डिकॉय ऑपरेशन अभियान नहीं रोजमर्रा की पुलिसिंग का हिस्सा बने

    राजस्थान पुलिस का डिकॉय ऑपरेशन महिला सुरक्षा की दिशा में सराहनीय पहल है। एक दिन में 140 मनचलों की गिरफ्तारी यह साबित करती है कि सख्ती हो तो अपराधियों पर अंकुश लगाया जा सकता है। लेकिन सवाल यह है कि ऐसी कार्रवाई केवल अभियान तक सीमित क्यों रहती है?

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    राजस्थान पुलिस की ओर से महिला सुरक्षा को लेकर चलाया गया डिकॉय ऑपरेशन एक सराहनीय पहल है। ऑपरेशन के तहत कालिका पेट्रोलिंग यूनिट की महिला पुलिसकर्मियों ने सादे ड्रेस में कार्रवाई की। अभियान का उद्देश्य स्कूल, कॉलेज और भीड़भाड़ वाले इलाकों में महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। एक ही दिन में प्रदेशभर में 140 मनचलों को गिरफ्तार किया गया जो वाकई प्रशंसनीय है। सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की सुरक्षा आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। हर बार एक सवाल खड़ा होता है, जब कुछ घंटों या कुछ दिनों के अभियान में इतने लोग पकड़े जा सकते हैं, तो फिर बाकी दिनों में यही सख्ती लगातार क्यों नहीं दिखाई देती? असल में अपने यहां अधिकतर अभियान प्रतीकात्मक बनकर रह जाते हैं। कुछ दिन पुलिस की सक्रियता दिखाई देती है, सुर्खियां बनती हैं, आंकड़े जारी होते हैं और फिर व्यवस्था पुराने ढर्रे पर लौट आती है। मनचले भी यह समझ चुके हैं कि कार्रवाई स्थायी नहीं है, इसलिए कुछ दिन शांत रहने के बाद वे फिर उसी हरकत पर उतर आते हैं। यही कारण है कि महिलाओं और छात्राओं में स्थायी सुरक्षा का भरोसा नहीं बन पाता।

    महिला सुरक्षा कोई “अभियान” का विषय नहीं होना चाहिए। यह रोजमर्रा की पुलिसिंग का हिस्सा बनना चाहिए। स्कूल, कॉलेज, बाजार और सार्वजनिक परिवहन जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में नियमित निगरानी, लगातार पेट्रोलिंग और त्वरित कार्रवाई जरूरी है। यदि डिकॉय ऑपरेशन प्रभावी है तो इसे साल में एक-दो बार नहीं, बल्कि निरंतर व्यवस्था के रूप में लागू किया जाना चाहिए। सवाल पुलिस व्यवस्था पर भी उठता है। अक्सर संसाधनों और स्टाफ की कमी का तर्क दिया जाता है, लेकिन जब विशेष अभियान चल सकता है तो सामान्य दिनों में वही सतर्कता क्यों नहीं रह सकती? क्या सुरक्षा केवल किसी घटना के बाद जागने का विषय बनकर रह गई है? जनता भी तभी भरोसा करेगी जब उसे लगे कि कानून का डर हर दिन मौजूद है, केवल अभियान के दौरान नहीं। हकीकत यह भी है कि समाज अब भी छेड़छाड़ और अभद्रता को गंभीर अपराध की तरह देखने को तैयार नहीं है। कई मामलों में परिवार शिकायत दर्ज कराने से बचते हैं, कॉलेज प्रशासन बदनामी के डर से चुप रहता है और स्थानीय लोग तमाशबीन बने रहते हैं। ऐसे माहौल में अपराधियों का मनोबल बढ़ना स्वाभाविक है।

    जरूरत इस बात की है कि महिला सुरक्षा को राजनीतिक घोषणाओं और अल्पकालिक अभियानों से बाहर निकालकर स्थायी प्रशासनिक नीति बनाया जाए। हर जिले में जवाबदेही तय हो, संवेदनशील क्षेत्रों की नियमित मॉनिटरिंग हो और पकड़े गए आरोपियों पर त्वरित कार्रवाई दिखाई दे। क्योंकि डर केवल गिरफ्तारी से नहीं, बल्कि लगातार कार्रवाई से पैदा होता है। यदि अभियान खत्म होते ही हालात फिर जस के तस हो जाते हैं, तो इसका मतलब साफ है कि समस्या केवल अपराधियों की नहीं, बल्कि व्यवस्था की निरंतरता की भी है। महिला सुरक्षा तब ही मजबूत होगी जब सख्ती खबरों तक सीमित नहीं, बल्कि रोज की हकीकत बने। ऐसे अभियानों का सबसे बड़ा असर मनोवैज्ञानिक होता है। जब मनचलों को यह डर रहेगा कि सामने खड़ी लड़की या आसपास मौजूद कोई व्यक्ति पुलिस टीम का हिस्सा हो सकता है, तो उनकी हरकतों पर कुछ हद तक अंकुश लगेगा। लंबे समय से स्कूल, कॉलेज, बाजार और सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं को जिस असहज माहौल का सामना करना पड़ता रहा है, उसमें यह अभियान शुरुआती राहत दे सकता है। इस ऑपरेशन से पुलिस की सक्रियता का संदेश भी गया है। अक्सर महिलाओं से जुड़े मामलों में यह शिकायत रहती है कि कार्रवाई घटना के बाद होती है, रोकथाम पर कम ध्यान दिया जाता है। डिकॉय ऑपरेशन ने कम से कम यह दिखाया कि अपराध होने से पहले निगरानी और रोकथाम भी संभव है। यदि इसे लगातार जारी रखा जाए तो सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा का माहौल मजबूत हो सकता है। महिला-लड़कियों की सुरक्षा सरकार का पहला दायित्व है, इस पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

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