एक दिन में हुई दो घटनाएं यह बताने के लिए काफी हैं कि कानून का डर खत्म होता जा रहा है। रेत/ बजरी माफिया के खिलाफ समय-समय पर होने वाले आंदोलन चंद दिन चलते हैं। सरकार आश्वासन देती है या फिर माफिया से गठजोड़ के बाद यह खत्म हो जाता है, भगवान जाने। यह जरूरत समय-समय पर होता है, बीच-बीच में बंद क्यों हो जाता है, इस रहस्य को कोई नहीं समझ पाता। मजे की बात है कि रेत/ बजरी ही नहीं कभी शराब माफिया तो कभी परिवहन माफिया के खिलाफ आंदोलन चलाया जाता है जो केवल दिखावटी साबित होते हैं। छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में रेत खनन और परिवहन को लेकर दो गुटों में जारी विवाद के चलते भाजपा नेता सहित तीन जनों को कार में जिंदा जला दिया गया। वहीं मध्यप्रदेश के शहडोल में रेत माफिया ने डीएफओ की गाड़ी पर हमला कर दिया। ऐसा नहीं है कि राजस्थान में ऐसी वारदात नहीं होती, बजरी माफिया हो या शराब माफिया, इनकी गुण्डागर्दी के सामने प्रशासन का रौब खत्म होता जा रहा है।
राजस्थान में कभी टोल बंद करवा देंगे तो कभी अवैध खनन बंद कर बजरी माफिया की दादागिरी खत्म कर देंगे तो कभी शराब माफिया के अवैध कारोबार को ठिकाने लगाने की बात कही जाती है। इसको लेकर आंदोलन तक होते हैं। धरना-प्रदर्शन के साथ चक्का जाम होता है, कुछ दिनों बाद एक्शन तो कुछ नहीं होता, आंदोलन बंद हो जाता है। समय-समय पर बजरी और शराब नीति को लेकर सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। कई बार अनशन और आंदोलन भी हुए, लेकिन उनके स्थायी परिणाम क्या निकले, यह भी जनता जानना चाहती है। सवाल केवल किसी एक नेता या दल का नहीं है। लगभग सभी राजनीतिक दलों में यह प्रवृत्ति देखने को मिलती है कि मुद्दे तब तक गर्म रहते हैं, जब तक उनसे राजनीतिक फायदा मिलता है। समझौते होते हैं, आश्वासन दिए जाते हैं और आंदोलन धीरे-धीरे ठंडे पड़ जाते हैं। लेकिन माफिया तंत्र और अवैध कारोबार खत्म नहीं होते, बल्कि फिर किसी नई घटना के बाद वही मुद्दा दोबारा सामने आ जाता है।
आंदोलन केवल मीडिया में छाए रहने तक सीमित रह जाएं, तो जनता का विश्वास कमजोर होता है। जनता को यह पूछने का अधिकार है कि जिन मुद्दों पर उन्होंने संघर्ष शुरू किया था, उनका निष्कर्ष क्या निकला? कितने दोषियों पर कार्रवाई हुई? और जिन वादों के नाम पर समर्थन मांगा गया था, उनका क्या हुआ? सरकार अभियान चलाती है पर कुछ दिन बाद सबकुछ वही सब शुरू हो जाता है। जरूरत केवल समय-समय पर अभियान चलाने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है, जिसमें अवैध कारोबार करने वालों को राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण न मिले, दोषियों को त्वरित सजा मिले और अधिकारियों की जवाबदेही भी तय हो। साथ ही समाज को भी यह समझना होगा कि अवैध खनन, शराब तस्करी या अन्य गैरकानूनी गतिविधियां केवल सरकारी राजस्व का नुकसान नहीं करतीं, बल्कि कानून व्यवस्था, पर्यावरण और सामाजिक व्यवस्था को भी प्रभावित करती हैं। उन नेताओं को भी समझना होगा जो बार-बार इन मुद्दों को लेकर जनता के सामने तो आते हैं पर बीच में ही आंदोलन खत्म कर देते हैं। जब तक कानून का भय, राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक जवाबदेही एक साथ दिखाई नहीं देंगे, तब तक माफियाओं पर पूरी तरह लगाम लगाना मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव जैसा बना रहेगा। जनता अब अभियानों से ज्यादा परिणाम देखना चाहती है। जनता यह भी समझती जा रही है कि बार-बार इन्हीं मुद्दों को आंदोलन का आधार नहीं बनाया जा सकता। बिना परिणाम के आंदोलन को बंद कर देना भी कई लोगों पर से भरोसे को कम कर रहा है। बात मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ या राजस्थान की ही नहीं है, पूरे देश में माफियाओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की आवश्यकता है।



