जयपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रज्ञा प्रवाह प्रकल्प द्वारा आयोजित होने वाला राष्ट्रीय विचार कुंभ लोकमंथन 2026 इस बार गुलाबी नगरी जयपुर की धरती पर आयोजित होने जा रहा है। आगामी 4 से 6 दिसंबर तक आयोजित होने वाले इस त्रि-दिवसीय समागम का केंद्रीय विषय हम भारत के लोग रखा गया है। भारतीय ज्ञान परंपरा, लोक संस्कृति और जनजातीय जीवन-मूल्यों को सहेजने के संकल्प के साथ होने वाला यह आयोजन केवल एक बौद्धिक विमर्श नहीं, बल्कि आधुनिक वैश्विक चुनौतियों के बीच भारत की सांस्कृतिक आत्मा की खोज का एक सशक्त माध्यम है। राजस्थान जो अपने शौर्य, कला और बहुरंगी लोक परंपराओं के लिए विश्वविख्यात है, इस वैचारिक मंथन की मेजबानी के लिए सबसे उपयुक्त स्थान है। लोकमंथन का यह संस्करण भारतीयता के मूल स्रोतों को फिर से टटोलने और स्व के बोध को जगाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम साबित होगा।
लोकमंथन एक ऐसा मंच है जो देश के उन छिपे हुए विचारकों, लोक कलाकारों, शिल्पकारों और बुद्धिजीवियों को एक साथ लाता है जो अकादमिक जगत के बंधे-बंधाए ढांचों से दूर रहकर भी भारतीय समाज को जीवंत बनाए हुए हैं। इससे पहले भोपाल, गुवाहाटी और भाग्यनगर (हैदराबाद) जैसे सांस्कृतिक केंद्रों में इसके सफल आयोजन हो चुके हैं। इस बार जयपुर संस्करण के लिए अभी से राज्यभर में ‘लोक दर्शन यात्रा’ से उत्सव का माहौल तैयार किया जा चुका है।
संविधान की प्रस्तावना का पहला वाक्य हम भारत के लोग केवल एक राजनैतिक परिभाषा नहीं है, बल्कि यह हजारों वर्षों की सांस्कृतिक निरंतरता का उद्घोष है। जब पश्चिमी दुनिया ने ‘नेशन-स्टेट’ की अवधारणा सोची भी नहीं थी, तब भारत के ऋषियों ने वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः का मंत्र दिया था। लोकमंथन के माध्यम से इसी प्राचीन एकात्म भाव को समकालीन संदर्भों में व्याख्यायित किया जाएगा।
आज जब वैश्विक स्तर पर समाज विखंडन, सांस्कृतिक औपनिवेशिकता और वैचारिक भटकाव का सामना कर रहा है, तब भारतीय लोक-दृष्टि ही समन्वय का मार्ग दिखा सकती है। भारत की एकता उसकी विविधता में निहित है और यह विविधता हमारे लोकगीतों, कथाओं, उत्सवों और पारंपरिक ज्ञान में रची-बसी है। रामकथा, लोकनाट्यों और स्थानीय परंपराओं ने सदियों से हमारे समाज का चरित्र निर्माण किया है। राजस्थान की प्यासी धरती पर जल संरक्षण की जो कुईं और जोहड़ जैसी लोक परंपराएं हैं, वे आज के आधुनिक इंजीनियरों के लिए भी शोध का विषय हैं। जब हम वर्ष 2047 तक एक विकसित भारत के निर्माण का स्वप्न देख रहे हैं, तो उसकी नींव केवल कंक्रीट की इमारतों या आर्थिक आंकड़ों पर नहीं टिकी हो सकती। एक आत्मनिर्भर और समर्थ राष्ट्र के लिए सांस्कृतिक स्वाभिमान का होना अनिवार्य है। अपनी जड़ों से कटे बिना आधुनिकता को अपनाना ही वास्तविक विकास है और लोकमंथन इसी संतुलन को साधने का प्रयास है।
लोकमंथन 2026 जयपुर केवल एक बौद्धिक विमर्श की औपचारिकता मात्र नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज के सामूहिक मानस को मथकर राष्ट्रीय नवजागरण का अमृत निकालने का महती प्रयास है। यह आयोजन इस बात का साक्षी बनेगा कि भारत अपनी प्राचीन विरासत पर गर्व करते हुए भविष्य की ओर कदम बढ़ा रहा है। जयपुर की धरा से निकलने वाले विचार बिंदु आगामी दशकों में देश की नीतियों और सामाजिक समरसता को एक नई तथा सकारात्मक दिशा प्रदान करेंगे, जिससे देश की सांस्कृतिक चेतना और अधिक सुदृढ़ होगी।



