शिक्षा का अधिकार मिलना ही मुश्किल हो गया। राजस्थान में आरटीई के तहत चयनित बच्चों को निजी स्कूल नि:शुल्क प्रवेश ही नहीं दे रहे। मार्च में लॉटरी निकल गई, इसके बाद अब भी अभिभावक बच्चों के प्रवेश के लिए दर-दर भटक रहे हैं। शिक्षा विभाग 25 प्रतिशत नि:शुल्क प्रवेश का जो ढिंढोरा पीटता है, हालात यह है कि प्राइवेट स्कूल वालों की मनमानी के आगे सरकार-सिस्टम असहाय सा है। शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून का उद्देश्य था कि आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों को भी गुणवत्तापूर्ण निजी शिक्षा का अवसर मिले। इसी सोच के तहत निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित की गईं। लेकिन राजस्थान में हर साल प्रवेश प्रक्रिया शुरू होते ही विवाद, शिकायतें और अदालतों की शरण लेने की नौबत आ जाती है। सवाल यह है कि आखिर निजी स्कूल आरटीई के तहत बच्चों को प्रवेश देने से बचते क्यों हैं?
इसका सबसे बड़ा कारण सरकार और निजी विद्यालयों के बीच फीस प्रतिपूर्ति का वर्षों पुराना विवाद है। स्कूलों का कहना है कि उन्हें समय पर भुगतान नहीं मिलता, कई बार वर्षों तक बकाया अटका रहता है और जो राशि मिलती है, वह भी वास्तविक फीस से कम होती है। दूसरी ओर सरकार का तर्क है कि आरटीई कानून का पालन करना सभी निजी विद्यालयों की कानूनी जिम्मेदारी है। इस टकराव का सबसे बड़ा नुकसान उस गरीब बच्चे को उठाना पड़ता है, जिसके लिए यह कानून बनाया गया था। हाल के वर्षों में इसी मुद्दे पर अदालतों को भी हस्तक्षेप करना पड़ा और राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरटीई के तहत पात्र बच्चों को प्रवेश देना अनिवार्य है तथा फीस प्रतिपूर्ति को लेकर भी सरकार को दिशा-निर्देश दिए। कई अभिभावकों ने आरोप लगाए कि लॉटरी में चयन होने के बावजूद बच्चों को प्रवेश नहीं दिया गया या प्रक्रिया को अनावश्यक रूप से लंबा खींचा गया। अभिभावक संगठनों ने शिक्षा विभाग और निजी विद्यालयों दोनों पर समन्वय की कमी का आरोप लगाया है।
गरीब बच्चों का भविष्य सरकारी फाइलों और निजी संस्थानों के आर्थिक विवाद के बीच बंधक नहीं बनाया जा सकता। आरटीई कोई सरकारी एहसान नहीं, बल्कि संविधान की भावना से जुड़ा अधिकार है। यदि हर वर्ष हजारों गरीब बच्चों को प्रवेश के लिए संघर्ष करना पड़े, तो यह केवल कानून की नहीं बल्कि व्यवस्था की विफलता है। राजस्थान को यह तय करना होगा कि 25 प्रतिशत आरक्षण केवल कागजों पर रहेगा या वास्तव में उन बच्चों के जीवन में शिक्षा का उजाला लेकर आएगा। शिक्षा का अधिकार तभी सार्थक होगा, जब सरकार समय पर अपनी जिम्मेदारी निभाए और निजी विद्यालय सामाजिक दायित्व से मुंह न मोड़ें। यह सच है कि सरकार की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। यदि निजी विद्यालयों की आरटीई के तहत फीस वर्षों तक लंबित रहेगी, भुगतान की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होगी और अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तो विवाद पैदा होंगे। लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि विद्यालय कानून की अवहेलना करें। यदि किसी नीति से असहमति है तो उसके समाधान के संवैधानिक रास्ते मौजूद हैं, गरीब बच्चों का अधिकार छीनने का नहीं।
सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि जिन विद्यालयों की पहचान उत्कृष्ट शिक्षा, आधुनिक सुविधाओं और ऊंची फीस के कारण है, वहीं कई बार आरटीई को लेकर सबसे अधिक शिकायतें सामने आती हैं। जो संस्थान समाज में आदर्श बनने चाहिए, वे यदि सामाजिक दायित्व से ही पीछे हटने लगें तो शिक्षा का उद्देश्य ही खो जाता है। शिक्षा केवल व्यवसाय नहीं है; यह सामाजिक समानता का सबसे प्रभावी माध्यम भी है।सरकार भी केवल आदेश जारी कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती। शिक्षा विभाग को ऐसे विद्यालयों की सूची सार्वजनिक करनी चाहिए जो बार-बार आरटीई नियमों का उल्लंघन करते हैं। प्रवेश देने से इनकार करने वाले स्कूलों पर आर्थिक दंड, मान्यता संबंधी कार्रवाई और नियमित निरीक्षण जैसे कठोर कदम उठाए जाने चाहिए। यदि कानून तोड़ने पर कोई ठोस परिणाम नहीं होगा तो नियम केवल फाइलों तक ही सीमित रह जाएंगे। आज जरूरत आरटीई कानून की समीक्षा नहीं, बल्कि उसके ईमानदार क्रियान्वयन की है। सरकार समय पर फीस प्रतिपूर्ति सुनिश्चित करे, तकनीकी खामियां दूर करे और निजी विद्यालय कानून का अक्षरशः पालन करें।



