प्री मानसून की बारिश ने ही जयपुर के इंतजामों की पोल खोल दी। एक घंटे की तेज बारिश में कई इलाकों में जलभराव की समस्या देखने को मिली। करीब पचास शिकायतें तो जिला कलेक्ट्रेट के कंट्रोल रूम तक पहुंचीं। कहीं सड़क धंस गईं तो कहीं जलभराव ने लोगों को घंटों तक रोके रखा। सरकारी सिस्टम की लापरवाही सरेराह दिखी। पत्रकार कॉलोनी में डाली जा रही सीवरेज लाइन की गुणवत्ता भी सामने आई, जगह-जगह बारिश में मिट्टी ढहने से वाहन फंस गए। सीकर रोड, झोटवाड़ा ही नहीं परकोटे का हाल जरा सी बारिश ने बेहाल कर दिया। बारिश ने शहर की सड़कों को दरिया बना दिया, नाले उफान पर आ गए, कई कॉलोनियों में पानी घरों और दुकानों तक पहुंच गया और प्रमुख मार्गों पर घंटों तक यातायात ठप रहा। हर साल नालों की सफाई, सड़क मरम्मत और जल निकासी व्यवस्था पर करोड़ों खर्च किए जाते हैं, लेकिन पहली ही बारिश में पूरा सिस्टम पानी-पानी हो जाता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि प्री-मानसून की सीमित बारिश में यह हाल है तो जुलाई-अगस्त की भारी बरसात में जयपुर का क्या होगा? क्या हर वर्ष यही तस्वीर देखने के लिए जनता टैक्स देती रहेगी? नगर निगम, जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए), जलदाय विभाग और अन्य एजेंसियां मानसून से पहले तैयारियों के बड़े-बड़े दावे करती हैं, लेकिन जमीन पर उनकी तैयारी पहली बारिश में ही ध्वस्त नजर आती है।असल समस्या केवल नालों की सफाई नहीं, बल्कि पूरे शहरी सिस्टम की है। बरसों से प्राकृतिक जल निकासी मार्गों पर अतिक्रमण हुए, कई नालों को संकरा कर दिया गया, कहीं उन पर निर्माण हो गए तो कहीं कचरे और मलबे ने उनका अस्तित्व ही खत्म कर दिया। ऐसे में पानी जाएगा कहां? आलम यह होता है कि बारिश का पानी सड़कों, बाजारों और रिहायशी इलाकों में भर जाता है।
इसकी विफलता का एक और कारण विभिन्न विभागों के बीच समन्वय की कमी है। सड़क एक विभाग बनाता है, सीवर दूसरा बिछाता है, नाले तीसरा संभालता है और जल निकासी की जिम्मेदारी किसी और पर होती है। जब जवाबदेही बंट जाती है तो जिम्मेदार कोई नहीं बचता। बारिश के बाद अधिकारी मौके का निरीक्षण करते हैं, बैठकें होती हैं, जांच के आदेश दिए जाते हैं और कुछ दिनों बाद सब कुछ सामान्य मान लिया जाता है। अगले मानसून में फिर वही कहानी दोहराई जाती है। चिंता की बात यह भी है कि जलभराव केवल असुविधा नहीं, बल्कि जानलेवा भी बन सकता है। खुले मैनहोल, तेज बहाव, बिजली के करंट का खतरा, सड़क दुर्घटनाएं और जलजनित बीमारियां हर वर्ष लोगों की जान और स्वास्थ्य पर भारी पड़ती हैं। व्यापारियों को आर्थिक नुकसान होता है, विद्यार्थियों और कर्मचारियों को घंटों जाम में फंसना पड़ता है और आम नागरिक व्यवस्था की कीमत चुकाता है।
अब समय आ गया है कि सरकार हर वर्ष की अस्थायी कवायद छोड़कर दीर्घकालिक समाधान पर काम करे। शहर के पूरे ड्रेनेज सिस्टम का वैज्ञानिक सर्वे कराया जाए, जलभराव वाले स्थायी हॉटस्पॉट की पहचान कर उन्हें इंजीनियरिंग समाधान से ठीक किया जाए, अतिक्रमण हटाए जाएं और नालों की सफाई का थर्ड-पार्टी ऑडिट कराया जाए। जिन अधिकारियों और ठेकेदारों की लापरवाही सामने आए, उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई भी सुनिश्चित हो। जयपुर स्मार्ट सिटी बनने का दावा करता है, लेकिन स्मार्ट शहर की पहचान चमकदार सड़कों से नहीं, बल्कि ऐसी आधारभूत सुविधाओं से होती है जो बारिश के समय भी नागरिकों का जीवन सामान्य बनाए रखें। जब तक योजनाएं कागजों से निकलकर जमीन पर नहीं उतरेंगी और जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक हर मानसून में यही सवाल गूंजता रहेगा—जयपुर में जलभराव की समस्या को आखिर कब मिलेगी निजात?



