पिंजरापोल गोशाला में करंट लगने से मरी चाय गायों के मामले में सरकार ने उच्चस्तरीय जांच समिति गठित कर दी। सात दिन के भीतर इसकी रिपोर्ट मांगी गई है। इसी गोशाला में वित्तीय अनियमितताओं को लेकर भी कई महीनों पहले की एक शिकायत पर जांच अभी चल रही है, सच्चाई क्या है, यह अभी सामने नहीं आया। उधर एक और मामला भीलवाड़ा के शाहपुरा में पकड़ में आया, जहां स्थानीय विधायक लालाराम बैरवा और उनके बेटे बीस बीघा चारागाह में गोशाला चला रहे हैं। यही नहीं भाजपा के ही चुनाव हार चुके एक नेता ने भी गोशाला के नाम पर बड़ी जमीन राजधानी में ही कबाड़ ली। गाय की सेवा के नाम पर कहीं गोशाला खोलकर चंदा उगाही तो कहीं जमीन कबाड़ी जा रही है। गायों की सेवा कितनी हो रही है, यह सबको मालूम है। पूरे प्रदेश में इधर-उधर भटकती गायों की देखभाल करने वाला कोई नहीं जबकि इन्हीं गायों की देखभाल के नाम पर अनुदान ही नहीं भामाशाहों से दान भी लिया जा रहा है। गोशाला के नाम पर समिति बन गई, गेस्ट हाउस खोल दिए गए यहां तक की मामूली दर पर भोजन-ठहरने का धंधा भी चल रहा है। नागौर में एक ऐसी ही गोशाला के बारे में भी सब जानते ही हैं।
गाय केवल एक पशु नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था और संस्कृति का प्रतीक है। यही कारण है कि राज्य सरकार हर वर्ष गोशालाओं के संचालन, निराश्रित गोवंश के संरक्षण और उनके भरण-पोषण पर करोड़ों रुपये खर्च करती है। लेकिन जब समय-समय पर गोशालाओं में अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, फर्जी रिकॉर्ड, चारे में अनियमितता और गायों की बदहाली की खबरें सामने आती हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर गोसेवा के नाम पर मिलने वाली सरकारी सहायता का लाभ किसे मिल रहा है-गायों को या गोरखधंधा चलाने वालों को? प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से ऐसी शिकायतें आती रही हैं कि कई गोशालाओं में कागजों में गायों की संख्या कुछ और होती है, जबकि मौके पर स्थिति अलग मिलती है। कहीं बीमार और कुपोषित गोवंश दम तोड़ रहा है तो कहीं चारे और दवाइयों की व्यवस्था तक नहीं है। कई संस्थाएं केवल सरकारी अनुदान लेने के लिए गोशालाओं का संचालन करती हैं, लेकिन वास्तविक सेवा के नाम पर खानापूर्ति होती है। यह स्थिति न केवल सरकारी धन की बर्बादी है, बल्कि गोसेवा जैसी पवित्र भावना के साथ भी छल है।
विडंबना यह है कि सरकार हर वर्ष बजट बढ़ाने का दावा करती है, लेकिन दूसरी ओर सड़कों पर आवारा गोवंश की संख्या कम नहीं हो रही। शहरों और गांवों में गायें दुर्घटनाओं का शिकार हो रही हैं, खेतों में फसलों को नुकसान पहुंचा रही हैं और स्वयं भूख-प्यास से जूझ रही हैं। यदि गोशालाओं की व्यवस्था प्रभावी होती, तो यह स्थिति शायद देखने को नहीं मिलती। सबसे बड़ी कमी निगरानी और जवाबदेही की है। सरकारी अनुदान जारी होने के बाद कई जगह निरीक्षण केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है। जिन संस्थाओं पर गंभीर आरोप लगते हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई भी अक्सर धीमी पड़ जाती है। जब तक दोषियों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई नहीं होगी और फर्जीवाड़ा करने वालों से सरकारी राशि की वसूली नहीं होगी, तब तक यह खेल बंद होना मुश्किल है। सरकार को चाहिए कि प्रदेश की सभी गोशालाओं का नियमित और स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए। प्रत्येक गोवंश की डिजिटल पहचान, ऑनलाइन रिकॉर्ड और सार्वजनिक निगरानी की व्यवस्था हो। अनुदान को केवल वास्तविक गोसेवा और पारदर्शिता से जोड़ा जाए। साथ ही, उत्कृष्ट कार्य करने वाली गोशालाओं को सम्मानित और प्रोत्साहित भी किया जाए, ताकि सेवा की स्वस्थ प्रतिस्पर्धा विकसित हो। गोसेवा भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। इसे भ्रष्टाचार और स्वार्थ का माध्यम बनने देना न समाज के हित में है और न ही धर्म के। अब समय आ गया है कि सरकार, प्रशासन और समाज मिलकर यह सुनिश्चित करें कि गोशालाएं आस्था और सेवा का केंद्र बनें, न कि सरकारी अनुदान के नाम पर गोरखधंधे का अड्डा।



