गुवाहाटी। भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाले रणनीतिक सिलीगुड़ी कॉरिडोर यानी ‘चिकन नेक’ में सुरक्षा और कनेक्टिविटी को मजबूत करने की दिशा में कई अहम परियोजनाओं पर काम किया जा रहा है। इस संकरे गलियारे से पूर्वोत्तर भारत का सड़क और रेल संपर्क गुजरता है। भारतीय रेलवे ने इस संवेदनशील क्षेत्र में भूमिगत रेल लाइन विकसित करने की योजना भी सामने रखी है, ताकि आपातकालीन परिस्थितियों में सैन्य उपकरणों, जवानों और जरूरी सामान की आवाजाही अधिक सुरक्षित और निर्बाध रह सके। रिपोर्ट के मुताबिक, डोकलाम विवाद के बाद क्षेत्र में सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने की दिशा में कई परियोजनाओं पर जोर दिया जा रहा है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि परियोजनाओं के पूरा होने पर सैन्य दस्तों और भारी हथियारों को सीमा तक पहुंचाने में लगने वाला समय 12 से 18 घंटे से घटकर करीब 3 घंटे हो सकता है। हालांकि, इस समय-सीमा की आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध जानकारी में नहीं मिली है।
36 किलोमीटर की भूमिगत रेल लाइन से मजबूत होगी कनेक्टिविटी
सिलीगुड़ी कॉरिडोर में प्रस्तावित भूमिगत रेल परियोजना को रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे की योजना के अनुसार, नई रेल लाइन टिनमाइल हाट से रंगापानी होते हुए बागडोगरा तक जाएगी। रेलवे से जुड़ी रिपोर्टों के अनुसार, इस परियोजना का प्रस्तावित भूमिगत रेल खंड करीब 35.76 किलोमीटर लंबा होगा। इसका उद्देश्य संवेदनशील कॉरिडोर में रेल संपर्क को अधिक सुरक्षित और भरोसेमंद बनाना है। इस वैकल्पिक रेल मार्ग से आपातकाल के दौरान सैन्य उपकरणों, रक्षा सामग्री और राहत सामग्री की आवाजाही को जारी रखने में मदद मिल सकती है। भूमिगत मार्ग का एक प्रमुख उद्देश्य मौजूदा रेल नेटवर्क पर निर्भरता कम करना और किसी बाधा की स्थिति में वैकल्पिक परिवहन सुविधा उपलब्ध कराना है।
क्या है सिलीगुड़ी कॉरिडोर और क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
सिलीगुड़ी कॉरिडोर पश्चिम बंगाल में स्थित एक संकरा भूभाग है, जो पूर्वोत्तर भारत को देश के शेष हिस्सों से जोड़ता है। इसे ‘चिकन नेक’ भी कहा जाता है। अपने रणनीतिक महत्व के कारण यह क्षेत्र भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और परिवहन व्यवस्था का एक अहम हिस्सा है। इस कॉरिडोर के आसपास नेपाल, भूटान और बांग्लादेश की सीमाएं हैं, जबकि चीन की चुंबी घाटी भी इसके नजदीक स्थित है। सीमित भौगोलिक चौड़ाई और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से निकटता के कारण यहां सड़क, रेल और अन्य बुनियादी ढांचे को मजबूत करना महत्वपूर्ण माना जाता है। इस क्षेत्र में परिवहन नेटवर्क बाधित होने से पूर्वोत्तर राज्यों तक आवश्यक सामान पहुंचाने और सैन्य रसद की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इसी वजह से वैकल्पिक मार्ग और अतिरिक्त क्षमता विकसित करने की योजनाओं पर जोर दिया जा रहा है।
डोकलाम विवाद के बाद सुरक्षा पर बढ़ा ध्यान
जून 2017 में भारत और चीन के बीच डोकलाम क्षेत्र में लंबे समय तक गतिरोध रहा था। इसके बाद भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे, संपर्क मार्गों और सैन्य तैयारियों को मजबूत करने का महत्व और बढ़ गया। सिलीगुड़ी कॉरिडोर की रणनीतिक स्थिति को देखते हुए यहां परिवहन सुविधाओं का विस्तार केवल यातायात सुधारने तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य सामान्य परिस्थितियों के साथ-साथ आपातकाल में भी पूर्वोत्तर राज्यों से संपर्क बनाए रखना है। भूमिगत रेल मार्ग, बेहतर रेलवे क्षमता और सीमावर्ती क्षेत्रों तक पहुंचने वाले बुनियादी ढांचे को इस व्यापक रणनीति के महत्वपूर्ण हिस्सों के रूप में देखा जा रहा है।
भूमिगत कमांड सेंटर और सुरक्षा परियोजनाओं को लेकर क्या दावा है?
प्राप्त रिपोर्ट में ‘ऑपरेशन फोर्ट्रेस सिलीगुड़ी’ के तहत सात-स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था विकसित करने और लगभग 534 करोड़ रुपये की परियोजना का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट में भूमिगत कमांड सेंटर, संचार केंद्र, एयर डिफेंस सुविधाओं और बम शेल्टर जैसी संरचनाओं का भी दावा किया गया है। हालांकि, इन सभी विवरणों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध स्रोतों से नहीं हो सकी है। इसलिए परियोजना की लागत, संरचनाओं की संख्या और निर्माण की समय-सीमा को अंतिम सरकारी आंकड़े के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार और संबंधित एजेंसियों की ओर से बुनियादी ढांचे पर ध्यान दिया जा रहा है। अगस्त 2026 में गृह मंत्रालय की ओर से जारी जानकारी में भी इस कॉरिडोर की सुरक्षा और विभिन्न बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की समीक्षा का उल्लेख किया गया था।
2029 तक परियोजनाएं पूरी होने का दावा
मीडिया रिपोर्ट में बताया गया है कि कुछ सुरक्षा और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इनके पूरा होने पर सैन्य आवाजाही, रक्षा सामग्री की आपूर्ति और पूर्वोत्तर के साथ संपर्क व्यवस्था को मजबूती मिलने की उम्मीद जताई गई है। हालांकि, सभी परियोजनाओं के लिए एक समान समय-सीमा और सेना की आवाजाही में 18 घंटे से 3 घंटे तक कमी आने के दावे की आधिकारिक पुष्टि जरूरी है। कुल मिलाकर, सिलीगुड़ी कॉरिडोर में प्रस्तावित भूमिगत रेल संपर्क और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाएं पूर्वोत्तर भारत की कनेक्टिविटी और रणनीतिक तैयारियों के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। इनके पूरा होने से परिवहन व्यवस्था को अधिक मजबूत और आपातकालीन परिस्थितियों में अधिक भरोसेमंद बनाने में मदद मिल सकती है।



