एसएमएस अस्पताल से दवा चुराकर बेचने वाले संविदा फार्मासिस्ट व दलाल गिरफ्तार किए गए। दस हजार की दवा मात्र पंद्रह सौ रुपए में बेची थी। दवा चोरी का यह पहला मामला नहीं है, पहले भी कई बार ऐसा हुआ पर मामले दबा दिए गए। राजस्थान का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल एसएमएस लाखों लोगों के भरोसे का केंद्र है। यहां हर दिन प्रदेश के दूर-दराज के इलाकों से मरीज इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि समय-समय पर सामने आने वाली अव्यवस्थाएं इस भरोसे को कमजोर करती रही हैं। कभी दवाओं की कमी, कभी लंबी कतारें, कभी दलालों की सक्रियता और अब दवा चोरी जैसे मामले यह सवाल खड़ा करते हैं कि आखिर इतनी बड़ी स्वास्थ्य संस्था में व्यवस्थाएं पूरी तरह पटरी पर कब आएंगी?
हाल में सामने आए दवा चोरी के मामले ने साबित कर दिया है कि समस्या केवल संसाधनों की नहीं, बल्कि निगरानी और जवाबदेही की भी है। इससे पहले भी कई बार दवाओं के गायब होने, मरीजों की परेशानियों, जांचों में देरी और सुविधाओं की कमी की शिकायतें सामने आती रही हैं। हर घटना के बाद जांच और सुधार के दावे किए जाते हैं, लेकिन कुछ समय बाद फिर कोई नई अव्यवस्था सामने आ जाती है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सुधार केवल कागजों तक सीमित रह गए हैं?
इसका तो जिक्र तब हो रहा है जब मामला पकड़ा गया। ऐसे में प्रदेश के अन्य सरकारी अस्पताल-सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र या फिर पीएचसी में सरकार की ओर से भेजी जा रही दवा मरीजों को सही ढंग से मुफ्त मिल पाना भी संदिग्ध ही लग रहा है। सबसे बड़े सरकारी अस्पताल एसएमएस में दवाओं की चोरी और उनके अवैध कारोबार का खुलासा केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है। जिन दवाओं और इंजेक्शनों को गरीब और जरूरतमंद मरीजों के उपचार के लिए खरीदा जाता है, यदि वही चोरी होकर दलालों के जरिए बाजार में पहुंचने लगें तो इसका सबसे बड़ा खामियाजा मरीजों को ही भुगतना पड़ता है। चिंता की बात यह है कि यह पहला मामला नहीं है। पहले भी दवाओं के गायब होने और अनियमितताओं की शिकायतें सामने आती रही हैं। इससे साफ है कि कहीं न कहीं निगरानी व्यवस्था में खामियां हैं और कुछ लोग मरीजों के हक पर डाका डालकर अपना फायदा देख रहे हैं।
सरकार हर वर्ष स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी राशि खर्च करती है, ताकि आम आदमी को मुफ्त और सस्ता इलाज मिल सके। लेकिन जब मरीजों के लिए खरीदी गई दवाएं चोरी होने लगें तो सरकारी योजनाओं का उद्देश्य ही प्रभावित होता है। मरीजों को मजबूर होकर बाहर से महंगी दवाएं खरीदनी पड़ती हैं, जिससे आर्थिक बोझ बढ़ता है और सरकारी अस्पतालों के प्रति भरोसा भी कमजोर पड़ता है। जरूरत इस बात की है कि दवा भंडारण और वितरण प्रणाली को पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी बनाया जाए। प्रत्येक दवा की खरीद से लेकर मरीज तक पहुंचने की प्रक्रिया की ऑनलाइन ट्रैकिंग हो, सीसीटीवी निगरानी मजबूत की जाए और दोषियों के खिलाफ त्वरित तथा कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। केवल निलंबन या विभागीय जांच से काम नहीं चलेगा। यदि बार-बार ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं तो जिम्मेदारी तय करने की भी आवश्यकता है। स्वास्थ्य सेवाओं में जनता का विश्वास सबसे बड़ी पूंजी है। यदि मरीजों को यह लगने लगे कि उनके लिए आई दवाएं ही सुरक्षित नहीं हैं, तो सरकारी व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होगा। इसलिए यह मामला केवल चोरी का नहीं, बल्कि व्यवस्था की विश्वसनीयता बचाने का है। सरकार और प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि मरीजों के हिस्से की दवाओं पर किसी की नजर न पड़े और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति पर स्थायी रोक लगे।



