केवल जांच कमेटी गठित करने से सड़क हादसे नहीं रुकने वाले

    राजस्थान में बढ़ते सड़क हादसे गंभीर चिंता का विषय बन चुके हैं। जयपुर में ट्रेलर की चपेट में आकर एक परिवार के चार सदस्यों की मौत ने सड़क सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। केवल जांच समितियां बनाना पर्याप्त नहीं, बल्कि सख्त कानून, भारी वाहनों की प्रभावी निगरानी, ब्लैक स्पॉट सुधार, बेहतर सड़क इंजीनियरिंग, सीसीटीवी, ट्रॉमा केयर और यातायात नियमों का कठोर पालन जरूरी है। जवाबदेही तय किए बिना हादसों और मौतों का सिलसिला थमना मुश्किल है।

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    जयपुर ही नहीं प्रदेशभर में सड़क हादसे बढ़ रहे हैं, लोग असमय ही मौत का शिकार हो रहे हैं। मंगलवार को दो सौ फुट बाईपास पर एक ट्रेलर ने एक परिवार को ही कुचल दिया जिसमें पिता व तीन बच्चों की मौत हो गई। मां एसएमएस अस्पताल में उपचाराधीन है। सड़क हादसों की खबरें अब सामान्य लगने लगी हैं, किसी की बेवजह मौत को भी गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। सरकार हादसे के बाद मुआवजे का ऐलान कर देती है, अफसरों को औपचारिक निर्देश दे देती है। इसके बाद सबकुछ पहले जैसा चलने लगता है। तेज रफ्तार ट्रेलर के एक ही परिवार को कुचल देने की घटना केवल एक सड़क दुर्घटना नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, यातायात अव्यवस्था और सड़क सुरक्षा के खोखले दावों का भयावह प्रमाण है। एक पल में पूरा परिवार उजड़ गया। मासूम बच्चों की चीखें, अपनों को खोने का दर्द और सड़क पर बिखरी जिंदगी का मंजर हर संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर देता है। लेकिन दुखद यह है कि ऐसी घटनाएं अब असामान्य नहीं रहीं। कुछ दिन शोक, कुछ दिन सख्ती और फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। जयपुर की दो सौ फुट बाइपास और शहर की अन्य प्रमुख सड़कें लगातार भारी वाहनों के कारण खतरे का पर्याय बनती जा रही हैं। ट्रेलर, डंपर और ट्रक कई बार निर्धारित नियमों की अनदेखी करते हुए शहर में प्रवेश करते हैं। तेज रफ्तार, लापरवाही, ओवरलोडिंग और कमजोर निगरानी मिलकर मौत का ऐसा जाल बुनते हैं, जिसमें निर्दोष लोग अपनी जान गंवा रहे हैं। सवाल यह है कि यदि भारी वाहनों के लिए समय और मार्ग तय हैं, तो उनका पालन कौन सुनिश्चित करेगा?

    हर बड़े हादसे के बाद प्रशासन जांच के आदेश देता है, पुलिस अभियान चलाती है, कुछ चालान काटे जाते हैं और कुछ अधिकारियों की बैठकें हो जाती हैं। यहां भी सात सदस्यीय कमेटी का गठन किया गया है, पांच दिन में जांच रिपोर्ट आ जाएगी पर बदलाव क्या होगा? क्या हादसे होना बंद हो जाएंगे? क्या कभी यह समीक्षा होती है कि पिछले हादसों से क्या सीखा गया? क्या दुर्घटना संभावित स्थानों की इंजीनियरिंग खामियां दूर हुईं? क्या नियम तोड़ने वाले वाहन चालकों और परिवहन कंपनियों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई हुई कि भविष्य में कोई दोबारा ऐसा करने का साहस न करे? जवाब अक्सर निराशाजनक ही मिलता है। ऐसे में कमेटी का गठन करना और जांच का शोर मचाना, केवल दिखावा ही लगता है। लोग सड़क पर मारे जा रहे हैं, कानून भी ऐसा सख्त है ही नहीं जो हादसों को कम कर सके। तुरंत जमानत हो जाती है, कोई बड़ी सजा का प्रावधान तक नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक पिछले साल सड़क हादसों में 12,370 लोगों की मौत हुई, यानी औसतन हर दिन 94 दुर्घटनाएं और 33 मौतें। तेज रफ्तार, गलत दिशा में वाहन चलाना और यातायात नियमों की अनदेखी प्रमुख कारण बताए गए।

    सड़क सुरक्षा केवल वाहन चालक की जिम्मेदारी नहीं है। अच्छी सड़कें, स्पष्ट संकेतक, पर्याप्त रोशनी, प्रभावी ट्रैफिक प्रबंधन, सीसीटीवी निगरानी और नियमों का कठोर पालन-ये सभी सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी हैं। यदि सड़क पर गड्ढे हैं, अवैध कट हैं, भारी वाहनों की आवाजाही अनियंत्रित है और पुलिस की निगरानी कमजोर है, तो दुर्घटना केवल चालक की गलती नहीं मानी जा सकती। इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि सड़क सुरक्षा के मामले में हमारी व्यवस्था प्रतिक्रियात्मक है, सक्रिय नहीं। हादसा होने के बाद कार्रवाई होती है, जबकि जरूरत हादसे से पहले खतरे को रोकने की है। शहर में ब्लैक स्पॉट की पहचान, भारी वाहनों के लिए सख्त निगरानी, स्पीड मॉनिटरिंग, नशे में वाहन चलाने वालों पर कड़ी कार्रवाई और सड़क निर्माण की गुणवत्ता की नियमित जांच अब टाली नहीं जा सकती। जिस परिवार ने अपनों को खोया है, उसका दर्द कोई मुआवजा कम नहीं कर सकता। लेकिन यदि इस हादसे के बाद भी व्यवस्था नहीं बदली, तो यह केवल एक परिवार की नहीं, पूरे समाज की हार होगी।

    सरकार, प्रशासन, परिवहन विभाग और ट्रैफिक पुलिस को यह समझना होगा कि सड़क पर निकलने वाला हर नागरिक सुरक्षित घर लौटने की उम्मीद लेकर निकलता है। यदि यह न्यूनतम भरोसा भी व्यवस्था नहीं दे पा रही, तो विकास के तमाम दावे बेमानी हैं। अब समय संवेदना व्यक्त करने का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का है। सड़क पर मौत का यह सिलसिला तभी रुकेगा, जब कानून का भय वास्तविक होगा, लापरवाही पर कठोर दंड मिलेगा और सड़क सुरक्षा को सरकारी फाइलों से निकालकर धरातल पर लागू किया जाएगा। हर हादसा एक चेतावनी है-यदि अब भी नहीं चेते, तो अगली बारी किसी और परिवार की हो सकती है। ऐसे में कानून सख्त हो, नियम-कायदे से नहीं चलने वालों पर कड़ी कार्रवाई हो। केवल जांच कमेटी गठित करने से हादसे नहीं रुकने वाले। हर वर्ष हजारों लोगों की जान सड़क हादसों में जा रही है, तो केवल चालान काटना पर्याप्त नहीं है। सड़क इंजीनियरिंग में सुधार, ब्लैक स्पॉट खत्म करना, सख्त प्रवर्तन, बेहतर ट्रॉमा केयर और जिम्मेदार ड्राइविंग की संस्कृति विकसित किए बिना इस रिकॉर्ड को बदलना मुश्किल होगा।

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    माननीय प्रतीक चौबे जी(Prateek Chauvey ) द्वारा प्रस्तुत यह मंच जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और प्रेरणा भरने का प्रयास है। यहाँ दी गई जानकारी आपकी व्यक्तिगत और व्यावसायिक यात्रा में सहायक होगी, आपको नई सोच के साथ बदलाव और सफलता की ऊँचाइयों तक पहुँचने के लिए प्रेरित करेगी।