Petrol Pump Fraud: पूरा तेल मिलने की कोई गारंटी नहीं। पेट्रोल पंप पर तेल चोरी हो रहा है। यह चोरी तो अभी जांच के दौरान पकड़ी गई है। चल कितने बरसों से रही है, इसका ठीकठाक अंदाजा किसी को नहीं है। कई बार वाहन चालक इसकी शिकायत करते भी थे तो उनकी बात पर भरोसा नहीं किया जाता था। यह तो 3 मिलीलीटर की बात कही जा रही है, कई पेट्रोल पंप पर तो यह मात्रा काफी अधिक होती है। उपभोक्ता हित में चलाए गए औचक निरीक्षण में यह सामने आया है, वैसे पहले पेट्रोल पंप की जांच तो होती ही नहीं थी। पेट्रोल-डीजल चोरी केवल मशीन की तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि सुनियोजित खेल बन चुका है। उपभोक्ता वर्षों से शक जताते रहे कि गाड़ी की टंकी जितनी क्षमता की है, उससे ज्यादा का बिल कैसे बन जाता है या कुछ किलोमीटर में ही ईंधन खत्म कैसे हो जाता है। अब जब चिप, रिमोट और सॉफ्टवेयर के जरिए कम मात्रा में पेट्रोल-डीजल देने के मामले पकड़े जा रहे हैं, तब जाकर यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि आखिर इतने लंबे समय तक यह सब चलता कैसे रहा? असल में पेट्रोल पंप पर चोरी का तरीका बेहद चालाकी भरा होता है। डिस्पेंसिंग मशीनों में इलेक्ट्रॉनिक चिप या सॉफ्टवेयर से छेड़छाड़ कर दी जाती है। ग्राहक को स्क्रीन पर पूरा लीटर दिखाई देता है, लेकिन टंकी में कम ईंधन पहुंचता है। कई मामलों में रिमोट कंट्रोल से मशीन को ऑपरेट करने तक की बातें सामने आई हैं। यानी जांच का खतरा दिखा तो मशीन सामान्य, ग्राहक आया तो फिर “कट” शुरू। यह सीधी-सीधी जनता की जेब पर डाका है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह गड़बड़ी अब जाकर क्यों पकड़ी जा रही है? क्या पहले जांच नहीं होती थी? सच यह है कि पेट्रोल पंपों की नियमित मॉनिटरिंग अक्सर कागजों तक सीमित रह जाती है। नापतौल विभाग, तेल कंपनियां और स्थानीय प्रशासन समय-समय पर जांच का दावा तो करते हैं, लेकिन भ्रष्ट तंत्र और मिलीभगत के आरोप भी कम नहीं हैं। कई बार कार्रवाई केवल शिकायत आने पर होती है, जबकि व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि चोरी की संभावना ही खत्म हो जाए। यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि आम ग्राहक के पास खुद जांच करने का कोई मजबूत साधन नहीं होता। पांच लीटर टेस्ट की व्यवस्था है, लेकिन अधिकांश लोग जल्दबाजी में रहते हैं या उन्हें अधिकारों की जानकारी ही नहीं होती। इसी कमजोरी का फायदा उठाकर बेईमान लोग करोड़ों का खेल कर जाते हैं। अब सवाल समाधान का है। केवल छापेमारी और लाइसेंस निलंबन से समस्या खत्म नहीं होगी। जरूरत है कि हर पेट्रोल पंप की मशीन को रियल टाइम डिजिटल मॉनिटरिंग से जोड़ा जाए। जैसे बैंकिंग सिस्टम में हर लेनदेन रिकॉर्ड होता है, वैसे ही हर बूंद ईंधन की निगरानी हो। मशीनों की सीलिंग और सॉफ्टवेयर ऑडिट स्वतंत्र एजेंसियों से कराया जाए। शिकायत करने वाले उपभोक्ताओं को त्वरित कार्रवाई का भरोसा मिले और दोषी पाए जाने पर सिर्फ जुर्माना नहीं, बल्कि स्थायी लाइसेंस रद्द करने जैसी सख्त सजा हो।
जनता को भी जागरूक होना होगा। “जीरो” देखकर पेट्रोल भरवाना, रसीद लेना, शक होने पर तुरंत शिकायत करना और समय-समय पर मात्रा जांच की मांग करना जरूरी है। क्योंकि जहां ग्राहक सतर्क होता है, वहां चोरी लंबे समय तक टिक नहीं पाती। पेट्रोल पंप केवल कारोबार का स्थान नहीं, जनता के भरोसे का केंद्र हैं। अगर यहां भी ईमानदारी खत्म होने लगे तो फिर आम आदमी किस पर विश्वास करे? अब वक्त आ गया है कि सरकार, तेल कंपनियां और प्रशासन केवल दिखावटी जांच नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाएं जहां मशीन नहीं, ईमानदारी चले। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आम आदमी को आज भी ठीक से पता नहीं होता कि यदि उसके साथ पेट्रोल-डीजल में चोरी हो जाए तो शिकायत आखिर करे कहां? यही अनजानापन बेईमान तत्वों की सबसे बड़ी ताकत बन जाता है। सड़क पर चलने वाला आम वाहन चालक न तो मशीन की तकनीक समझता है और न ही कानूनी प्रक्रिया। उसे केवल इतना पता चलता है कि गाड़ी में तेल कम चल रहा है या बिल ज्यादा बन गया। लेकिन जब वह पेट्रोल पंप कर्मचारी से सवाल करता है तो उसे तकनीकी शब्दों और बहानों में उलझा दिया जाता है। कई लोग झंझट से बचने के लिए चुप रह जाते हैं।
यही चुप्पी धीरे-धीरे भ्रष्टाचार को व्यवस्था बना देती है। असल में शिकायत के कई रास्ते मौजूद हैं, लेकिन उनकी जानकारी और प्रभाव दोनों सीमित हैं। हर पेट्रोल पंप पर तेल कंपनी का हेल्पलाइन नंबर और शिकायत रजिस्टर होना चाहिए। नापतौल विभाग भी कार्रवाई कर सकता है। जिला प्रशासन, उपभोक्ता फोरम और पुलिस तक में शिकायत की जा सकती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या आम आदमी को यह व्यवस्था आसान और भरोसेमंद दिखाई देती है? दुर्भाग्य से जवाब “नहीं” है। कई बार शिकायत करने वाले को ही घंटों चक्कर काटने पड़ते हैं। जांच में देरी होती है, कार्रवाई की जानकारी नहीं मिलती और अंत में मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। यही कारण है कि लोग सोचने लगते हैं कि “थोड़े से पेट्रोल” के लिए कौन लड़ाई लड़े। लेकिन यही “थोड़ा-थोड़ा” जोड़कर करोड़ों की चोरी बन जाता है। पेट्रोल-डीजल की चोरी को रोका जाना चाहिए, इसके लिए भले ही पेट्रोल पंप का लाइसेंस निरस्त हो। कानून कड़े हों ताकि पेट्रोल-डीजल चोरी पर कड़ी सजा मिल सके।



