बसों की कमी के आगे जनता बेबस

    राजस्थान में सरकारी और निजी बसों की कमी से शहरों और गांवों में आमजन परिवहन संकट झेल रहे हैं। सीमित बस सेवाओं, बंद रूटों, महंगे निजी वाहनों और अवैध परिवहन के कारण विद्यार्थियों, मरीजों, मजदूरों और नौकरीपेशा लोगों को भारी परेशानी हो रही है। बढ़ती आबादी के अनुरूप सार्वजनिक परिवहन का विस्तार नहीं हुआ है। सरकार को बसों की संख्या बढ़ाने, नए रूट शुरू करने, समयबद्ध सेवाएं, फीडर नेटवर्क, ट्रैफिक सुधार और अवैध वाहनों पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए।

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    परिवहन के साधन पूरे नहीं पड़ रहे। गिनी-चुनी सरकारी बसों के साथ दौड़ती प्राइवेट बसें भी लोगों को उपलब्ध नहीं हो पा रही। समय पर सस्ती और सुलभ बस सेवा अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। शहरों से लेकर गांवों तक आमजन अब भी पर्याप्त परिवहन सुविधाओं के अभाव से जूझ रहा है। राजधानी जयपुर सहित अधिकांश शहरों में आबादी तेजी से बढ़ रही है, नए आवासीय क्षेत्र विकसित हो रहे हैं और गांवों से शहरों की ओर आवागमन लगातार बढ़ रहा है। इसके बावजूद सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था उसी अनुपात में मजबूत नहीं हो पाई। नतीजा यह है कि लाखों लोग रोजाना असुविधा, भीड़, लंबी प्रतीक्षा और महंगे निजी साधनों पर निर्भर रहने को मजबूर हैं। मजे की बात यह कि प्राइवेट टैक्सी-कैब जैसी सुविधाओं पर मनमाना किराया वसूला जा रहा है। समय-समय पर इनकी रेट अलग-अलग वसूली जा रही है। अवैध बसों का बढ़ता संचालन भी हादसों में तेजी ला रहा है। ई-रिक्शा जैसे साधन भी ट्रैफिक व्यवस्था को बिगाड़ रहे हैं।

    बसों की कमी के आगे जनता बेबस

    ग्रामीण राजस्थान की स्थिति और भी गंभीर है। अनेक गांवों में रोडवेज बसों की संख्या वर्षों से नहीं बढ़ी। कई मार्गों पर सेवाएं सीमित हैं, जबकि कुछ पुराने रूट बंद हो चुके हैं। विद्यार्थी समय पर स्कूल और कॉलेज नहीं पहुंच पाते, मरीजों को अस्पताल जाने में परेशानी होती है, मजदूरों और नौकरीपेशा लोगों का रोज का सफर अनिश्चित बना रहता है। मजबूरी में लोग निजी जीपों, टैक्सियों या अन्य वाहनों का सहारा लेते हैं, जो अक्सर अधिक किराया वसूलते हैं और कई बार सुरक्षा मानकों की भी अनदेखी करते हैं। शहरों में भी तस्वीर संतोषजनक नहीं है। जयपुर जैसे बड़े शहर में ट्रैफिक जाम बढ़ता जा रहा है, लेकिन सार्वजनिक परिवहन का दायरा और आवृत्ति अभी भी पर्याप्त नहीं है। कई इलाकों में बसें समय पर नहीं आतीं, कई क्षेत्रों तक उनकी पहुंच ही नहीं है। इससे लोग निजी दोपहिया और चारपहिया वाहन खरीदने को मजबूर होते हैं, जिसका परिणाम बढ़ते प्रदूषण, ईंधन की खपत और सड़क दुर्घटनाओं के रूप में सामने आता है।

    ई-बसों का संचालन और नई योजनाएं स्वागतयोग्य हैं, लेकिन केवल नई तकनीक अपनाने से समस्या हल नहीं होगी। जरूरत है कि बसों की संख्या बढ़ाई जाए, ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में नियमित सेवाएं सुनिश्चित की जाएं, नए रूट शुरू हों और बंद मार्गों को फिर से चालू किया जाए। साथ ही बसों का समयबद्ध संचालन, डिजिटल सूचना प्रणाली और अंतिम छोर तक पहुंचने वाली फीडर सेवाओं का भी विस्तार किया जाए। यह केवल परिवहन विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास का भी प्रश्न है। सुलभ सार्वजनिक परिवहन गरीब, विद्यार्थी, महिलाएं, बुजुर्ग और दिव्यांग नागरिकों के लिए अवसरों के द्वार खोलता है। यदि यह व्यवस्था कमजोर होगी तो विकास का लाभ भी समान रूप से समाज के हर वर्ग तक नहीं पहुंच पाएगा।

    सरकार को अब घोषणाओं और प्रतीकात्मक परियोजनाओं से आगे बढ़कर सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता देनी होगी। राजस्थान को ऐसी समग्र परिवहन नीति की जरूरत है जिसमें शहरों और गांवों के बीच संतुलन हो, बसों की संख्या मांग के अनुरूप हो और हर नागरिक को सुरक्षित, समयबद्ध तथा किफायती यात्रा का अधिकार मिले। विकास का वास्तविक अर्थ तभी है, जब आम आदमी बिना परेशानी अपने गंतव्य तक पहुंच सके। लोगों को सस्ती-सुलभ परिवहन सुविधा मिले, सरकार को इस पर ध्यान देना होगा। परिवहन साधन बढ़े और ट्रैफिक व्यवस्था सुधरे, अवैध वाहनों के संचालन पर रोक लगे, इस पर विशेष ध्यान देना होगा।

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