तुगलकी फरमान से संविधान और न्याय व्यवस्था पर सवाल

    सिरोही और जालोर में सामाजिक पंचायतों द्वारा परिवारों के बहिष्कार और मंदिर प्रवेश पर रोक जैसे फैसलों ने संविधान और कानून के शासन पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। ऐसे तुगलकी फरमान मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं और समानांतर न्याय व्यवस्था को बढ़ावा देते हैं। समय पर सख्त कानूनी कार्रवाई नहीं होने से ऐसी प्रवृत्तियां बढ़ती हैं। लोकतंत्र में कोई भी संस्था संविधान से ऊपर नहीं हो सकती। सरकार और प्रशासन को ऐसे मामलों में स्वतः संज्ञान लेकर त्वरित व कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए।

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    लिव इन में रहने या मृत्युभोज पर देशी घी के मालपुए नहीं बनाने पर परिवारों का बहिष्कार कर दिया जाता है। यही नहीं उनके मंदिर में प्रवेश पर पाबंदी भी लग जाती है। पहले सिरोही और अब जालोर में पंचों के तुगलकी फरमान ने संविधान और न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर दिया है। किसी व्यक्ति अथवा परिवार के जीने की स्वतंत्रता को बाधित करने का जिम्मा कोई कैसे उठा सकता है। पंच किसी पर भी जब जी चाहे जुर्माना लगा देंगे, समाज से बहिष्कार कर देंगे आखिर ऐसा क्यों? देशी घी के मालपुए नहीं बनाने पर पहले सिरोही में जातीय पंचों ने 42 परिवारों का बहिष्कार किया और अब जालोर में लिव इन में रह रहे युवक युवती के परिवारों का हुक्का पानी बंद कर दिया गया। यहां तक कि उन्हें मंदिर में जाने पर भी पाबंदी लगा दी गई। यह तो वो मामले हैं जो मीडिया के जरिए सामने आ रहे हैं, न जाने कितने ऐसे अमानवीय फैसले होंगे जिनका आमजन को पता तक नहीं चल पाता।

    राजस्थान की पहचान लोकतांत्रिक परंपराओं, सामाजिक समरसता और कानून के शासन से रही है। लेकिन जब कुछ जातीय या सामाजिक पंचायतें संविधान और न्याय व्यवस्था से ऊपर खुद को मानते हुए तुगलकी फरमान जारी करती हैं, तब यह केवल किसी एक व्यक्ति के अधिकारों पर हमला नहीं होता, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे को चुनौती होती है। सामाजिक बहिष्कार, भारी जुर्माना, मनमाने प्रतिबंध, प्रेम विवाह करने वाले युवाओं को दंडित करने जैसे फैसले किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार नहीं किए जा सकते। पंचायतों की भूमिका समाज में संवाद, समझौते और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की होनी चाहिए, न कि भय और दबाव का वातावरण बनाने की। यदि पंचायतें संविधान के दायरे में रहकर लोगों के बीच विवाद सुलझाएं तो उनका सम्मान बढ़ेगा, लेकिन जब वे कानून अपने हाथ में लेने लगती हैं तो उनका अस्तित्व ही सवालों के घेरे में आ जाता है। हाल के वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें सामाजिक पंचायतों के फरमानों ने लोगों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया। ऐसे आदेशों को न्यायपालिका भी असंवैधानिक बता चुकी है और स्पष्ट कर चुकी है कि किसी भी गैर-कानूनी सामाजिक आदेश का कानून में कोई स्थान नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसी प्रवृत्तियां पनपती क्यों हैं? इसका उत्तर प्रशासनिक उदासीनता और समय पर कानूनी कार्रवाई का अभाव है। जब किसी पंचायत के गैर-कानूनी आदेश पर तुरंत मुकदमा दर्ज नहीं होता और दोषियों को सजा नहीं मिलती, तब ऐसे समूहों का मनोबल बढ़ता है। कानून का डर समाप्त होते ही समानांतर व्यवस्था खड़ी होने लगती है, जो लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

    जब भी किसी सामाजिक या जातीय पंचायत का तुगलकी फरमान सामने आता है, कुछ दिनों तक प्रशासन सक्रिय दिखता है, राजनीतिक बयानबाजी होती है और फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। यही चुप्पी और ढिलाई ऐसे फरमान जारी करने वालों का हौसला बढ़ाती है। सवाल यह है कि क्या कानून का शासन केवल आम आदमी के लिए है? क्या प्रभावशाली समूहों के सामने सरकार और प्रशासन बेबस हो जाते हैं? या फिर वोट बैंक की राजनीति ने कानून के समान अनुपालन की भावना को कमजोर कर दिया है? लोकतंत्र में किसी भी व्यक्ति या संगठन को संविधान से ऊपर होने का अधिकार नहीं है। सामाजिक पंचायतें यदि समाज सुधार, संवाद और परंपराओं के संरक्षण तक सीमित रहें तो उनका स्वागत है, लेकिन जब वे किसी के जीवन, स्वतंत्रता, विवाह, सामाजिक सम्मान या आजीविका पर मनमाने आदेश देने लगती हैं, तब वे सीधे-सीधे कानून को चुनौती देती हैं। ऐसे मामलों में समझाइश नहीं, बल्कि सख्त कानूनी कार्रवाई ही एकमात्र रास्ता है।

    दुर्भाग्य यह है कि कई बार राजनीतिक दल ऐसे मामलों में स्पष्ट रुख अपनाने से बचते हैं। कारण चाहे सामाजिक समीकरण हों या चुनावी गणित, लेकिन यह चुप्पी गलत संदेश देती है। यदि कानून के उल्लंघन पर कार्रवाई व्यक्ति की पहचान, जाति या राजनीतिक प्रभाव देखकर होगी, तो संविधान में समानता का सिद्धांत केवल किताबों तक सीमित रह जाएगा। प्रशासन की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए। किसी भी गैर-कानूनी फरमान के सामने आते ही स्वतः संज्ञान लेकर प्राथमिकी दर्ज हो, दोषियों की गिरफ्तारी हो और मुकदमों का त्वरित निस्तारण सुनिश्चित किया जाए। यदि हर बार कार्रवाई केवल मीडिया के दबाव या जनाक्रोश के बाद होगी, तो यह व्यवस्था की कमजोरी मानी जाएगी।

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