कभी-कभार की जाग से सुधार नहीं होने वाला

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    अपने यहां जर्जर मकान गिरने से लोग दब जाते हैं, जिम्मेदार जागते हैं तो ऐसे मकानों की लिस्ट बनती है। कुछ दिन तक शोर सा मचा रहता है, लगता है कि प्रशासन सक्रिय है पर फिर सबकुछ पहले जैसा हो जाता है। आग के किसी बड़े हादसे पर जाग होती है, दो-चार दिन एक्शन लेते जिम्मेदार नजर आते हैं, बाद में फिर सबकुछ वैसा ही रहने दिया जाता है। ऐसा ही सड़क हादसे पर होता है, अस्पताल में किसी चिकित्सक की लारवाही से मौत के मामलों में होता है। स्कूल-कॉलेज की मनमानी हो या फिर बढ़ती आपराधिक वारदात। हर बार ऐसा ही होता है, सरकार अलर्ट मोड में आ जाती है। फिर सबकुछ वही ढाक के तीन पात…। नियम-कायदे फिर ताक पर रख दिए जाते हैं, दोबारा कुछ होने के इंतजार में।

    प्रशासन की सख्ती असल में कुछ दिन या घंटों की होती है। जनता को संतुष्ट करने या फिर बहलाने के लिए। जब भी कोई बड़ा हादसा होता है, प्रशासनिक मशीनरी अचानक पूरी तरह सक्रिय दिखाई देने लगती है। जांच समितियां बनती हैं, छापेमारी होती है, नियमों की समीक्षा की जाती है और जिम्मेदार अधिकारियों को सख्ती के निर्देश दिए जाते हैं। लेकिन जैसे-जैसे घटना की चर्चा कम होती है, वैसे-वैसे प्रशासन की सक्रियता भी ठंडी पड़ जाती है और कुछ समय बाद हालात फिर पहले जैसे हो जाते हैं। यही कारण है कि आग लगने की घटनाएं हों, अवैध फैक्ट्रियां हों, सड़क हादसे हों या भवनों में सुरक्षा मानकों की अनदेखी, समस्याएं बार-बार सामने आती रहती हैं।

    अब लखनऊ में हादसा हुआ, आग की लपटें जयपुर तक पहुंच गई। राजस्थान के कोचिंग-संस्थानों पर एक्शन लिया गया, कुछ को सील किया भी गया। कोचिंग संस्थानों की संख्या लगातार बढ़ रही है। हजारों विद्यार्थियों का भविष्य इन संस्थानों से जुड़ा है, इसलिए उनकी सुरक्षा, भवनों की वैधता, अग्निशमन व्यवस्था और अन्य मानकों का पालन सुनिश्चित करना प्रशासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। हाल के दिनों में नियमों के उल्लंघन पर कई कोचिंग संस्थानों पर कार्रवाई हुई, कुछ को सील भी किया गया। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह कार्रवाई किसी शिकायत, हादसे या दबाव के बाद ही क्यों होती है? नियमित जांच और निगरानी का तंत्र पहले से सक्रिय क्यों नहीं रहता? यदि किसी कोचिंग संस्थान में अग्निशमन उपकरण नहीं हैं, भवन स्वीकृति में खामियां हैं या सुरक्षा मानकों का पालन नहीं हो रहा, तो यह स्थिति एक दिन में पैदा नहीं हुई होगी। ऐसे मामलों में केवल संस्थानों को दोषी ठहराकर जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती। यह भी देखना होगा कि संबंधित विभाग, नगर निगम, जेडीए और अन्य एजेंसियां नियमित निरीक्षण में कितनी गंभीर रही हैं।

    अक्सर देखने में आता है कि किसी बड़े हादसे या जनदबाव के बाद अचानक व्यापक अभियान शुरू होते हैं, नोटिस दिए जाते हैं और कुछ दिनों तक सख्ती दिखाई देती है। लेकिन समय बीतने के साथ यह अभियान धीमा पड़ जाता है और फिर वही पुरानी स्थिति लौट आती है। सुरक्षा और नियमों की पालना कोई एक बार की कवायद नहीं, बल्कि सतत प्रक्रिया है। जरूरत इस बात की है कि कोचिंग संस्थानों की साल में एक या दो बार औपचारिक जांच भर न हो, बल्कि नियमित और आकस्मिक निरीक्षण की व्यवस्था बनाई जाए। सभी संस्थानों का डिजिटल रिकॉर्ड हो, अग्निशमन और भवन सुरक्षा प्रमाणपत्रों का समय-समय पर सत्यापन हो तथा नियमों के उल्लंघन पर बिना किसी भेदभाव के सख्त कार्रवाई की जाए। विद्यार्थियों की सुरक्षा और अभिभावकों का भरोसा केवल तब कायम रहेगा, जब प्रशासन की सक्रियता किसी हादसे या मीडिया की सुर्खियों पर निर्भर न होकर व्यवस्था का स्थायी हिस्सा बने।

    क्योंकि दुर्घटनाओं के बाद कार्रवाई करना आसान है, लेकिन उन्हें पहले ही रोक देना ही वास्तविक जिम्मेदारी और सुशासन की पहचान है। अचानक जागने से हादसे नहीं रुकने वाले। निरंतर जांच हों, कार्रवाई हो। अभी हाे यह रहा है कि अलग-अलग सर्टिफिकेट के लिए जांच नहीं होती, मांग पूरी कर दी जाती है। सुविधा शुल्क लेकर सुविधा देने की आदत जो पड़ गई है। ऐसे जिम्मेदारों पर भी कार्रवाई हो। विकास, सफाई, अतिक्रमण नियंत्रण, भवन निर्माण नियमों की पालना, जल निकासी, सड़क व्यवस्था और नागरिक सुविधाओं की जिम्मेदारी मुख्य रूप से नगर निगम और जेडीए पर है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये संस्थाएं अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन उसी गंभीरता से कर रही हैं, जिसकी अपेक्षा जनता करती है? इस पर भी एक्शन जरूरी है।

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