नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले की प्राचीर से नक्सलवाद का जिक्र करते हुए कहा कि देश ने लंबे समय तक नक्सली हिंसा का सामना किया है। उन्होंने दावा किया कि अब हथियारबंद नक्सली हिंसा कमजोर हो रही है। इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री ने ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए कहा कि हथियारबंद नक्सलियों के कमजोर होने के बावजूद वैचारिक स्तर पर चुनौती मौजूद है। उन्होंने ऐसे लोगों को पहचानने और अलग-थलग करने की जरूरत पर जोर दिया।
क्या होता है ‘दिमागी नक्सल’?
‘दिमागी नक्सल’ भारत के कानून में परिभाषित कोई आधिकारिक श्रेणी नहीं है। यह एक राजनीतिक और वैचारिक अभिव्यक्ति है, जिसका इस्तेमाल प्रधानमंत्री ने नक्सलवाद की वैचारिक चुनौती के संदर्भ में किया। पीएम मोदी के भाषण के संदर्भ में इसका मतलब ऐसे लोगों से जोड़ा जा सकता है, जिन पर नक्सली या माओवादी विचारधारा को वैचारिक समर्थन देने अथवा हिंसा और अराजकता को बढ़ावा देने का आरोप लगाया जाता है। हालांकि, केवल किसी व्यक्ति को इस राजनीतिक शब्द से संबोधित कर देना उसे अपराधी नहीं बना देता। किसी भी आपराधिक आरोप या कार्रवाई के लिए संबंधित कानून और साक्ष्यों की प्रक्रिया लागू होती है।
‘अर्बन नक्सल’ से क्या है संबंध?
‘दिमागी नक्सल’ शब्द सामने आने के बाद ‘अर्बन नक्सल’ शब्द की चर्चा भी तेज हो सकती है। पिछले कुछ वर्षों में ‘अर्बन नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल राजनीतिक बहस में ऐसे बुद्धिजीवियों, कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों या अन्य लोगों के लिए किया जाता रहा है, जिन पर माओवादी विचारधारा का समर्थन करने के आरोप लगाए जाते हैं। हालांकि ‘अर्बन नक्सल’ भी कोई सामान्य कानूनी श्रेणी नहीं है और इसके इस्तेमाल को लेकर लंबे समय से राजनीतिक विवाद रहा है।
सरकार के नजरिए में कौन हो सकता है ‘दिमागी नक्सल’?
प्रधानमंत्री के भाषण के आधार पर इस शब्द का संदर्भ उन लोगों से है, जिन पर सरकार के अनुसार नक्सली-माओवादी विचारधारा को बढ़ावा देने, हिंसा या अराजकता को सही ठहराने अथवा युवाओं को प्रभावित करने के आरोप हो सकते हैं। पीएम मोदी ने अपने संबोधन में यह भी संकेत दिया कि माओवादी विचारधारा का प्रभाव केवल जंगलों तक सीमित नहीं रहा और इसका असर संस्थानों तथा नीतिगत प्रक्रियाओं तक पहुंचाने के प्रयास किए गए।
पीएम मोदी का दावा- हथियारबंद नक्सलवाद आखिरी दौर में
प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि 2014 के बाद सरकार ने देश को नक्सलवाद से मुक्त करने का संकल्प लिया था। उन्होंने दावा किया कि नक्सली-माओवादी हिंसा अब अपने अंतिम दौर में है और जिन इलाकों में कभी गोलियों की आवाज सुनाई देती थी, वहां अब विकास और विश्वास का माहौल बन रहा है। इसी के साथ उन्होंने वैचारिक स्तर पर मौजूद चुनौती को ‘दिमागी नक्सल’ के रूप में सामने रखा।
नक्सलवाद की शुरुआत कहां से हुई?
भारत में नक्सली आंदोलन की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से हुई थी। इसके बाद यह आंदोलन देश के कई मध्य और पूर्वी हिस्सों में फैल गया। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और बिहार समेत कई राज्यों में माओवादी हिंसा लंबे समय तक सुरक्षा और विकास के लिए बड़ी चुनौती रही। सरकार ने सुरक्षा अभियानों के साथ-साथ सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य विकास योजनाओं को भी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बढ़ाने पर जोर दिया।
क्या सरकार की आलोचना करना ‘दिमागी नक्सल’ होना है?
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। सरकार की नीतियों की आलोचना करना या शांतिपूर्ण असहमति जताना अपने आप में नक्सली गतिविधि नहीं है। किसी व्यक्ति पर नक्सली हिंसा या प्रतिबंधित संगठन से जुड़ने जैसे गंभीर आरोप तभी लगाए जा सकते हैं जब उनके समर्थन में कानून के तहत ठोस आधार और साक्ष्य मौजूद हों। यही वजह है कि ‘दिमागी नक्सल’ शब्द के इस्तेमाल के बाद राजनीतिक बहस में इसकी परिभाषा और सीमा को लेकर सवाल उठ सकते हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है ‘दिमागी नक्सल’ शब्द?
लाल किले जैसे राष्ट्रीय मंच से इस शब्द का इस्तेमाल इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे नक्सलवाद की बहस केवल हथियारबंद संघर्ष तक सीमित नहीं रहती, बल्कि विचारधारा, संस्थानों और युवाओं को प्रभावित करने जैसे मुद्दों तक पहुंच जाती है। पीएम मोदी का संदेश यह है कि सरकार हथियारबंद नक्सलवाद के साथ-साथ उसके वैचारिक प्रभाव को भी चुनौती मानती है। वहीं, इस शब्द की कोई कानूनी परिभाषा नहीं होने के कारण इसके राजनीतिक इस्तेमाल को लेकर बहस आगे भी जारी रह सकती है।



