नई दिल्ली। हादसों से कुछ भी नहीं सीखने का तो मानों संकल्प ही उठा लिया है। अब लखनऊ के अलीगंज में दो मंजिला कमर्शियल बिल्डिंग में भीषण आग लगने से तीन महिलाओं समेत पंद्रह लोगों की मौत हो गई। चंद दिनों पहले दिल्ली के एक होटल में लगी आग में एक दर्जन विदेशी पर्यटकों समेत 21 लोगों की मौत हो गई थी। राजस्थान में अवैध पटाखा गोदाम तो समय-समय पर ‘फटते’ ही रहते हैं। कभी दफ्तर कभी फैक्ट्री तो कभी मण्डी में आग लग जाती है, कई लोगों की जानें चली जाती हैं। हादसे की जांच के लिए कमेटी गठित होती है पर सुधार कुछ नहीं होता। लापरवाही को छिपा दिया जाता है। कार्रवाई उनके खिलाफ होती ही नहीं जो हादसे के जिम्मेदार होते हैं। कहीं आग बुझाने के उपकरण नहीं हैं तो कहीं बिल्डिंग ही गैरकानूनी तरीके से बना दी गई। सरकार का सिस्टम हल्ला तो मचाता है पर उससे होता-जाता कुछ नहीं। यह भी सच है कि ऐसे हादसों के जिम्मेदार काफी कुछ तो वो ही होते हैं जिनकी इमारत में यह घटित होता है।
देश में आग लगने की घटनाएं अब सामान्य हो गई हैं, लेकिन हर हादसे के पीछे छिपी चीखें, उजड़े परिवार और बिखरे सपने यह याद दिलाते हैं कि यह महज दुर्घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था की गंभीर विफलता है। हाल के वर्षों में अस्पतालों, होटलों, फैक्ट्रियों, कोचिंग संस्थानों और रिहायशी इलाकों में लगी आग ने सैकड़ों लोगों की जान ली है, पर अफसोस यह है कि हर त्रासदी के बाद कुछ दिनों का शोर मचता है और फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। पेट्रोल पंप, अस्पताल, होटल, फैक्ट्रियां, कोचिंग सेंटर और व्यावसायिक प्रतिष्ठान—लगभग हर जगह अग्नि सुरक्षा के नियम तो बनाए गए हैं, लेकिन उनका पालन कितनी गंभीरता से हो रहा है, यह हर बड़ी दुर्घटना के बाद सामने आ जाता है। दफ्तरों की बनावट और सिस्टम ऐसा होता है कि वहां प्रवेश कर लिया तो निकलना आसान नहीं होता। थंब इंप्रेशन सिस्टम के चलते अधिकांश जगह निकलने का कोई दूसरा रास्ता तक नहीं होता। कांच से पूरी तरह घिर बिल्डिंग में निकलने की दूसरी राह नहीं होने से ऐसे हादसों में लोगों की मौत ज्यादा हो जाती है।
पेट्रोल पंप जैसे संवेदनशील स्थानों पर अग्निशमन यंत्र, आपातकालीन व्यवस्था, नियमित मॉक ड्रिल और कर्मचारियों का प्रशिक्षण अनिवार्य माना जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि कई जगह सुरक्षा उपकरण केवल दिखावे के लिए लगे होते हैं। समय पर उनकी जांच नहीं होती और न ही कर्मचारियों को आपात स्थिति से निपटने का समुचित प्रशिक्षण दिया जाता है। यही स्थिति कई निजी अस्पतालों, होटलों, मॉल और फैक्ट्रियों की भी है, जहां फायर एनओसी तो ली जाती है, लेकिन बाद में सुरक्षा मानकों को ताक पर रख दिया जाता है। विडंबना यह है कि प्रशासन और संबंधित विभागों की सक्रियता भी अक्सर किसी हादसे के बाद ही दिखाई देती है। कुछ दिनों तक जांच अभियान चलते हैं, नोटिस जारी होते हैं और फिर सब कुछ पुराने ढर्रे पर लौट आता है। यदि नियमित निरीक्षण और सख्त कार्रवाई होती रहे तो अनेक दुर्घटनाओं को टाला जा सकता है।
आग लगने की घटनाओं में केवल लापरवाह संस्थानों की ही नहीं, बल्कि निगरानी करने वाले विभागों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। फायर सेफ्टी को कागजी खानापूर्ति नहीं बल्कि जीवन रक्षा का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम माना जाना चाहिए। तकनीक के इस दौर में ऐसे उपकरण और व्यवस्थाएं उपलब्ध हैं, जिनसे आग लगने की आशंका को काफी हद तक कम किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए इच्छाशक्ति और जवाबदेही दोनों जरूरी हैं। देश को हर हादसे के बाद शोक और मुआवजे की राजनीति से आगे बढ़ना होगा। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है, जहां सुरक्षा नियमों का पालन न करने वालों के खिलाफ सख्त दंड हो और निरीक्षण करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय की जाए। क्योंकि जब तक सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं मिलेगी, तब तक आग की लपटें लोगों की जिंदगी और सपनों को निगलती रहेंगी।



