कठोर नियम, कड़ी सजा और निरंतर कार्रवाई से ही रुकेगी मिलावटखोरी

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    मिलावट पर लगाम लग नहीं पा रही। पूरे राजस्थान में एक जैसा हाल है, जैसलमेर के पोकरण में फिर नकली घी का कारखाना पकड़ा गया है। तेल-घी ही नहीं पनीर के साथ मसाले-मावा मिलावट पकड़े जाने की खबरें अब सामान्य सी लगने लगी हैं। ऐसा भी नहीं है कि मिलावट का धंधा अब शुरू हुआ है, यह बरसों से चल रहा है। कभी-कभार होने वाली चेकिंग के दौरान पकड़े जाने पर शोर ज्यादा मचता है, थमता कुछ नहीं। कार्रवाई के नाम पर बस सैंपल जांच के लिए भेज दिए जाते हैं, जिनकी रिपोर्ट आने में महीनों लग जाते हैं। मजे की बात यह भी है कि रिपोर्ट में मिलावट पाए जाने पर भी कार्रवाई के नाम पर मामूली जुर्माना होता है। ऐसे में अपने आप ही मिलावट के काले कारोबार करने वालों में डर होगा कहां से? जयपुर हो, जोधपुर हो, अजमेर हो, अलवर हो या धौलपुर—राजस्थान का शायद ही कोई शहर बचा हो जहां मिलावटखोरों का जाल न फैला हो। कभी हजारों लीटर नकली घी पकड़ा जाता है, कभी सैकड़ों किलो मिलावटी पनीर और मावा नष्ट किया जाता है, तो कभी खाद्य पदार्थों के बड़े ब्रांड जांच में फेल हो जाते हैं।

    लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने वाले मिलावटखोरों को भी पक्का यकीन हो गया है कि पकड़े जाने पर भी ज्यादा नुकसान नहीं होगा। यही कारण है कि मिलावट का कारोबार साल-दर-साल फैलता जा रहा है। घी, पनीर, मावा, मसाले, नमकीन और अन्य खाद्य पदार्थों में मिलावट के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। हाल ही में राज्य सरकार को 16 से अधिक खाद्य उत्पादों की बिक्री पर रोक लगाने और कई लाइसेंस निलंबित करने पड़े। समय-समय पर अभियान तो चलता है, मिलावटखोरों के खिलाफ कार्रवाई होती है, लेकिन कुछ समय बाद फिर वही धंधा शुरू हो जाता है। इससे साफ है कि मौजूदा कानून और दंड का डर मिलावटखोरों पर असर नहीं डाल पा रहा। मिलावट सीधे- सीधे लोगों के स्वास्थ्य और जीवन से जुड़ा अपराध है। नकली घी, रसायनों से तैयार पनीर या मिलावटी खाद्य पदार्थ बच्चों, बुजुर्गों और मरीजों के लिए गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं। ऐसे में यह केवल कानून तोड़ने का मामला नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ है। दरअसल, मिलावटखोरों को कानून का उतना भय नहीं है, जितना होना चाहिए। यदि कार्रवाई के बाद भी आरोपी आसानी से बच निकलते हैं और कुछ समय बाद फिर बाजार में सक्रिय हो जाते हैं, तो स्पष्ट है कि दंड व्यवस्था में कहीं न कहीं कमी है।

    लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने वालों को केवल आर्थिक अपराधी नहीं, बल्कि समाज के लिए खतरा मानकर कार्रवाई की जानी चाहिए। जरूरत इस बात की है कि मिलावट के मामलों में कानून और अधिक कठोर बनाए जाएं। दोषियों पर भारी जुर्माने के साथ लंबी जेल की सजा, कारोबार का लाइसेंस रद्द करने और संपत्ति जब्त करने जैसे प्रावधान प्रभावी ढंग से लागू किए जाएं। साथ ही ऐसे मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक अदालतों में हो ताकि वर्षों तक मुकदमे लंबित न रहें। लेकिन केवल कठोर कानून बना देने से भी काम नहीं चलेगा। सबसे महत्वपूर्ण है निरंतर कार्रवाई। अक्सर त्योहारों या विशेष अभियानों के दौरान ही जांच तेज होती है, जबकि मिलावट का धंधा पूरे साल चलता है। खाद्य सुरक्षा विभाग, स्थानीय प्रशासन और पुलिस को नियमित निरीक्षण, सैंपलिंग और निगरानी की व्यवस्था करनी होगी। हर जिले में लगातार अभियान चलें और कार्रवाई की समीक्षा भी हो।

    यह भी देखना होगा कि आखिर मिलावटी सामान बाजार तक पहुंच कैसे रहा है। उत्पादन से लेकर वितरण और बिक्री तक की पूरी श्रृंखला पर नजर रखनी होगी। यदि किसी क्षेत्र में बार-बार मिलावट के मामले सामने आ रहे हैं तो वहां संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। जनता की थाली में जहर परोसने वालों के खिलाफ अब आधे-अधूरे उपायों से काम नहीं चलेगा। जब तक कठोर नियम, कड़ी सजा और सालभर चलने वाली निरंतर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक मिलावटखोर नए नाम और नए ठिकानों से अपना धंधा जारी रखेंगे। सरकार को यह समझना होगा कि शुद्ध भोजन कोई सुविधा नहीं, बल्कि हर नागरिक का अधिकार है।

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