जयपुर। राजस्थान की सियासत में ‘थप्पड़ कांड’ से सुर्खियों में आए निर्दलीय नेता नरेश मीणा को राजस्थान हाईकोर्ट से एक बार फिर बड़ी राहत मिल गई है। देवली-उनियारा उपचुनाव के दौरान समरावता गांव में कैमरे के सामने एसडीएम को थप्पड़ मारने के चर्चित मामले में हाईकोर्ट ने उन्हें सशर्त जमानत मंजूर कर ली है। हाल ही में टोंक की स्पेशल एससी-एसटी कोर्ट ने जमानत की शर्तों का उल्लंघन करने का हवाला देते हुए नरेश मीणा की बेल रद्द कर दी थी, जिसके बाद उन्हें सरेंडर करना पड़ा था। लेकिन अब हाईकोर्ट के इस ताजा आदेश के बाद न सिर्फ नरेश मीणा के जेल से बाहर आने का रास्ता साफ हो गया है, बल्कि पूरे घटनाक्रम पर कई बड़े राजनीतिक और कानूनी सवाल खड़े हो गए हैं।
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क्या था पूरा मामला और जमानत रद्द होने का विवाद?
समरावता कांड के बाद जेल गए नरेश मीणा को पहले भी हाईकोर्ट से जमानत मिल चुकी थी। हालांकि, इसके बाद झालावाड़ में हुए एक दुखद स्कूल हादसे में जब 7 बच्चों की मौत हुई, तो नरेश मीणा पीड़ितों के हक में धरने पर बैठ गए थे। नगरफोर्ट थाना पुलिस ने इसी प्रदर्शन को आधार बनाकर एससी-एसटी कोर्ट में याचिका दाखिल की थी कि नरेश मीणा ने जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया है। निचली अदालत ने पुलिस की अर्जी स्वीकार करते हुए बेल रद्द कर दी, जिसके बाद नरेश मीणा को दोबारा जेल जाना पड़ा था।
हाईकोर्ट में पुलिस के दावों की खुली पोल: 3 में से 2 मामलों में रोल नहीं
जस्टिस अनिल उपमन की सिंगल बेंच में जब इस मामले की सुनवाई हुई, तो पुलिस के दावों पर गंभीर सवाल उठे।
- कोर्ट का रुख: हाईकोर्ट ने पाया कि जमानत रद्द होने के बाद पुलिस ने नरेश मीणा पर जो 3 नए मामले दर्ज किए थे, उनमें से 2 मुकदमों में उनकी कोई प्रत्यक्ष भूमिका ही नहीं थी।
- राजनीति से प्रेरित मुकदमे: नरेश मीणा के वकीलों (एडवोकेट रजनीश गुप्ता और फतेह राम मीणा) ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल के खिलाफ दर्ज अधिकतर मामले विशुद्ध रूप से राजनीति से प्रेरित हैं। कोर्ट ने भी प्रथम दृष्टया माना कि जनहित के मुद्दों पर आवाज उठाने को सीधे तौर पर बेल की शर्तों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने लगाईं ये 3 कड़ी शर्तें
भले ही अदालत ने नरेश मीणा को राहत दे दी हो, लेकिन इस बार उनके बाहर रहने के नियम बेहद सख्त तय किए गए हैं:
- थाने में हाजिरी: नरेश मीणा को हर महीने के पहले सप्ताह में संबंधित पुलिस थाने में जाकर अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होगी।
- नए अपराध पर रोक: जमानत अवधि के दौरान वे किसी भी अन्य गैर-कानूनी या आपराधिक गतिविधि में शामिल नहीं होंगे।
- ‘महिमामंडन’ पर पाबंदी: कोर्ट ने सबसे अहम शर्त यह रखी है कि जेल से बाहर आने के बाद नरेश मीणा सोशल मीडिया या सार्वजनिक मंचों पर अपनी छवि का कोई शक्ति प्रदर्शन या ‘ग्लोरिफिकेशन’ (महिमामंडन) नहीं करेंगे।
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सियासी गलियारों में उठे तीखे सवाल
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद प्रदेश की प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था पर कई सवाल तैरने लगे हैं:
- क्या नगरफोर्ट थाना पुलिस ने जल्दबाजी में या किसी प्रशासनिक दबाव में आकर जमानत रद्द कराने की अर्जी लगाई थी?
- क्या किसी हादसे या जनहित के मुद्दे पर पीड़ित परिवारों के साथ खड़े होना कानूनी तौर पर ‘अपराध’ या ‘शर्तों का उल्लंघन’ है?
- क्या नरेश मीणा पर बार-बार कानूनी शिकंजा कसना महज कानून-व्यवस्था का मामला है, या इसके पीछे उन्हें सियासी तौर पर किनारे करने की रणनीति काम कर रही है?
अदालत के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि कानून का इस्तेमाल किसी राजनीतिक हिसाब-किताब के लिए नहीं किया जा सकता। अब देखना यह होगा कि हाईकोर्ट की सख्त शर्तों के बीच नरेश मीणा का अगला सियासी रुख क्या रहता है।



