Manipur Violence: मणिपुर में हिंसा अब भी थम नहीं पा रही। तमाम इंतजाम बेकार साबित हो रहे हैं। बुधवार को भी नागा और कुकी समुदाय के बीच सुलह की कोशिश में लगे तीन पादरियों की हत्या कर दी गई। उसके बाद का आक्रोश सड़कों पर दिखा। मणिपुर पिछले लगभग तीन वर्षों से हिंसा, तनाव और अविश्वास की आग में झुलस रहा है। मई 2023 में शुरू हुई जातीय हिंसा ने जिस तरह पूरे राज्य को अपनी चपेट में लिया, उसके घाव आज भी नहीं भर पाए हैं। हजारों लोग बेघर हुए, सैकड़ों की जान गई और समाज दो हिस्सों में बंटता चला गया। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इतने लंबे समय बाद भी सरकार हालात पूरी तरह सामान्य नहीं कर पाई हैं। इस हिंसा की जड़ में मुख्य रूप से मैतेई और कुकी समुदायों के बीच का विवाद है। मैतेई समुदाय लंबे समय से अनुसूचित जनजाति का दर्जा मांग रहा था, जबकि कुकी समुदाय इसका विरोध कर रहा था। कुकी समाज को डर था कि यदि मैतेई समुदाय को भी एसटी का दर्जा मिल गया तो उनकी जमीन, संसाधनों और अधिकारों पर दबाव बढ़ जाएगा। इसी मुद्दे ने धीरे-धीरे बड़े सामाजिक टकराव का रूप ले लिया। मई 2023 में हाईकोर्ट की एक टिप्पणी के बाद यह विवाद अचानक हिंसक हो गया। देखते ही देखते प्रदर्शन आगजनी, गोलीबारी और हत्या तक पहुंच गए। गांव के गांव खाली हो गए और लोगों को राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी। इंटरनेट बंद करना पड़ा, सेना और अर्धसैनिक बल तैनात करने पड़े, लेकिन हालात पूरी तरह काबू में नहीं आ सके।
दुर्भाग्य यह है कि यह विवाद केवल दो समुदायों की लड़ाई बनकर नहीं रह गया। अब इसमें राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप, प्रशासनिक विफलता और अलगाव की भावना भी जुड़ चुकी है। लोगों का भरोसा टूट रहा है और हर नई घटना पुराने जख्म फिर हरे कर देती है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इतने समय बाद भी समाधान क्यों नहीं निकल पा रहा? इसका कारण यह है कि सरकारें केवल कानून-व्यवस्था संभालने तक सीमित दिखाई दीं, जबकि जरूरत सामाजिक संवाद और भरोसा बहाल करने की थी। किसी भी राज्य में शांति केवल बंदूक और सुरक्षा बलों से कायम नहीं होती, उसके लिए निष्पक्ष राजनीति और संवेदनशील नेतृत्व भी जरूरी होता है। बुधवार को भी लगभग यही हुआ, नागा और कुकी समुदाय के बीच सुलह कराने की कोशिश में लगे तीन पादरियों की गोली मारकर हत्या कर दी गई। आखिर सरकार कर क्या रही है? मणिपुर में नई सरकार बनने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि लंबे समय से चली आ रही हिंसा, अविश्वास और अस्थिरता पर अब विराम लगेगा। लेकिन हालात बता रहे हैं कि सत्ता परिवर्तन से ज़मीनी बदलाव अपने आप नहीं आते। आज भी वहां तनाव, डर और असुरक्षा का माहौल बना हुआ है। आम नागरिक राहत की सांस लेने के बजाय अब भी भय के साये में जीने को मजबूर हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर सरकार बनने के बाद भी हालात सामान्य क्यों नहीं हो पा रहे? इसका जवाब केवल प्रशासनिक कमजोरी में नहीं, बल्कि उस राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी में भी छिपा है जो ऐसे संवेदनशील मामलों में सबसे ज्यादा जरूरी होती है। मणिपुर की समस्या केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं रह गई, यह अब सामाजिक विभाजन, जातीय अविश्वास और राजनीतिक असफलता का प्रतीक बन चुकी है। लगातार हिंसा और टकराव ने वहां की शिक्षा, व्यापार और सामान्य जनजीवन को पूरी तरह प्रभावित किया है। हजारों लोग अब भी राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं। बच्चों की पढ़ाई बाधित है, रोजगार प्रभावित हैं और लोगों का भरोसा सरकार तथा व्यवस्था दोनों से टूटता जा रहा है। दुखद यह है कि हर नई घटना के बाद केवल बयानबाजी होती है, लेकिन स्थायी समाधान की दिशा में ठोस प्रयास नजर नहीं आते। सरकार को यह समझना होगा कि केवल सुरक्षा बल बढ़ा देने या इंटरनेट बंद कर देने से शांति स्थापित नहीं होती। असली जरूरत संवाद, विश्वास बहाली और निष्पक्ष कार्रवाई की है। जब तक सभी समुदायों को साथ लेकर आगे बढ़ने की कोशिश नहीं होगी, तब तक शांति केवल कागजों में ही दिखाई देगी। केंद्र और राज्य दोनों सरकारों की जिम्मेदारी है कि मणिपुर को राजनीतिक प्रयोगशाला नहीं, बल्कि देश के एक संवेदनशील राज्य के रूप में देखें। वहां के लोगों को सिर्फ आश्वासन नहीं, सुरक्षित और सामान्य जीवन चाहिए। यदि सरकार बनने के बाद भी स्थिति में सुधार नहीं आता, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि लोकतांत्रिक उम्मीदों की भी हार मानी जाएगी। सरकार को सोचना चाहिए कि भारत के ही मणिपुर को अलग-थलग सा क्यों कर दिया गया है? देश में कहीं हिंसा और आमजन डर में जिए तो फिर सरकार बनने या न बनने में फर्क ही क्या है?



