कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन: हठ से नहीं संवाद से निकलेगा समाधान

    लोकतंत्र में पारदर्शिता और संवाद ही भरोसा कायम रखते हैं। अब समय आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, पहल का है। सरकार को वार्ता करनी चाहिए और आंदोलनकारियों को भी समाधान की दिशा में सकारात्मक रुख अपनाना चाहिए। लोकतंत्र की जीत तब होगी, जब किसी आंदोलन का अंत अस्पताल में नहीं, बल्कि बातचीत की मेज पर होगा। यही एक परिपक्व लोकतंत्र की पहचान है।

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    Cockroach Janata Party Protest: जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी समेत अन्य छात्र संगठनों का आंदोलन जारी है। आमरण अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक की तबीयत देर रात बिगड़ गई। कई दिनों से चल रहे आंदोलन के बीच सरकारी स्तर पर कोई बातचीत नहीं हो पाई है। आंदोलनकारी केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। नीट पेपर लीक इसका मुख्य कारण बताया जा रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने आरोप लगाया कि सरकार उनकी मांगें मानने के बजाय उन्हें परेशान कर रही है। कहीं पानी बंद तो कहीं टॉयलेट की सुविधा नहीं दी जा रही। इनके समर्थन में सोनम वांगचुक आमरण अनशन पर बैठे हैं, उनके स्वास्थ्य में भी लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है।

    सोनम वांगचुक की बिगड़ती तबीयत केवल एक व्यक्ति की स्वास्थ्य संबंधी खबर नहीं है, बल्कि लोकतंत्र के सामने खड़ा एक गंभीर सवाल है। यदि किसी नागरिक को अपनी मांगों के समर्थन में लगातार आंदोलन करना पड़े, उसकी सेहत गिरती जाए और इसके बावजूद सत्ता के गलियारों में कोई ठोस पहल दिखाई न दे, तो यह चिंता का विषय है। सवाल यह है कि आखिर सरकार बातचीत से बच क्यों रही है? क्या संवाद के बिना लोकतंत्र आगे बढ़ सकता है? लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत संवाद है, टकराव नहीं। सरकार यदि आंदोलनकारियों की सभी मांगों से सहमत नहीं है तो यह उसका अधिकार है। लेकिन क्या इस असहमति का समाधान बातचीत से नहीं निकाला जा सकता? क्या सरकार के पास इतना भी समय नहीं कि वह आंदोलनकारियों के प्रतिनिधियों को बुलाकर उनकी बात सुने और अपना पक्ष स्पष्ट करे?

    देश में अनेक आंदोलनों का समाधान वार्ता से निकला है। हर मांग को स्वीकार करना आवश्यक नहीं होता, लेकिन हर मांग को सुनना आवश्यक होता है। सरकार चाहे तो विशेषज्ञ समिति बना सकती है, चरणबद्ध समाधान दे सकती है, समयसीमा तय कर सकती है या व्यवहारिक मांगों पर सहमति बनाकर शेष मुद्दों पर आगे चर्चा का रास्ता खोल सकती है। लोकतंत्र का यही तरीका है। दूसरी ओर, आंदोलनकारियों को भी यह समझना होगा कि समाधान केवल आंदोलन लंबा खींचने से नहीं निकलेगा। यदि सरकार बातचीत का प्रस्ताव रखती है, तो उसे सकारात्मक रूप से स्वीकार करना चाहिए। जिद दोनों ओर से होगी तो नुकसान केवल जनता और लोकतांत्रिक विश्वास का होगा।

    सबसे चिंताजनक बात यह है कि अक्सर सरकारें तब सक्रिय होती हैं, जब कोई आंदोलन राष्ट्रीय संकट का रूप ले लेता है या किसी की जान पर बन आती है। क्या हर बार हालात इतने बिगड़ने का इंतजार करना जरूरी है? संवेदनशील शासन की पहचान यही है कि वह संकट को बढ़ने से पहले ही संवाद शुरू करे। सोनम वांगचुक का आंदोलन चाहे लद्दाख के अधिकारों का हो, पर्यावरण संरक्षण का हो या स्थानीय लोगों की आकांक्षाओं का—इन मुद्दों पर असहमति हो सकती है, लेकिन चुप्पी किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि किन मांगों पर सहमति संभव है, किन पर नहीं और क्यों नहीं। लोकतंत्र में पारदर्शिता और संवाद ही भरोसा कायम रखते हैं। अब समय आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, पहल का है। सरकार को वार्ता करनी चाहिए और आंदोलनकारियों को भी समाधान की दिशा में सकारात्मक रुख अपनाना चाहिए। लोकतंत्र की जीत तब होगी, जब किसी आंदोलन का अंत अस्पताल में नहीं, बल्कि बातचीत की मेज पर होगा। यही एक परिपक्व लोकतंत्र की पहचान है। सरकार को भी अपनी हठ छोड़नी होगी। लोकतंत्र में चुप्पी, टकराव और इंतजार किसी समस्या का समाधान नहीं होते।

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