद भी। समय-समय पर अवैध भ्रूण लिंग परीक्षण और उसके आधार पर कन्या भ्रूण हत्या से जुड़े मामलों का खुलासा होना भी इस बात का प्रमाण है कि कानून की सख्ती के बावजूद यह काला कारोबार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। चिकित्सा विभाग और संबंधित एजेंसियां लगातार कार्रवाई कर रही हैं, लेकिन जब तक ऐसे मामले सामने आते रहेंगे, तब तक यह मानना कठिन होगा कि समाज की सोच में अपेक्षित बदलाव आया है।

    चंदवाजी इलाके में बेटी की हत्या ने पूरे समाज को झकझोर दिया है। यह केवल एक परिवार का अपराध नहीं, बल्कि उस विकृत मानसिकता का परिणाम है जो आज भी बेटी के जन्म को स्वीकार नहीं कर पाती। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इक्कीसवीं सदी में भी बेटियों की हत्या की ऐसी घटनाएं क्यों नहीं रुक रही हैं? देश में बेटियों के संरक्षण के लिए अनेक कानून हैं। “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसे अभियान वर्षों से चलाए जा रहे हैं। महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक सशक्तीकरण पर करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। इसके बावजूद यदि कोई पिता अपनी ही नवजात बेटी की हत्या कर देता है, तो यह केवल कानून का नहीं बल्कि सामाजिक चेतना का भी संकट है। बेटी को बोझ समझने की मानसिकता, दहेज का डर, वंश चलाने की संकीर्ण सोच और सामाजिक दबाव आज भी कई परिवारों में जीवित हैं। यह सोच न केवल अमानवीय है, बल्कि सभ्य समाज के लिए शर्मनाक भी है। जिस बेटी को जन्म लेते ही जीवन का अधिकार नहीं मिलता, वहां विकास और समानता के दावे खोखले लगते हैं।

    ऐसे मामलों में केवल आरोपी को गिरफ्तार कर देना पर्याप्त नहीं है। यह भी जांच होनी चाहिए कि क्या परिवार पर किसी तरह का सामाजिक या आर्थिक दबाव था, क्या आसपास के लोगों को किसी खतरे की जानकारी थी और क्या प्रशासन तथा स्थानीय स्वास्थ्य तंत्र समय रहते कोई हस्तक्षेप कर सकता था। साथ ही ऐसे अपराधों में त्वरित जांच और शीघ्र न्याय सुनिश्चित होना चाहिए, ताकि समाज में स्पष्ट संदेश जाए कि बेटी की हत्या किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं की जाएगी। बेटियों को बचाने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। परिवार, समाज, स्कूल, पंचायतें, धार्मिक और सामाजिक संगठन-सभी को मिलकर ऐसी मानसिकता के खिलाफ अभियान चलाना होगा। जब तक बेटी के जन्म को सम्मान और गर्व का विषय नहीं बनाया जाएगा, तब तक केवल योजनाएं और नारे इस समस्या का समाधान नहीं कर पाएंगे। कानून के साथ-साथ सोच बदलने की भी लड़ाई लड़नी होगी। हर नवजात बेटी को जीने का अधिकार है। यदि हम उसे जन्म के साथ ही छीन लेते हैं, तो हम केवल एक मासूम की हत्या नहीं करते, बल्कि मानवता और अपने भविष्य की भी हत्या करते हैं।

    देश में प्रसव पूर्व लिंग परीक्षण पर प्रतिबंध लगाने के लिए सख्त कानून लागू है। इसका उद्देश्य केवल एक अपराध को रोकना नहीं, बल्कि बेटियों के अस्तित्व की रक्षा करना है। इसके बावजूद कुछ लालची लोग कानून की परवाह किए बिना इस अवैध धंधे में लगे हुए हैं। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि ऐसे परीक्षण कराने वाले परिवार भी इस अपराध में बराबर के भागीदार हैं। राजस्थान में लगातार होने वाली कार्रवाई यह भी बताती है कि प्रशासन सक्रिय है, लेकिन यह सवाल भी उठता है कि यदि छापों में बार-बार आरोपी पकड़े जा रहे हैं तो यह नेटवर्क अब तक पूरी तरह ध्वस्त क्यों नहीं हो पाया? क्या निगरानी में कहीं कमी है? क्या दोषियों को समय पर कठोर सजा नहीं मिल रही? क्या लाइसेंस रद्द करने और कानूनी कार्रवाई के बाद भी नए तरीके से यह धंधा फिर शुरू हो जाता है? इन सवालों के जवाब तलाशने होंगे।

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