Tuesday, June 2, 2026
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बिना मिसाइल के ‘ऑयल वॉर’! अमेरिका से लेकर भारत तक 6 देशों की रिफाइनरियां धूं-धूं कर जली, ईरान जंग के बीच अजीब रहस्‍य!

ईरान-अमेरिका जंग (US-Iran War) के बीच ग्लोबल मार्केट में कुछ बहुत ही रहस्यमयी घट रहा है। पिछले महज 45 दिनों के भीतर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, मैक्सिको और भारत समेत 6 ताकतवर देशों की तेल रिफाइनरियों का एक-एक करके जलना अब सिर्फ इत्तेफाक यानी Coincidence नहीं लग रहा है.....

नई दिल्ली/वॉशिंगटन। दुनिया की नजरें इस वक्त केवल अमेरिका (America) और ईरान (Iran) के युद्ध के मैदान पर टिकी हैं, लेकिन असली ‘खेला’ युद्ध क्षेत्र से हजारों मील दूर उन रणनीतिक ठिकानों पर हो रहा है जो दुनिया की अर्थव्यवस्था की रगों में दौड़ने वाले ‘काले सोने’ (Oil) को रिफाइन करते हैं। जब ईरान जंग के बीच वैश्विक स्तर पर तेल की त्राहि-त्राहि मची हुई है, तब बीते 45 दिनों के भीतर जो कुछ हुआ है, उसने दुनिया भर की खुफिया एजेंसियों के होश उड़ा दिए हैं।

अमेरिका की चमकती रिफाइनरियों से लेकर ऑस्ट्रेलिया के शांत तटों और मैक्सिको की नई यूनिट्स तक… एक के बाद एक 6 देशों की तेल संपत्तियां धू-धू कर जल उठी हैं। सवाल यह नहीं है कि आग बुझी या नहीं, सवाल यह है कि क्या ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ के जरिए दुनिया की सप्लाई चेन का गला घोंटने की कोशिश की जा रही है? क्या यह महज एक तकनीकी इत्तेफाक है कि जब कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, तभी रिफाइनिंग पावरहाउस एक-एक करके मलबे में तब्दील हो रहे हैं?

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होर्मुज से लेकर रिफाइनरियों तक: जंग का बदला हुआ चेहरा

अमेरिका और ईरान की सैन्य ताकत में जमीन-आसमान का अंतर है, लेकिन इस जंग ने साबित कर दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल मिसाइलों से नहीं, बल्कि ‘मार्केट मैनिपुलेशन’ से भी लड़े जाते हैं। अमेरिका ने शायद ही सोचा होगा कि यह संघर्ष इतना खिंच जाएगा। लेकिन जैसे ही ईरान ने ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ जैसी नब्ज पर हाथ रखा और खाड़ी देशों के तेल प्लांट निशाने पर आए, वैश्विक बाजार का रुख ही पलट गया।

नतीजा हमारे सामने है-फरवरी 2026 में जो कच्चा तेल 66 डॉलर प्रति बैरल पर स्थिर था, वह अप्रैल आते-आते 100 डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर चुका है। अब दुनिया भर की रिफाइनरियों में लग रही यह ‘रहस्यमय आग’ इस संकट को उस मोड़ पर ले आई है, जहाँ से वैश्विक मंदी का रास्ता शुरू होता है।

तारीख-दर-तारीख: जलती रिफाइनरियों का ‘ब्लैक कैलेंडर’

इक्वाडोर (1 मार्च): दक्षिण अमेरिका की सबसे बड़ी रिफाइनरी ‘एस्मेराल्डास’ के चार्ज पंप में भीषण आग लगी। 1,10,000 बैरल प्रतिदिन की क्षमता वाला प्लांट अचानक खामोश हो गया।

मेक्सिको (17 मार्च): अभी दुनिया इक्वाडोर को भूली भी नहीं थी कि मेक्सिको की अत्याधुनिक ‘ओल्मेका’ रिफाइनरी आग की लपटों में घिर गई। इस हादसे ने 5 जिंदगियां निगल लीं और मेक्सिको की तेल उम्मीदों को बड़ा झटका दिया।

अमेरिका (23 मार्च और 10 अप्रैल): महाशक्ति अमेरिका के टेक्सास में दो बड़े धमाके हुए। वालियरो पोर्ट आर्थर और मैराथन की अल पासो रिफाइनरी में आग ने न केवल तेल जलाया, बल्कि अमेरिका की आंतरिक सुरक्षा पर भी सवाल खड़े कर दिए।

ऑस्ट्रेलिया (16 अप्रैल): मेलबर्न के करीब ‘विवा कोरियो रिफाइनरी’ में लगी आग ने विक्टोरिया प्रांत के 50% ईंधन बैकअप को हिलाकर रख दिया।

म्यांमार (20 अप्रैल): ह्मावबी नदी बंदरगाह पर 10 टैंकरों और जहाजों का एक साथ जलना किसी सुनियोजित हमले जैसा प्रतीत हुआ।

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भारत: पचपदरा रिफाइनरी में भी मची खलबली

इसी वैश्विक कड़ी में अब भारत की पचपदरा रिफाइनरी का नाम भी जुड़ गया है। राजस्थान के इस ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ में लगी आग के कारणों की जांच अभी उच्च स्तर पर चल रही है। हालांकि, एक्सपर्ट्स इस बात से चिंतित हैं कि क्या भारत जैसे उभरते बाजार की ऊर्जा सुरक्षा को भी ‘सॉफ्ट टारगेट’ बनाया जा रहा है?

किसे मिल रहा है इस बर्बादी का फायदा?

जब दुनिया की रिफाइनिंग क्षमता कम होती है, तो कच्चे तेल की मांग बेतहाशा बढ़ती है। ऐसे में वेनेजुएला (303.2 बिलियन बैरल रिजर्व) और खुद ईरान (208.6 बिलियन बैरल रिजर्व) जैसे देश रणनीतिक रूप से मजबूत हो जाते हैं।

विशेषज्ञों का एक धड़ा सोशल मीडिया (X) पर दावा कर रहा है कि यह ‘स्लीपर सेल्स’ के जरिए अंजाम दिया गया हैंड-ब्रेक वॉरफेयर है। यानी बिना सीधे युद्ध किए दुश्मन की अर्थव्यवस्था का हाथ मरोड़ देना। अगर यह सिलसिला नहीं थमा, तो आने वाले महीनों में $100 का आंकड़ा केवल एक शुरुआत साबित होगा।

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