जयपुर। राजस्थान में पंचायत चुनावों की सरगर्मी बढ़ने के साथ उन नेताओं की राजनीतिक यात्रा भी चर्चा में है, जिन्होंने अपनी सियासत की शुरुआत गांव की राजनीति से की और आगे चलकर प्रदेश की सत्ता से लेकर संसद तक का सफर तय किया। राजस्थान की राजनीति में ऐसे कई चेहरे हैं, जिन्होंने सरपंच, पंचायत समिति सदस्य या जिला प्रमुख के तौर पर अपनी पारी शुरू की और बाद में विधायक, मंत्री, प्रदेश अध्यक्ष, सांसद यहां तक कि मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचे।
पंचायत स्तर की राजनीति ने इन नेताओं को ग्रामीण इलाकों की समस्याओं और स्थानीय स्तर के मुद्दों को करीब से समझने का मौका दिया। संगठन और चुनावी राजनीति का शुरुआती अनुभव भी इन्हीं पदों से मिला। यही वजह है कि राजस्थान की सियासत में पंचायतों को नेताओं की राजनीतिक पाठशाला के तौर पर भी देखा जाता है।
भजनलाल शर्मा: सरपंच से मुख्यमंत्री तक का सफर
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने भी अपनी राजनीतिक यात्रा पंचायत स्तर से शुरू की। वे वर्ष 2000 से 2005 तक भरतपुर की अटारी ग्राम पंचायत के सरपंच रहे। इसके बाद उन्होंने भाजपा संगठन में अलग-अलग जिम्मेदारियां संभालीं और प्रदेश उपाध्यक्ष तथा महामंत्री जैसे पदों पर रहे। वर्ष 2023 में उन्होंने पहली बार सांगानेर विधानसभा सीट से चुनाव जीता। इसके बाद 15 दिसंबर 2023 को राजस्थान के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
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जोराराम कुमावत: सरपंच से कैबिनेट मंत्री तक
कैबिनेट मंत्री जोराराम कुमावत का राजनीतिक सफर भी ग्राम पंचायत से शुरू हुआ। वे 2000 से 2005 तक सिंदरू ग्राम पंचायत के सरपंच रहे। इसके बाद उन्होंने सुमेरपुर नगरपालिका के अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली। वर्ष 2014 से 2018 तक नगरपालिका अध्यक्ष रहने के बाद वे 2018 और 2023 में सुमेरपुर से विधायक चुने गए। वर्ष 2023 में उन्हें राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया।
झाबर सिंह खर्रा: पंचायत समिति के प्रधान से मंत्री तक
मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने पंचायत समिति स्तर से अपनी राजनीतिक पहचान बनाई। वे वर्ष 2005 और 2010 में श्रीमाधोपुर पंचायत समिति के प्रधान रहे। इसके बाद उन्होंने विधानसभा चुनाव में भी अपनी जगह बनाई। वे 2013 और 2023 में विधायक चुने गए। वर्ष 2023 में उन्हें राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार की जिम्मेदारी दी गई।
हरलाल सिंह खर्रा: सरपंच से पांच बार विधायक
राजस्थान की राजनीति में हरलाल सिंह खर्रा का सफर भी पंचायत से विधानसभा तक पहुंचा। वे 1957 से 1961 तक महरौली के सरपंच रहे। इसके बाद 1965 से 1967 तक पंचायत समिति प्रधान की जिम्मेदारी संभाली। वर्ष 1967 में पहली बार श्रीमाधोपुर विधानसभा सीट से विधायक बने। इसके बाद वे कुल पांच बार विधायक रहे। वर्ष 1990 में उन्हें पंचायतीराज मंत्री बनाया गया।
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गोविंद सिंह डोटासरा: पंचायत समिति सदस्य से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष तक
कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने भी अपनी राजनीतिक पारी स्थानीय निकाय से शुरू की। वर्ष 2005 में वे पंचायत समिति सदस्य बने और इसके बाद प्रधान की जिम्मेदारी संभाली। वर्ष 2008 से वे लगातार चार बार विधायक रहे। पिछली कांग्रेस सरकार में उन्होंने शिक्षा राज्यमंत्री का पद संभाला। इसके बाद वर्ष 2020 में उन्हें राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया।
टीकाराम जूली: जिला प्रमुख से नेता प्रतिपक्ष तक
राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली भी पंचायत राजनीति से आगे बढ़े। वे वर्ष 2005 में अलवर के जिला प्रमुख रहे। इसके बाद वर्ष 2008 में अलवर ग्रामीण विधानसभा सीट से पहली बार विधायक बने। 2018 और 2023 में भी उन्होंने जीत दर्ज की। अशोक गहलोत सरकार में वे कैबिनेट मंत्री रहे। वर्ष 2024 में उन्हें राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी मिली।
शांति धारीवाल: जिला प्रमुख से सांसद और मंत्री तक
पूर्व मंत्री शांति कुमार धारीवाल की राजनीतिक शुरुआत छात्र राजनीति से हुई थी। इसके बाद उन्होंने स्थानीय राजनीति में कदम रखा और वर्ष 1982 में कोटा जिला प्रमुख बने। इसके दो साल बाद, यानी 1984 में उन्होंने कोटा लोकसभा सीट से चुनाव जीता और संसद पहुंचे। आगे चलकर वे राजस्थान सरकार में मंत्री भी रहे।
भरत सिंह: मंत्री बनने के बाद फिर बने वार्ड पंच
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे भरत सिंह का राजनीतिक सफर भी पंचायत से जुड़ा रहा है। वे तीन बार कुंदनपुर के सरपंच रहे और करीब 10 साल तक सांगोद पंचायत समिति के प्रधान की जिम्मेदारी संभाली। वर्ष 1993 में पहली बार खानपुर से विधायक बने। इसके बाद दीगोद और सांगोद से भी विधानसभा पहुंचे और राज्य सरकार में मंत्री रहे। खास बात यह रही कि वर्ष 2014 में वे कुंदनपुर से वार्ड पंच भी बने।
अमराराम: सरपंच से संसद तक
सांसद अमराराम ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत मूंडवाड़ा से सरपंच बनकर की। इसके बाद वे धोद और दांतारामगढ़ विधानसभा क्षेत्रों से चार बार विधायक रहे। वर्ष 2024 में उन्होंने सीकर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल कर संसद पहुंचे। इस तरह पंचायत स्तर से शुरू हुआ उनका राजनीतिक सफर संसद तक पहुंचा।
प्रेमचंद बैरवा और किरोड़ी लाल मीणा का भी पंचायत से जुड़ाव
राजस्थान के उपमुख्यमंत्री डॉ. प्रेमचंद बैरवा भी पंचायत स्तर की राजनीति से जुड़े रहे हैं। वे वर्ष 2000 से 2005 तक जिला परिषद सदस्य रहे। उस दौरान उन्होंने दूदू पंचायत समिति के वार्ड 15 से चुनाव लड़ा था।
वहीं कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ी लाल मीणा ने भी जिला परिषद की राजनीति में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। उन्होंने फरवरी 1995 में जिला परिषद सदस्य का चुनाव लड़ा था और 22 दिसंबर 1998 तक दौसा के पहले जिला प्रमुख रहे।
पंचायत बनी कई नेताओं की राजनीतिक पाठशाला
राजस्थान की राजनीति के इन उदाहरणों से साफ है कि पंचायत और स्थानीय निकायों की राजनीति कई बड़े नेताओं के लिए आगे बढ़ने का शुरुआती मंच रही है। गांव और पंचायत स्तर पर काम करने के दौरान मिले अनुभव ने कई नेताओं को विधानसभा, सरकार, संगठन और संसद तक पहुंचने का रास्ता दिया। अब जब राजस्थान में पंचायत चुनावों को लेकर सियासी गतिविधियां तेज हैं, ऐसे में एक बार फिर गांवों की राजनीति से निकलने वाले नए चेहरों पर सबकी नजर रहेगी।



