काम न करने की शिकायत हो या घूसखोरी की। समय पर दफ्तर नहीं आने की बात हो या जनता से दुर्व्यवहार की। इनका कभी कुछ नहीं बिगड़ता, बरसों की नौकरी में ऐसी कोई तबादला सूची नहीं जिसमें इनका नाम आया हो। नाम आया भी तो दो-चार दिन बाद ये पुन: पुरानी सीट पर स्थापित हो जाते हैं। तीस-तीस साल बाद भी अनेकानेक अफसर-कार्मिक एक ही स्थान पर जमे हैं। इनसे विभाग-जनता को कोई फायदा हुआ हो, यह तो नहीं पता पर इनकी ‘व्यवस्था’ से इन्हें होने वाले फायदे पर कोई गौर ही नहीं कर रहा। एक ही सीट पर बैठे-बैठे कई प्रमोशन ले लिए पर इन्हें कोई हिला नहीं सका। अब पुलिस विभाग को ही देख लीजिए, थानों में नफरी कम है, एएसआई तो बहुत कम। किसी भी मामले के अनुसंधान के लिए एएसआई मजबूत कड़ी होता है। आलम यह है कि पिछले साल ढेरों प्रमोशन हुए, हैड कांस्टेबल से एएसआई बनने वाले भी सैकड़ों पर इन्हें थाने लगाने की ‘जुर्रत’ किसी ने नहीं की। ये अपनी पुरानी जगह पर बने हुए हैं, दो-चार दिखावे के लिए कुछ दिन थानों में ड्यूटी देने के बाद वापस आराम की कुर्सी पर आ बैठे। ऐसे ही शिक्षा विभाग हो या मेडिकल, परिवहन हो या कोई और।
प्रदेश में तबादलों का दौर शुरू होते ही एक बार फिर वही सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर तबादले होते किसके हैं? क्या वास्तव में स्थानांतरण प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर किए जाते हैं, या फिर सिफारिश, राजनीतिक पहुंच और अफसरशाही की “सेटिंग” ही सब कुछ तय करती है? यह किसी से छिपा नहीं है कि अनेक विभागों में ऐसे कर्मचारी और अधिकारी हैं जो वर्षों नहीं, बल्कि दशकों तक एक ही जगह जमे रहते हैं। कई तो पूरी नौकरी एक ही जिले, एक ही कार्यालय या एक ही सीट पर पूरी कर सेवानिवृत्त हो जाते हैं। दूसरी ओर ऐसे भी कर्मचारी हैं जिनका हर साल या दो-तीन साल में तबादला कर दिया जाता है। यदि स्थानांतरण नीति का उद्देश्य प्रशासनिक दक्षता बढ़ाना, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना और सभी क्षेत्रों में समान रूप से अनुभवी कर्मचारियों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है, तो फिर कुछ लोगों के लिए यह नीति लागू क्यों नहीं होती? आखिर वे कौन-सी ताकतें हैं जो नियमों को भी बौना बना देती हैं? यह स्थिति न केवल ईमानदार कर्मचारियों का मनोबल तोड़ती है, बल्कि व्यवस्था की निष्पक्षता पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
एक ही स्थान पर वर्षों तक जमे रहने से स्थानीय स्तर पर प्रभाव, संपर्क और हितों का ऐसा जाल बन जाता है जो पारदर्शिता के लिए खतरा बन सकता है। यही कारण है कि समय-समय पर स्थानांतरण को सुशासन का महत्वपूर्ण साधन माना जाता है। लेकिन जब यही व्यवस्था चुनिंदा लोगों पर लागू न हो और बाकी कर्मचारियों पर बार-बार लागू की जाए, तो यह नीति नहीं, बल्कि पक्षपात का प्रतीक बन जाती है। विडंबना यह है कि हर सरकार सत्ता में आने के बाद पारदर्शी स्थानांतरण नीति लागू करने का दावा करती है, लेकिन नतीजा वही पुराना निकलता है। राजनीतिक सिफारिशें, प्रभावशाली लोगों की पैरवी और अंदरूनी सेटिंग कई बार नियमों पर भारी पड़ जाती हैं। इसका नुकसान केवल कर्मचारियों को नहीं, बल्कि आम जनता को भी उठाना पड़ता है। जिन विभागों में वर्षों से एक ही लोग जमे रहते हैं, वहां जवाबदेही कमजोर होती है और शिकायतें बढ़ती हैं।
जरूरत इस बात की है कि स्थानांतरण प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल, पारदर्शी और नियम आधारित हो। प्रत्येक कर्मचारी की पोस्टिंग अवधि सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध हो, एक निश्चित अवधि से अधिक किसी को एक ही स्थान पर रहने की अनुमति न मिले और यदि किसी विशेष परिस्थिति में छूट दी जाए तो उसका कारण भी सार्वजनिक किया जाए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राजनीतिक हस्तक्षेप को न्यूनतम किया जाए और नियम सभी पर समान रूप से लागू हों। जब तक “सेटिंग” व्यवस्था पर भारी पड़ती रहेगी, तब तक ईमानदार कर्मचारी खुद को ठगा हुआ महसूस करेंगे और जनता का प्रशासन पर भरोसा भी कमजोर होता जाएगा। तबादलों का उद्देश्य किसी को पुरस्कृत या दंडित करना नहीं, बल्कि प्रशासन को निष्पक्ष, जवाबदेह और प्रभावी बनाना होना चाहिए। सरकार यदि वास्तव में सुशासन चाहती है तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि तबादले पहचान और पहुंच के आधार पर नहीं, बल्कि नीति और आवश्यकता के आधार पर हों। तभी यह व्यवस्था न्यायसंगत और विश्वसनीय बन सकेगी।



