नई दिल्ली। घर का किराया कम करने के लिए ऑफिस से दूर घर लेना शुरुआत में फायदे का सौदा लग सकता है, लेकिन Gurgaon के एक शख्स का अनुभव इस फैसले की दूसरी तस्वीर दिखाता है। Ayan Chakravarty ने किराए में हर महीने करीब 20 हजार रुपये बचाए, लेकिन इसके बदले उनकी रोजाना करीब तीन घंटे की यात्रा ने समय और अतिरिक्त खर्च का बोझ बढ़ा दिया। यह पूरा अनुभव उन्होंने सोशल मीडिया पर साझा किया, जिसके बाद यह चर्चा का विषय बन गया।
Ayan के मुताबिक, 2023 में Gurgaon आने के बाद वह पहले अपने ऑफिस के आसपास रहते थे। बाद में ज्यादा किराए और घर से जुड़ी परेशानियों के चलते उन्होंने अपेक्षाकृत दूर और सस्ता घर चुन लिया। नया घर बड़ा था और किराया करीब 20 हजार रुपये कम था, इसलिए शुरुआत में उन्हें लगा कि उन्होंने अच्छा आर्थिक फैसला किया है।
लेकिन घर बदलने के बाद उनकी रोजाना की यात्रा काफी लंबी हो गई। ऑफिस आने-जाने में करीब 3 घंटे लगने लगे और रोज लगभग 60 किलोमीटर का सफर करना पड़ता था। पांच दिन के कामकाजी सप्ताह के हिसाब से सालभर में यात्रा का समय करीब 780 घंटे, यानी लगभग 32 दिनों के बराबर बैठा।
किराया बचा, लेकिन सफर का खर्च बढ़ गया
दूरी बढ़ने के साथ वाहन का खर्च भी बढ़ा। Ayan के अनुसार पहले उनका रोजाना ईंधन खर्च करीब 200 रुपये था, जो नए घर से आने-जाने के बाद लगभग 600 रुपये प्रतिदिन तक पहुंच गया। इस तरह हर महीने करीब 9 हजार रुपये अतिरिक्त ईंधन पर खर्च होने लगे।
यानी 20 हजार रुपये की किराया बचत का एक बड़ा हिस्सा यात्रा में ही निकलने लगा। इसके अलावा वाहन के रखरखाव, पार्किंग और अन्य संभावित खर्च अलग थे।
समय की कीमत का हुआ एहसास
Ayan ने अपने अनुभव के जरिए यह सवाल उठाया कि घर चुनते समय सिर्फ किराए को आधार बनाना कितना सही है। उनके मामले में कम किराए के बदले रोजाना कई घंटे सड़क पर गुजरने लगे, जिससे निजी समय भी प्रभावित हुआ।
उनकी कहानी सोशल मीडिया पर चर्चा में आने के बाद कई लोगों ने लंबे commute को लेकर अपने अनुभव साझा किए। इस पूरे मामले की खास सीख यही है कि घर का वास्तविक खर्च सिर्फ मासिक किराया नहीं होता। उसमें यात्रा का समय, ईंधन और रोजमर्रा की थकान भी शामिल होती है।



