सरकारी स्कूलों की हालत सुधरती नहीं दिखती। प्लानिंग बनती है, बजट तैयार होकर खर्च भी हो जाता है पर सुधार के नाम पर कुछ नहीं दिखता। ग्रामीण इलाके तो छोड़िए शहर के स्कूलों का भी यही हाल है। बांसवाड़ा, बीकानेर और जयपुर में कहीं पटि्टयां गिरीं तो कहीं मलबा, वो तो अच्छा हुआ कि ग्रीष्मावकाश के चलते स्कूल बंद थे, कोई जनहानि नहीं हुई। अब हल्ला मचा है तो फिर जांच होगी, रिपोर्ट बनेगी और आवश्यक दिशा-निर्देश जारी होंगे, हालांकि उसके बाद भी कुछ हो इस पर भी संशय है। आंकड़े ही बता रहे हैं कि राज्य में साढ़े पांच हजार से अधिक स्कूल भवन पूरी तरह जर्जर हैं। हालत यह है कि अनगिनत स्कूलों में तो बच्चियों के लिए शौचालय तक नहीं हैं। झालावाड़ के पीपलोदी स्कूल हादसे में बच्चों की मौत के बाद पूरे राजस्थान को झकझोर देने वाली तस्वीर सामने आई थी।
उस समय सरकार ने जर्जर स्कूल भवनों का सर्वे कराने, असुरक्षित इमारतों को ध्वस्त करने, हजारों स्कूलों की मरम्मत कराने, दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई करने और भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए व्यापक अभियान चलाने का भरोसा दिलाया था। राज्यभर में स्कूल भवनों की सुरक्षा जांच और मरम्मत के लिए विशेष योजनाओं की भी घोषणा भी की गई थी पर हुआ क्या? ये वादे समय पर और पूरी गंभीरता से लागू हुए होते, तो क्या आज भी राजस्थान में जर्जर स्कूल भवन गिरने की खबरें सामने आतीं? जर्जर स्कूल भवनों की मरम्मत का उद्देश्य बच्चों को सुरक्षित वातावरण देना होता है, लेकिन यदि उसी मरम्मत में भ्रष्टाचार और घटिया निर्माण सामग्री का इस्तेमाल होने लगे तो यह केवल सरकारी धन की चोरी नहीं, बल्कि बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़ है।
राजस्थान में एक ओर स्कूल भवन गिरने की घटनाएं चिंता बढ़ा रही हैं, वहीं दूसरी ओर डीडवाना-कुचामन और नागौर समेत कई जगह स्कूलों की मरम्मत के कार्यों में अनियमितताओं और सामग्री की चोरी के मामले सामने आना बेहद गंभीर है। जिन भवनों को मजबूत बनाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, यदि उन्हीं कार्यों में सीमेंट, सरिया, निर्माण सामग्री और गुणवत्ता के साथ समझौता होगा तो हादसों को कौन रोकेगा? यह विडंबना है कि सरकार जर्जर स्कूलों के पुनर्निर्माण और मरम्मत के लिए बजट उपलब्ध कराती है, लेकिन बीच में भ्रष्टाचार की दीमक उस धन को खोखला कर देती है। नतीजा यह होता है कि कागजों में भवन सुरक्षित हो जाता है, जबकि जमीन पर उसकी हालत पहले जैसी ही बनी रहती है। सरकार को प्रदेश के प्रत्येक सरकारी स्कूल का तकनीकी सुरक्षा ऑडिट कराना चाहिए। जिन भवनों की आयु पूरी हो चुकी है, उन्हें मरम्मत के भरोसे छोड़ने के बजाय नए भवन बनाने की योजना तैयार करनी होगी। मरम्मत और निर्माण कार्यों की थर्ड-पार्टी जांच अनिवार्य हो, डिजिटल मॉनिटरिंग हो और प्रत्येक परियोजना की प्रगति सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराई जाए। इससे पारदर्शिता भी बढ़ेगी और भ्रष्टाचार पर अंकुश भी लगेगा।
बच्चों की सुरक्षा किसी आपदा के बाद याद आने वाला विषय नहीं हो सकती। यह सरकार की सतत जिम्मेदारी है। जिस राज्य में शिक्षा को भविष्य की नींव बताया जाता है, वहां स्कूल भवनों की मजबूती सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। स्मार्ट क्लास, डिजिटल बोर्ड और नई योजनाएं तभी सार्थक हैं, जब स्कूल की छत बच्चों के सिर पर सुरक्षित खड़ी हो। सरकार को अब यह समझना होगा कि शिक्षा व्यवस्था की मजबूती केवल पाठ्यक्रम और शिक्षकों से नहीं, बल्कि सुरक्षित विद्यालयों से भी तय होती है। यदि आज व्यापक योजना नहीं बनी, तो हर मानसून के साथ कोई न कोई जर्जर दीवार फिर किसी मासूम का भविष्य ढहा सकती है। इसलिए अब समय आ गया है कि सरकार तात्कालिक मरम्मत से आगे बढ़कर पूरे शिक्षा ढांचे के पुनर्निर्माण का रोडमैप तैयार करे। यही बच्चों के प्रति सच्ची जिम्मेदारी और सुशासन की पहचान होगी। राज्य सरकार को बड़े स्तर पर योजना बनाने की जरूरत है, उसे क्रियान्वयन कराने और भ्रष्टाचार करने वालों पर सख्त कार्रवाई करने के लिए भी जल्द ही कुछ करना होगा।



