तबादलों की लिस्ट आने वाली है, सचिवालय से लेकर जिला मुख्यालय तक कर्मचारी इसकी प्रतीक्षा में है। अधिकांश विभागों में बड़े स्तर पर बदलाव होने की संभावना जताई जा रही है। तबादला कुछ के लिए आवश्यकता तो कुछ के लिए आराम की चाहत। यह भी सही है कि तबादलों का लाभ सभी को नहीं मिलता। तबादले स्थानीय विधायक की डिजायर पर होते हैं और इनमें बड़े नेता की सिफारिश को तरजीह देने की भी बात कही जाती है। तबादला सूची के बाद जो इसमें शामिल नहीं होते, वे भी कई तरह का आरोप लगाते हैं। तबादले सेटिंग से होते हैं, इस तरह की चर्चा भी अब आम हो चुकी है। स्थानांतरण होने पर संबंधित कर्मचारी हो या अफसर सबसे पहले वो कड़ी तलाशता है जो उसकी इच्छित जगह पर उसे भिजवा सके। हकीकत तो यह है कि बरसों बाद भी तबादले की रीति-नीति से कर्मचारी-अधिकारी संतुष्ट नहीं हैं।
हर सरकार सत्ता में आने के बाद पारदर्शी स्थानांतरण नीति का वादा करती है। कहा जाता है कि न्यूनतम कार्यकाल होगा, मेरिट और आवश्यकता के आधार पर तबादले होंगे, लेकिन जैसे ही तबादलों की प्रक्रिया शुरू होती है, नियमों से अधिक प्रभाव और पहुंच काम करने लगते हैं। विधायक, मंत्री और सत्तारूढ़ दल के नेताओं की अनुशंसाएं निर्णायक बन जाती हैं। ऐसे में नीति केवल कागज तक सीमित रह जाती है। यह भी सच है कि जनप्रतिनिधियों की भूमिका पूरी तरह नकारा नहीं जा सकती। वे अपने क्षेत्र की समस्याओं से परिचित होते हैं और कई बार किसी अधिकारी की कार्यशैली पर जनता की शिकायतें भी उनके पास पहुंचती हैं। लेकिन जब तबादलों का आधार केवल राजनीतिक निष्ठा या व्यक्तिगत समीकरण बन जाए, तब प्रशासन की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। राजनीतिक हस्तक्षेप का सबसे बड़ा नुकसान ईमानदार अधिकारियों और कर्मचारियों को उठाना पड़ता है। जो अधिकारी नियमों के अनुसार काम करता है, वह कई बार राजनीतिक दबाव न मानने की कीमत तबादले के रूप में चुकाता है। दूसरी ओर, प्रभावशाली लोगों की पसंद बनने वाले कर्मचारी वर्षों तक मनचाही जगहों पर जमे रहते हैं। इससे न केवल कार्य संस्कृति प्रभावित होती है, बल्कि जनता का विश्वास भी कमजोर पड़ता है।
यदि वास्तव में सुधार करना है तो सरकार को ऐसी स्थानांतरण नीति लागू करनी होगी जिसमें न्यूनतम कार्यकाल सुनिश्चित हो, प्रत्येक तबादले का कारण दर्ज किया जाए, ऑनलाइन और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई जाए तथा अपवादों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाए। राजनीतिक सुझाव हो सकते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय वस्तुनिष्ठ और नियम आधारित होना चाहिए। एक मजबूत स्थानांतरण नीति केवल कर्मचारियों के हित के लिए नहीं, बल्कि प्रशासन की विश्वसनीयता के लिए भी आवश्यक है। यदि किसी अधिकारी को यह भरोसा हो कि उसका तबादला केवल तय नियमों के आधार पर होगा, तो वह राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर निर्णय लेने का साहस भी रखेगा। वहीं जनता को भी यह विश्वास मिलेगा कि प्रशासनिक व्यवस्था निष्पक्ष है।
सरकार के सामने अब अवसर है कि हर वर्ष अस्थायी ट्रांसफर विंडो खोलने की परंपरा से आगे बढ़कर एक ऐसी स्थायी नीति लागू करे जो सभी विभागों में समान रूप से लागू हो, ऑनलाइन हो, कारण सहित हो और अपवादों को छोड़कर किसी भी स्तर पर मनमाने हस्तक्षेप की गुंजाइश न छोड़े। जब तक स्थानांतरण नीति कागजों से निकलकर जमीन पर नहीं उतरेगी, तब तक हर साल तबादलों का मौसम प्रशासनिक प्रक्रिया कम और राजनीतिक गतिविधि अधिक ही बना रहेगा। यही राजस्थान की स्थानांतरण व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना है। सबसे बड़ी बात यह भी है कि किसी के तबादले से काम प्रभावित न हो, इसका भी ध्यान रखा जाए।



