शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के बीच अव्यवस्था फैलाने की साजिश किसकी

    शहीद स्मारक, जयपुर में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके पर हुए हमले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। NEET पेपर लीक और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर चल रहे शांतिपूर्ण आंदोलन के दौरान हुई यह घटना केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार पर भी सवाल उठाती है।

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    CJP Protest Abhijeet Dipke Slapped: राजधानी जयपुर में सोमवार को कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी ) के प्रदर्शन के दौरान संस्थापक अभिजीत दिपके के साथ कुछ युवकों ने मारपीट कर दी। पुलिस ने कुछ गिरफ्तारियां भी की। घटना शहीद स्मारक की है, जहां बड़ी संख्या में युवा नीट पेपर लीक और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए थे। ये केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे थे। वैसे सीजेपी यह आंदोलन पूरे देश में चला रही है। प्रदर्शन स्थल पर अपने समर्थकों के कंधों पर जा रहे अभिजीत के साथ मारपीट हुई। बाद में हमलावरों को भी अभिजीत के समर्थकों ने जमकर धुन दिया। युवाओं के हितों की मांग पर हो रहे शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बीच आखिर दिपके पर हमला क्यों किया गया? वैसे सीजेपी के दिल्ली समेत अन्य जगह पर हुए प्रदर्शन के दौरान भी आंदोलन के बीच अव्यवस्था फैलाने की कोशिश की गई। कोई इसे ‘स्क्रिप्टेड’ बता रहा है तो कोई राजनीतिक साजिश। अब जितने मुंह उतनी बातें, किसे क्या कहा जाए? हमलावर वायरल वीडियो में खुद को राष्ट्रभक्त बता रहे हैं, उनका आरोप यह भी है कि सीजेपी का आंदोलन अपनी राह से भटक गया।

    अब मारपीट के आरोपियों की गिरफ्तारी हुई है तो पूछताछ-जांच की बात भी कही जा रही है। अभिजीत की आरोपियों से कोई पुरानी दुश्मनी नहीं थी, यह तो साफ हो गया। सीजेपी का फिलहाल कोई राजनीतिक ‘रोल’ भी सामने नहीं आया है। ऐसे में बिना किसी ‘ठोस’ साजिश के इस हमले की साजिश किसने रची? आंदोलन में गड़बड़ी करने के पीछे साजिश किसने रची? युवाओं के लिए किए जा रहे आंदोलन से इन आरोपियों को क्या तकलीफ थी जो उन्होंने ऐसा किया? इन सवालों के जवाब भी तलाशने होंगे। जाहिर सी बात है कि अभिजीत इन आरोपियों का तो कुछ नहीं बिगाड़ रहा था। सीजेपी के हर प्रदर्शन के बीच ‘व्यवधान’ किसके कहने से किए जा रहे हैं।

    वैसे इस तरह के मामले पहले भी हुए। बड़े नेता भी इसके शिकार हुए, कभी किसी पर स्याही फेंकी गई तो कभी अन्य तरीकों से भी हमला किया गया। हाल ही में पश्चिम बंगाल में सांसद अभिषेक बनर्जी को पब्लिक ने पीटा तो आम आदमी पार्टी के एक विधायक से भी जनता ने दुर्व्यवहार किया। राजनीति के इतिहास को खंगालें तो पता चलेगा कि कई जनप्रतिनिधि थप्पड़ का शिकार हुए तो किसी को पब्लिक ने क्षेत्र से दौड़ा दिया। सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसे अधिकांश मामलों में यह सब करने वालों का कुछ ज्यादा नहीं बिगड़ा। नेता से निजी नाराजगी के चलते यह सब करने की बात कही गई। ऐसे में जब अभिजीत दिपके एक अच्छा मिशन लेकर चल रहा है तो उसका विरोध क्यों, इस विरोध से फायदा किनको होगा और ये करने वाले ऐसा किसके इशारे पर कर रहे हैं, पुलिस को इन सवालों के जवाब तलाशने चाहिएं।

    लोकतंत्र में किसी भी व्यक्ति, संगठन या राजनीतिक समूह से असहमति होना स्वाभाविक है। लेकिन असहमति का जवाब हिंसा नहीं हो सकता। कोई भी प्रदर्शन कानून के दायरे में शांतिपूर्ण तरीके से किया जा रहा है, तो उसका जवाब बहस, तर्क और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से दिया जाना चाहिए। मारपीट केवल यह संदेश देती है कि विरोध की आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है। ऐसे में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होगी, तो सरकार के सिस्टम पर भी तो सवाल उठाए जाएंगे। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल स्तंभ हैं। किसी एक विचारधारा या दल के समर्थकों के लिए नहीं, बल्कि सभी नागरिकों के लिए इन अधिकारों की रक्षा आवश्यक है। साथ ही, यह भी उतना ही ज़रूरी है कि प्रदर्शनकारी और उनके समर्थक कानून-व्यवस्था बनाए रखें तथा किसी उकसावे का जवाब हिंसा से न दें। कमाल की बात यह भी कि घटना के बाद भी दिपके ने समर्थकों से शांत रहने और आंदोलन जारी रखने की अपील की। इससे सीखा जा सकता है कि विरोध बेवजह किया जाना निरर्थक है। आप सहमत नहीं हैं तो भी मारपीट की क्या जरूरत?

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