निजी वाहनों की रेलमपेल के बीच सार्वजनिक परिवहन के साधन हाशिए पर हैं। राजधानी जयपुर समेत प्रदेश के बड़े शहरों में बड़े-बड़े दावों के बीच आमजन आज भी बेहतर सार्वजनिक परिवहन सुविधा के लिए संघर्ष कर रहा है। ट्रैफिक का दबाव लगातार बढ़ रहा है। इसके बावजूद सार्वजनिक परिवहन का नेटवर्क सीमित और अव्यवस्थित बना हुआ है। कई इलाकों में नियमित बस सेवा नहीं है, तो कहीं बसों की संख्या इतनी कम है कि लोगों को लंबा इंतजार करना पड़ता है। मेट्रो जैसी आधुनिक व्यवस्था भी केवल सीमित दायरे तक सिमटी हुई है। मजबूरी में लोग निजी वाहनों का सहारा ले रहे हैं, जिससे सड़कें जाम और प्रदूषण दोनों बढ़ रहे हैं। राजधानी जयपुर में तो केवल 13 फीसदी आबादी ही बसों व पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल कर पा रहे हैं। पिंकसिटी को ग्रीन रफ्तार देने के लिए जयपुर सिटी ट्रांसपोर्ट सर्विसेज लिमिटेड (JCTSL) की इलेक्ट्रिक बसें तक भी अभी ठीक ढंग से शुरू नहीं हो पाई हैं। राजधानी में 150 ई बसें चलाने की घोषणा हुई हैं। लेकिन पहले बेड़े में महज 3 बसें ही आई हैं, 42 बसें जल्द आने का वादा किया जा रहा है। वहीं शहर के विस्तार को देखते हुए करीब डेढ़ हजार सिटी बसों की आवश्यकता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता क्यों नहीं दी जा रही? सरकारें सड़क निर्माण और फ्लाईओवर परियोजनाओं पर तो करोड़ों खर्च करती हैं, लेकिन बस सेवाओं के विस्तार, नई बसों की खरीद और आधुनिक परिवहन प्रणाली विकसित करने की दिशा में अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखती। जबकि किसी भी विकसित और व्यवस्थित शहर की पहचान मजबूत सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था से होती है। कमजोर सार्वजनिक परिवहन का असर केवल सफर तक सीमित नहीं रहता। इससे आम आदमी का समय और पैसा दोनों बर्बाद होते हैं। ट्रैफिक जाम बढ़ता है, प्रदूषण बढ़ता है और सड़क दुर्घटनाओं का खतरा भी अधिक हो जाता है। गरीब और मध्यम वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होता है, क्योंकि उनके पास निजी वाहन का विकल्प हमेशा उपलब्ध नहीं होता। जरूरत इस बात की है कि सरकार सार्वजनिक परिवहन को सुविधा नहीं, बल्कि बुनियादी आवश्यकता माने। रोडवेज बसों की संख्या बढ़ाई जाए, शहरों में आधुनिक और समयबद्ध बस नेटवर्क तैयार किया जाए, मेट्रो और ई-बस जैसी योजनाओं को तेजी से लागू किया जाए। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों तक नियमित और भरोसेमंद परिवहन सेवा पहुंचाना भी प्राथमिकता होनी चाहिए। कोटा, जोधपुर, उदयपुर और अजमेर जैसे बड़े शहरों में भी हालात बहुत अलग नहीं हैं। इन शहरों में आबादी और शहरीकरण तेजी से बढ़ा है, लेकिन सार्वजनिक परिवहन उसी गति से विकसित नहीं हो पाया। शहरों के विस्तार के साथ नई कॉलोनियां तो बस गईं, लेकिन वहां तक बस सेवाएं और बेहतर कनेक्टिविटी नहीं पहुंच सकी। लोगों के पास ऑटो, निजी बस या निजी वाहन ही एकमात्र विकल्प बचता है।
राजधानी जयपुर की स्थिति सबसे अधिक चिंता बढ़ाने वाली है। स्मार्ट सिटी और आधुनिक शहर के दावों के बीच यहां सार्वजनिक परिवहन सीमित और असंतुलित दिखाई देता है। शहर के कई इलाकों में आज भी नियमित और सुविधाजनक बस सेवा उपलब्ध नहीं है। जयपुर मेट्रो का दायरा बेहद छोटा है और वह शहर की वास्तविक जरूरतों को पूरा करने में सक्षम नहीं दिखती। नतीजा यह है कि लाखों लोग रोजाना निजी वाहन लेकर सड़कों पर उतरते हैं और पूरा शहर जाम की गिरफ्त में आ जाता है। असल में सार्वजनिक परिवहन को अभी भी प्राथमिकता के बजाय औपचारिकता की तरह देखा जा रहा है। सरकारें सड़कें चौड़ी करने और फ्लाईओवर बनाने पर तो ध्यान देती हैं, लेकिन मजबूत बस नेटवर्क, मेट्रो विस्तार और आधुनिक शहरी परिवहन प्रणाली पर अपेक्षित निवेश नहीं हो पाता। जबकि दुनिया के विकसित शहरों ने यह साबित किया है कि केवल सड़कें बढ़ाने से ट्रैफिक की समस्या खत्म नहीं होती, बल्कि मजबूत सार्वजनिक परिवहन ही इसका स्थायी समाधान है। कमजोर सार्वजनिक परिवहन का असर केवल यातायात तक सीमित नहीं रहता। इससे ईंधन की खपत बढ़ती है, प्रदूषण बढ़ता है और आम आदमी की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। विद्यार्थी, कर्मचारी, महिलाएं और बुजुर्ग सबसे ज्यादा परेशान होते हैं। कई लोग रोजाना घंटों सफर में बर्बाद कर देते हैं, जिससे उनकी कार्यक्षमता और जीवन की गुणवत्ता दोनों प्रभावित होती हैं। जरूरत इस बात की है कि राजस्थान के बड़े शहरों के लिए दीर्घकालिक और व्यावहारिक परिवहन नीति बनाई जाए। बस सेवाओं का विस्तार, इलेक्ट्रिक बसों की संख्या बढ़ाना, मेट्रो परियोजनाओं को गति देना, पार्किंग और ट्रैफिक प्रबंधन को व्यवस्थित करना अब समय की मांग है। सार्वजनिक परिवहन को मजबूत किए बिना आधुनिक शहरों का सपना अधूरा ही रहेगा।



