CJP Foreign Funding Allegations: कॉकरोच जनता पार्टी की फण्डिंग को लेकर भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष मदन सिंह राठौड़ ने फिर सवाल खड़ा किया है। उन्होंने आंदोलन के पीछे विदेशी फंडिंग का आरोप लगाते हुए इसकी जांच की मांग की है। जंतर-मंतर पर चले कॉकरोच पार्टी के आंदोलन पर फंडिंग को लेकर समय-समय पर आरोप लगते रहे हैं। नीट पेपर लीक को लेकर केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर यह आंदोलन हुआ, बाद में धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा भी दे दिया और आंदोलन खत्म हो गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सीनियर नेता इंद्रेश कुमार भी कह चुके हैं कि इस आंदोलन के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ है। आरोपों के बाद मामला अदालत भी पहुंचा। दिल्ली हाईकोर्ट ने विदेशी फंडिंग की एनआईए से जांच कराने की मांग वाली जनहित याचिका को स्वीकार कर लिया। हालांकि विदेश मंत्रालय तक ने कह दिया कि उनके पास ऐसी कोई जानकारी नहीं आई है। इन आरोपों के समर्थन में कोई सार्वजनिक रूप से उपलब्ध निर्णायक जांच रिपोर्ट या कानूनी निष्कर्ष सामने नहीं आया है। विदेश से आ रही मदद के बार-बार लग रहे आरोपों पर कॉकरोच पार्टी ने भी जवाब दे दिया है कि ऐसा कुछ नहीं है। आरोप लगाने वाले सबूत पेश करें ।
लोकतंत्र में किसी भी आंदोलन या राजनीतिक संगठन की फंडिंग पारदर्शी होना आवश्यक है। यदि किसी संगठन पर विदेशी फंडिंग का आरोप लगता है तो उसे हल्के में भी नहीं लिया जा सकता और बिना प्रमाण के सच भी नहीं माना जा सकता। सवाल यह नहीं है कि आरोप किसने लगाए, बल्कि यह है कि क्या उनके समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य हैं। यदि किसी एजेंसी के पास विदेशी धन के अवैध लेन-देन के प्रमाण हैं तो उन्हें कानून के अनुसार सार्वजनिक किया जाना चाहिए और दोषियों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि केवल राजनीतिक आरोपों के आधार पर किसी आंदोलन या संगठन को कटघरे में खड़ा किया जाएगा तो इससे लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर होगा।
दूसरी तरफ, जिस संगठन पर आरोप लगे हैं, उसकी भी जिम्मेदारी है कि वह अपनी आय, चंदे और खर्च का पूरा विवरण सार्वजनिक करे। पारदर्शिता केवल सरकार से ही नहीं, बल्कि आंदोलनों और सामाजिक संगठनों से भी अपेक्षित है। इससे जनता का विश्वास मजबूत होता है और अनावश्यक विवादों पर भी विराम लगता है। विदेशी फंडिंग का मुद्दा राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक व्यवस्था दोनों से जुड़ा है। इसलिए इसकी जांच राजनीति से ऊपर उठकर निष्पक्ष एजेंसियों द्वारा समयबद्ध तरीके से होनी चाहिए। जांच पूरी होने से पहले किसी को दोषी या निर्दोष घोषित करना उचित नहीं होगा। लोकतंत्र में आरोप नहीं, बल्कि प्रमाण बोलने चाहिए। सरकार का दायित्व है कि यदि आरोपों में दम है तो तथ्यों के साथ देश के सामने रखे। यदि आरोप निराधार हैं तो उन्हें भी स्पष्ट रूप से खारिज किया जाए। केवल बयानबाजी से न तो सच सामने आएगा और न ही जनता का विश्वास कायम रहेगा।
भारत की राजनीति में ये आरोप कोई नए नहीं हैं। अब तक अलग-अलग सरकारों और विपक्षी दलों ने समय-समय पर एक-दूसरे पर ऐसे आरोप लगाए हैं। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि इनमें से अनेक आरोप अदालतों या आधिकारिक जांच में साबित नहीं हो सके। इसलिए हर नए आरोप को अंतिम सत्य मान लेना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं होगा। देश के हित में सबसे आवश्यक है कि राजनीतिक विमर्श तथ्यों पर आधारित हो, न कि आशंकाओं और आरोपों पर। विदेशी फंडिंग जैसा गंभीर विषय राजनीति का हथियार नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और पारदर्शिता का विषय होना चाहिए। लोकतंत्र में अंततः आरोप नहीं, बल्कि प्रमाण ही सबसे बड़ी कसौटी होते हैं। सरकार में ही बैठे लोग आरोप लगा रहे हैं तो जाहिर सी बात है कि जांच करा ली जाए। बेवजह शोर मचाने से झूठ सच नहीं होगा।



