विश्व रक्तदाता दिवस रविवार को मनाया गया। अनेक आयोजन हुए, रक्तदाताओं का खूब सम्मान किया गया। रक्तदान को सबसे बड़ी सेवा माना जाता है। एक व्यक्ति का दिया गया रक्त किसी गंभीर मरीज, दुर्घटना पीड़ित या प्रसव जटिलताओं से जूझ रही महिला की जान बचाता है। रक्तदान महादान है, यह सीधे जीवन रक्षा से जुड़ा है। अलग-अलग संगठनों की ओर से रक्तदान शिविर आयोजित किए जाते हैं, रक्तदान करने में युवा भी हमेशा आगे रहते हैं। यह भी सब जानते हैं कि अधिकांश मामलों में रक्त के बदले रक्त देना पड़ता है। कई बार ऐसे केस सामने आते हैं, जब मरीज के पास इक्का-दुक्का परिजन होते हैं। बाहर से आए इन लोगों के पास यहां कोई ऐसा जानकार नहीं होता, जिससे रक्त दिलवाया जा सके। अन्य कारणों से खुद रक्तदान नहीं करते। ऐसे में मरीज के लिए आवश्यक रक्त की व्यवस्था करना मुश्किल हो जाता है।
पहले ही मरीज की सार-संभाल की बड़ी जिम्मेदारी और फिर ब्लड का इंतजाम, उन्हें यह भी नहीं पता होता कि ऐसी स्थिति में क्या किया जाए? अक्सर यह भी देखा गया है कि संबंधित डॉक्टर्स ही नहीं अस्पताल कार्मिक तक उन्हें ब्लड की व्यवस्था के लिए किसी को लाने की कह देते हैं। गंभीर बीमारियों में तो ब्लड वैसे भी अस्पताल की ओर से दे दिया जाता है पर अन्य मामलों में इसकी परेशानी बड़ी हो जाती है। ऐसे में यह आवश्यक है कि संकट की घड़ी में किसी भी मरीज या उसके परिजनों को रक्त के लिए इधर-उधर भटकना या टरकाया न जाए। वास्तविकता यह है कि कई बार अस्पतालों और रक्त बैंकों में आवश्यक रक्त उपलब्ध होने के बावजूद प्रक्रिया की जटिलता, औपचारिकताओं या समन्वय की कमी के कारण मरीजों को देरी का सामना करना पड़ता है। यह कई बार जानलेवा साबित होती है। इसलिए स्वास्थ्य व्यवस्था का सबसे मानवीय और जरूरी पक्ष यही है कि रक्त के इंतजाम की प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाया जाए।
सरकारी और निजी अस्पतालों में एक मजबूत और संगठित रक्त बैंक नेटवर्क होना चाहिए, जो हमेशा सक्रिय रहे। हर रक्त बैंक का अन्य अस्पतालों से सीधा समन्वय होना जरूरी है ताकि किसी एक स्थान पर रक्त की कमी होने पर तुरंत दूसरे स्थान से उपलब्ध कराया जा सके। आधुनिक तकनीक और डिजिटल सिस्टम के माध्यम से रक्त समूह, उपलब्धता और वितरण की जानकारी रीयल-टाइम में मिलनी चाहिए। इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी भी मरीज को केवल प्रक्रिया या दस्तावेजी औपचारिकताओं के कारण टाला न जाए। आपातकालीन स्थिति में ‘पहले जीवन, बाद में औपचारिकता’ का सिद्धांत अपनाना चाहिए। मानवीय दृष्टिकोण को प्राथमिकता देना स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
रक्तदान करने वाले स्वयंसेवकों का मजबूत नेटवर्क भी इस व्यवस्था की रीढ़ है। यदि नियमित रक्तदाताओं का पंजीकरण, संपर्क और त्वरित बुलावे की प्रणाली विकसित की जाए, तो आपात स्थिति में रक्त की कमी की समस्या काफी हद तक कम हो सकती है। साथ ही, समाज में यह संदेश भी फैलाना जरूरी है कि रक्तदान सुरक्षित, सरल और जीवन रक्षक प्रक्रिया है। इससे अधिक लोग स्वेच्छा से आगे आएंगे और रक्त की उपलब्धता स्थिर बनी रहेगी। किसी भी मरीज को रक्त के लिए भटकना मानवता के सिद्धांतों के खिलाफ है। एक सशक्त स्वास्थ्य प्रणाली वही है जिसमें रक्त की उपलब्धता तुरंत और बिना भेदभाव के सुनिश्चित हो। यही सच्चे अर्थों में जीवन रक्षा और समाज सेवा का सर्वोच्च रूप है।



